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    Mahashivratri 2026: विषपान या दक्ष का श्राप, क्यों है महादेव के मस्तक पर चंद्रमा? पढ़ें पौराणिक कथा

    Updated: Wed, 11 Feb 2026 01:52 PM (IST)

    महाशिवरात्रि 2026 से पहले यह लेख बताता है कि भगवान शिव अपने मस्तक पर चंद्रमा क्यों धारण करते हैं। इसमें दक्ष प्रजापति के श्राप से चंद्रमा की रक्षा और ...और पढ़ें

    शिवजी के मस्तक पर चंद्रमा के विराजने की कथा (Image Source: AI-Generated)

    शिवजी के मस्तक पर चंद्रमा के विराजने की कथा (Image Source: AI-Generated)

    HighLights

    1. दक्ष श्राप से चंद्रमा की रक्षा कर शिव ने मस्तक पर धारण किया

    2. चंद्रमा मन पर नियंत्रण और आंतरिक शांति का गहरा प्रतीक

    3. हलाहल विषपान के बाद शिव को शीतलता प्रदान की

    दिव्या गौतम, एस्ट्रोपत्री। देवों के देव महादेव का सबसे बड़ा पर्व महाशिवरात्रि इस साल 15 फरवरी 2026 को मनाया जाएगा। शिवजी का रूप जितना निराला है, उनके आभूषणों के पीछे छिपे संदेश उतने ही गहरे हैं। महादेव के मस्तक पर चमकता हुआ आधा चंद्रमा उनके दिव्य स्वरूप की शोभा बढ़ाता है। भक्त अक्सर यह जानना चाहते हैं कि आखिर शिवजी ने चंद्रमा को ही अपने मस्तक पर स्थान क्यों दिया? आइए, इस पावन अवसर पर चंद्रमा को धारण करने के पीछे के सुंदर रहस्यों और पौराणिक कथाओं को विस्तार से समझते हैं।

    दक्ष प्रजापति का श्राप और चंद्रमा की रक्षा

    पौराणिक कथाओं के अनुसार, चंद्रमा का विवाह राजा दक्ष की 27 पुत्रियों से हुआ था, जिन्हें हम नक्षत्रों के नाम से जानते हैं। चंद्रमा अपनी एक पत्नी रोहिणी से बहुत अधिक प्रेम करते थे, जिससे बाकी पत्नियां ईर्ष्या महसूस करती थीं। अपनी पुत्रियों का दुख देखकर राजा दक्ष अत्यंत क्रोधित हो गए और उन्होंने चंद्रमा को श्राप दे दिया कि उनका प्रकाश धीरे-धीरे कम हो जाएगा और वे पूरी तरह समाप्त हो जाएंगे। इससे बात से भयभीत होकर चंद्रमा ने भगवान शिव की शरण ली। शिवजी ने चंद्रमा की कठिन भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें जीवनदान दिया और उनके मान की रक्षा के लिए उन्हें अपने मस्तक पर स्थान दिया। इसी कारण चंद्रमा 15 दिन घटते और 15 दिन बढ़ते हैं।

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    मन की शांति और नियंत्रण का गहरा प्रतीक

    ज्योतिष शास्त्र में चंद्रमा को मन का स्वामी माना गया है। जैसे चंद्रमा की कलाएं कभी पूरी होती हैं तो कभी एकदम कम हो जाती हैं, वैसे ही मनुष्य का मन भी भावनाओं में कभी खुश तो कभी बहुत उदास होता है। महादेव के मस्तक पर चंद्रमा होने का अर्थ यह है कि उन्होंने अपने मन और इंद्रियों को पूरी तरह वश में कर लिया है। यह हमें संदेश देता है कि संसार की भागदौड़ और मानसिक उथल-पुथल के बीच भी हमें अपना मन शांत और स्थिर रखना चाहिए। जब हम अपने विचारों पर नियंत्रण पा लेते हैं, तभी हम महादेव की तरह एकाग्र होकर कठिन से कठिन परिस्थितियों का सामना बहुत ही सरलता के साथ करने में सफल हो सकते हैं।

    विष की ऊष्मा और शीतलता का संतुलन

    जब समुद्र मंथन से निकले भयंकर हलाहल विष को महादेव ने जगत कल्याण के लिए पिया था, तब उनके शरीर का तापमान बहुत अधिक बढ़ गया था। चंद्रमा को संपूर्ण ब्रह्मांड में शीतलता का मुख्य प्रतीक माना जाता है। महादेव के शरीर की उस तीव्र ऊष्मा को कम करने, उन्हें ठंडक पहुंचाने और विष के घातक प्रभाव को शांत करने के लिए चंद्रमा ने स्वयं उनके मस्तक पर निवास करने की प्रार्थना की। महादेव ने चंद्रमा की इस सेवा को स्वीकार किया और उन्हें अपने शीश पर धारण किया। यह शिवजी की अपार करुणा और संसार के प्रति उनके प्रेम को दर्शाता है। यह स्वरूप हमें सिखाता है कि शक्ति का सही उपयोग दूसरों के दुखों को हरने और शांति फैलाने के लिए ही करना चाहिए।

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    लेखक: दिव्या गौतम, Astropatri.com अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए hello@astropatri.com पर संपर्क करें।