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जिसने उजाड़ दी थी गोद, उसे द्रौपदी ने क्यों दिया जीवनदान? इस कहानी में छिपा है क्षमा का सबसे बड़ा पाठ

Published: Sat, 27 Dec 2025 04:09 PM (GMT+05:30)

द्रौपदी ने अपने पांचों पुत्रों की मृत्यु के बाद भी अपना धैर्य नहीं खोया। आज हम आपको महाभारत (Mahabharat Katha) ...और पढ़ें

महाभारत की यह कथा सिखाती है क्षमा का पाठ

महाभारत की यह कथा सिखाती है क्षमा का पाठ

HighLights

  1. अश्वत्थामा ने किया था पांडवों के पुत्रों का वध

  2. द्रौपदी के इस निर्णय से सभी पड़ गए आश्चर्य में

  3. श्रीकृष्ण ने अश्वत्थामा को दिया था ये श्राप

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। पांडवों और कौरवों के बीच हुए द्यूतक्रीड़ा यानी चौसर के खेल ने अंत में महाभारत जैसे एक भीषण युद्ध का रूप ले लिया। इस युद्ध के दौरान ऐसे कई दाव-पेच चले गए, जो आज भी स्मरणीय हैं। अश्वत्थामा भी महाभारत ग्रंथ के महत्वपूर्ण पात्रों में से एक रहा है, जिसे अमरता किसी वरदान के रूप में नहीं बल्कि एक श्राप के रूप में मिली है। चलिए जानते हैं इसके पीछे का कारण।

अश्वत्थामा ने इस तरह लिया बदला

महाभारत की कथा के अनुसार, अश्वत्थामा ने युद्ध समाप्त होने के बाद अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए पांडवों के शिविर में आग लगा दी, जिससे पांडव और द्रौपदी के पांचों पुत्र मारे गए। अपने पुत्रों की मृत्यु की खबर जानने के बाद द्रौपदी बहुत दुखी हुई। लेकिन इस असहनीय दुख में भी उसने अपना विवेक नहीं खोया।

तब अर्जुन ने यह प्रतिज्ञा ली कि वह अश्वत्थामा को पकड़कर उसे दंड देगा। अर्जुन ने अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार, अश्वत्थामा को पराजित कर बंदी बना लिया और उसे द्रौपदी के समक्ष प्रस्तुत किया। तब अर्जुन ने कहा कि पांचाली, अब तुम ही इसका निर्णय तुम करो कि इसे क्या दंड दिया जाए?

Mahabharat story AI

(AI Generated Image)

द्रौपदी ने दिया ये जवाब

द्रौपदी ने लज्जा से सिर नीचे झुलाए और बंधे हुए अश्वत्थामा की ओर देखा और कहा कि यह गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र हैं। जिस प्रकार पुत्र-शोक मुझे सहना पड़ रहा है, मैं नहीं चाहती कि अश्वत्थामा की माता को भी वही दुख सहना पड़े। किसी भी माता को इस तरह की पीड़ा देना उचित नहीं है। इसके साथ ही गुरु-पुत्र का वध करना उचित नहीं है।

द्रौपदी की यह बात सुनकर सभी को आश्चर्य हुआ। भगवान श्रीकृष्ण भी द्रौपदी के इस निर्णय से प्रसन्न हुए, क्योंकि यह क्रोध पर विवेक की विजय थी। यह इसके बाद अश्वत्थामा के इस पाप के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने उनके मस्तक की मणि ले ली और उसे कलियुग के अंत तक माथे के घाव के साथ पृथ्वी पर भटकने का श्राप दिया।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।

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