कर्ण का नागास्त्र और श्रीकृष्ण का चमत्कार, ऐसे मृत्यु के मुख से वापस आए थे अर्जुन
कर्ण और अर्जुन का युद्ध (Arjuna survival in Mahabharata) यह दिखाता है कि रणभूमि में केवल युद्ध कौशल ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि ईश्वर की कृपा और सही ...और पढ़ें

Arjuna survival in Mahabharata: श्रीकृष्ण का चमत्कार (Ai Generated)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। कर्ण और अर्जुन का युद्ध महाभारत के इतिहास के सबसे भयंकर युद्धों में से एक था। इस दिन दो महारथी एक-दूसरे के सामने थे। यह केवल दो योद्धाओं का युद्ध नहीं, बल्कि दो श्रेष्ठ धनुर्धरों के सम्मान की लड़ाई थी। इसी युद्ध के दौरान एक ऐसा पल आया, जब साक्षात काल अर्जुन (Arjuna survival in Mahabharata) के सामने खड़ा था और उनके प्राण संकट में थे, लेकिन भगवान श्रीकृष्ण की लीला ने पूरा इतिहास बदल दिया।

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अश्वसेन सर्प का प्रतिशोध
कर्ण के पास एक बेहद विनाशकारी अस्त्र था नागास्त्र। इस अस्त्र में अश्वसेन नाम का एक नाग समाया हुआ था। अश्वसेन अर्जुन से बदला लेना चाहता था, क्योंकि खांडव वन दहन के समय अर्जुन के बाणों से उसकी माता की मृत्यु हो गई थी। वह प्रतिशोध की आग में जल रहा था और अवसर मिलते ही कर्ण के तरकश में जा बैठा।
कर्ण की जिद
जब कर्ण ने अर्जुन का वध (Arjuna Life Danger) करने के लिए नागास्त्र निकाला, तो अश्वसेन की शक्ति से वह बाण दहकने लगा। कर्ण के सारथी महारथी शल्य ने कर्ण को सचेत किया, 'कर्ण तुम्हारा निशाना अर्जुन के मस्तक पर है, इसे थोड़ा नीचे करो और अर्जुन की छाती का लक्ष्य साधो। अगर उसने अपना मस्तक झुका लिया तो तुम्हारा वार खाली जाएगा।' लेकिन घमंड से भरे हुए कर्ण (Karna Battle Story) ने कहा, 'कर्ण अपना निशाना बार-बार नहीं बदलता।' कर्ण ने वह अचूक बाण अर्जुन की गर्दन को निशाना बनाकर छोड़ दिया।
श्रीकृष्ण का चमत्कार
भगवान श्रीकृष्ण जानते थे कि यह कोई साधारण बाण नहीं है। अगर यह बाण अर्जुन को छू भी लेता है, तो उनके प्राणों का बचना असंभव था। जैसे ही नागास्त्र अर्जुन के पास पहुंचा, श्रीकृष्ण (Krishna Saved Arjuna) ने अपने दाएं पैर के अंगूठे से रथ को बलपूर्वक दबा दिया।
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भगवान के स्पर्श मात्र से अर्जुन का दिव्य रथ जमीन में पांच अंगुल नीचे धंस गया। इसका परिणाम यह हुआ कि जो बाण अर्जुन के गर्दन को काटने के लिए आ रहा था, वह उनके मस्तक के ऊपर लगे मुकुट को उड़ाता हुआ निकल गया, लेकिन अर्जुन के प्राण बच गए।
क्षत्रिय धर्म का पालन
अश्वसेन दोबारा कर्ण के पास गया और कहा कि 'इस बार मुझे दोबारा चलाओ, मैं अर्जुन का वध निश्चित कर दूंगा।' लेकिन दानवीर कर्ण ने अपने क्षत्रिय धर्म का पालन करते हुए कहा, 'कर्ण एक बार चलाए गए बाण को दोबारा नहीं चलाता, चाहे परिणाम हार ही क्यों न हो।' इसके बाद अर्जुन ने अश्वसेन का वध कर दिया।
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