सौम्य और शांत माता सीता को क्यों लेना पड़ा रणचंडी का रूप? इस तरह हुआ कुंभकर्ण के पुत्र का वध
आनंद रामायण के अनुसार, माता सीता ने कुंभकर्ण के मायावी पुत्र मूलकासुर का वध किया था। चलिए पढ़ते हैं यह अद्भुत कथा।
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माता सीता ने क्यों लिया रणचंडी का रूप?
HighLights
मूलकासुर को वरदान था कि उसे कोई स्त्री ही मार सकती है
माता सीता ने चंडी रूप धारण कर मूलकासुर का वध किया
मूलकासुर के वध की कथा आनंद रामायण में वर्णित है
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। मूल रामायण महर्षि वाल्मीकि द्वारा संस्कृत भाषा में लिखी गई थी, जिसे 'आदिकाव्य' भी कहा जाता है। इसके अलावा समय के साथ, विभिन्न कवियों और संतों ने रामायण को अपनी क्षेत्रीय भाषाओं और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, अनुवादित या रूपांतरित किया।
आज हम आपको आनंद रामायण में वर्णित एक ऐसी कथा के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसके अनुसार, माता सीता ने स्वयं युद्ध के मैदान में राक्षस का वध किया था।
आनंद रामाणय में मिलता है वर्णन
यह तो हम सभी जानते हैं कि माता सीता केवल भगवान राम की अर्धांगिनी ही नहीं, बल्कि साक्षात् आदि शक्ति और भगवती का स्वरूप हैं। उनके स्वरूप की बात कई जाए, तो वह त्याग, धैर्य, प्रेम, और अपार शक्ति का संगम हैं। लेकिन आनंद रामाणय में यह वर्णन मिलता है कि माता सीता ने एक बार मां चंडी का रूप धारण किया था।
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(Picture Credit: Freepik) (AI Image)
मूलकासुर को प्राप्त था ये वरदान
कुंभकर्ण के पुत्र का नाम मूलकासुर था, जो बहुत मायावी और शक्तिशाली था। मूल नक्षत्र में पैदा होने के कारण इसका नाम मूलकासुर पड़ा, जिसे अशुभ जानकर कुंभकर्ण ने जंगल में फिंकवा दिया था। वहां मधुमक्खियों ने मूलकासुर को पाला। मूलकासुर जब बड़ा हुआ तो, उसने कठोर तपस्या करके ब्रह्माजी को प्रसन्न किया और उसने यह वदरान प्राप्त किया कि कोई भी पुरुष या प्रमुख पराशक्ति (देवता) उसे नहीं मार सकेगा। उसका अंत केवल एक स्त्री के हाथों ही संभव था।
भगवान राम को युद्ध के लिए ललकारा
मूलाकसुर ने कुंभकर्ण और रावण की मृत्यु का बदला लेने के लिए प्रभु श्रीराम को युद्ध के लिए ललकारा। मूलकासुर भगवान श्रीराम की सेना पर अकेले ही भारी पड़ रहा था। 7 दिनों तक घोर युद्ध होता रहा। वरदान के चलते भगवान राम भी उसे परास्त नहीं कर पा रहे थे। तब उन्होंने पुष्पक विमान को सीता जी को युद्ध भूमि में लाने के लिए भेजा। पति का संदेश सुनकर सीता जी तुरंत चल दीं और भगवान श्रीराम के आदेश पर वह मूलाकसुर का वध करने के लिए तैयार हो गईं।

(Picture Credit- AI Generated)
इस तरह हुआ मूलकासुर का वध
मूलकासुर का अंत करने के लिए माता सीता ने क्रोध में 'चंडी' (काली) का रूप धारण किया। कुछ देर तक दोनों के बीच कुछ देर तक घोर युद्ध हुआ। अंत में माता सीता ने ‘चंडिकास्त्र’ चलाया जिससे मूलकासुर का सिर उड़कर लंका के दरवाजे पर जा गिरा। यह दृश्य देखकर सभी राक्षस हाहाकार करते हुए इधर-उधर भाग खड़े हुए। मूलकासुर का वध करने के बाद माता सीता पुनः अपने पुराने रूप में लौट आईं।
अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।
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