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    कैलाश छोड़कर काशी क्यों बसे महादेव? शिव-विवाह के पीछे छिपा वह ‘संदेश’ जो सबको जानना चाहिए

    Updated: Sun, 15 Feb 2026 12:18 AM (IST)

    महाशिवरात्रि पर शिव-पार्वती विवाह का पर्व मनाया जाता है। महादेव ने वैराग्य छोड़कर गृहस्थ जीवन क्यों अपनाया, यह सवाल गहरा है। पुराणों में ताड़कासुर वध ...और पढ़ें

    शिव-विवाह का रहस्य: महादेव ने कैलाश छोड़ काशी में क्यों बसाया घर (Picture Credit- AI Generated)

    शिव-विवाह का रहस्य: महादेव ने कैलाश छोड़ काशी में क्यों बसाया घर (Picture Credit- AI Generated)

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    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। निर्जन और ठंडे कैलाश पर्वत पर रहने वाले शिव शंकर कभी योगी, तो कभी कहलाते वैरागी थे, लेकिन उनके जीवन में भी एक दौर ऐसा आया, जब उन्होंने वैराग्य छोड़कर सांसारिक जीवन में कदम रखा। 

    इसी पल का जश्न मनाते हुए हर साल महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है। माता पार्वती से विवाह के बाद भोलेबाबा गंगा किनारे बसे काशी में रहने लगे। एक तरफ जहां कैलाश में जीवन का नामोनिशान नहीं था, वहीं काशी इसके बिल्कुल विपरीत था। यह नम, उष्ण और उर्वर था। 

    शिव ने विवाह क्यों किया?

    ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर महायोगी शिव 'गृहस्थ' क्यों बने? क्यों उन्होंने एकांत छोड़कर शादी की? इसका उत्तर जितना सरल लगता है, उतना है नहीं। महादेव पर बनी फिल्मों-सीरियल और पुराणों में भी यही बताया गया कि राक्षस ताड़कासुर का वध करने के लिए भोलेनाथ के पुत्र की जरूरत थी और इसी मकसद से देवताओं ने उनका विवाह कराया, लेकिन इस सवाल का जवाब सिर्फ यही तक सीमित नहीं है। 

    इस बारे में पंडित दीपक पांडेय बताते हैं कि महादेव ने शादी क्यों की, इसका जवाब असल में बहुत गहरा है। पुराणों और कथाओं में भले ही यह बताया गया है कि महादेव को किसी चीज की इच्छा नहीं थी। उन्हें भूख-प्यास नहीं लगती थी, लेकिन उनके आसपास मौजूद लोगों यानी सृष्टि की अपनी अलग जरूरतें थीं और इन्हीं की देखभाल करने और लोगों को एक खास संदेश देने से मकसद से उन्होंने शादी की और कैलाश से नीचे आए। 

    संवेदना का प्रतीक है शिव-शक्ति का मिलन

    इसे समझने के लिए हमें इसे खुद से जोड़कर देखा होगा। भले ही आपको धन-दौलत या शक्ति की चाहत नहीं होगी, लेकिन हमारे आसपास ऐसे कई लोग हैं, जिन्हें इन सारी चीजों की काफी जरूरत होती है। उसी तरह से भगवान शिव भले ही खुद योगी थे, लेकिन लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिए भोलेनाथ ने कैलाश से नीचे उतरकर दुनियादारी के तरीके अपनाए। यानी यह कहना गलत नहीं होगा कि शिव जी का विवाह अपनी संतानों के प्रति उनकी 'संवेदना' का प्रतीक है। 

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    जरूरत पूरी करते हैं गणेश और कार्तिकेय

    सिर्फ शिव का विवाह ही नहीं, बल्कि उनके दोनों पुत्र भी मानवता की दो सबसे बड़ी जरूरतों को पूरा करते हैं। एक ओर भगवान गणेश- जिनका पेट बड़ा है, वह संपन्नता का प्रतीक है। वह हमारी भूख मिटाते हैं और इसलिए वे मां अन्नपूर्णा के करीब हैं।

    वहीं, दूसरी तरफ कार्तिकेय, जिनके हाथों में शस्त्र है, देवताओं के सेनापति हैं। वह हमारी सुरक्षा करते हैं और हमारा भय दूर करते हैं, ठीक उसी तरह से जैसे शक्ति स्वरूप मां दुर्गा हमारी रक्षा करती हैं।

    जीवन जीने की सीख देता है शिव परिवार

    कुछ मिलाकर यह कहा जा सकता है कि भोलेनाथ का पूरा परिवार हमें जीवन जीना सिखाता है। वे हमें बताते हैं कि जीने के लिए लक्ष्मी यानी संसाधन और दुर्गा यानी सुरक्षा दोनों जरूरी हैं। वहीं, देवी पार्वती ने शिवजी को (जो खुद इच्छा रहित हैं) दूसरों की भूख और जरूरतों के प्रति जागरूक किया।

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