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श्रीमद्भगवद्गीता की सीख: ये 3 गलतियां सफलता से रखती हैं हमेशा दूर, ऐसे लोग जीवन में नहीं करते उन्नति

Updated: Mon, 03 Aug 2026 10:00 AM (IST)

श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार, जीवन में सफलता न मिलने के पीछे कुछ गलतियां जिम्मेदार होती हैं। इंद्रियों पर नियंत्रण न रखना, कर्मों पर भरोसा न करना और क्रोध करना व्यक्ति को उन्नति से रोकते हैं।

गीता के उपदेश: ये 3 गलतियां आपको कभी सफल नहीं होने देंगी (Picture Credit: AI Generated)

गीता के उपदेश: ये 3 गलतियां आपको कभी सफल नहीं होने देंगी (Picture Credit: AI Generated)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हमारे जीवन में ऐसे कई पल आते हैं जब सब कुछ बिखरता हुआ लगता है। सालों की मेहनत के बाद भी आपको जीवन में सफलता नहीं मिलती है और आप इसका सही कारण भी नहीं जान पाते हैं।

दरअसल, इसके लिए कई बार आपकी ही कुछ आदतें और गलतियां जिम्मेदार होती हैं। श्रीमद्भगवद्गीता में श्री कृष्ण ने अर्जुन को ऐसे कई उपदेश दिए हैं जिनका पालन आज भी सफलता के मार्ग की तरफ प्रेरित करता है। वहीं इनका सही तरीके से पालन न कर पाने से व्यक्ति को हमेशा असफलता ही मिलती है।

गीता के श्लोक हमें गहरी सीख देते हैं कि कैसे हम अपनी हार को आगे बढ़ने के मौकों में बदल सकते हैं। आइए आपको बताते हैं ऐसी कुछ गलतियों के बारे में जो गीता के अनुसार, व्यक्ति को सफल होने से रोक सकती हैं और आपको इनसे बचने की जरूरत होती है।

अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण न रखना

अगर आप भी उनमें से हैं जो अपनी इच्छाओं और इन्द्रियों पर नियंत्रण नहीं रख पाते हैं, तो आपकी यह आदत हमेशा आपको असफल बनाती है। श्री कृष्ण गीता में बताते हैं कि जिस व्यक्ति के भीतर इन्द्रियों को अपने वश में करने के गुण मौजूद होते हैं वो जीवन में कभी असफल नहीं हो सकता है। वहीं अपनी इच्छाओं को सबसे ऊपर रखने वाला कभी सफल नहीं हो सकता है। इसके लिए गीता में एक श्लोक है-

'तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥'

इसका मतलब यह है कि- उन सभी इंद्रियों को वश में करके साधक को चाहिए कि वह मन परमात्मा में लगाकर स्थिर रहे। जिस पुरुष की इन्द्रियां नियंत्रण में होती हैं, उसी की बुद्धि स्थिर होती है और वो जीवन में सफल होता है।

अपने कर्मों पर भरोसा न रख पाना

कई लोग ऐसे होते हैं जिन्हें अपने कर्मों पर ही भरोसा नहीं होता है। ऐसे लोग कभी भी सफलता हासिल नहीं कर पाते हैं। अपने कर्मों पर जो पूरी तरह से यकी नहीं करता है वो जाने अनजाने जीवन में असफलता को आमंत्रित करता है। वहीं श्री कृष्ण ने गीता में उपदेश देते हुए कर्म को सबसे बड़ी पूंजी बताया है। इसके लिए एक श्लोक है-

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥

इस श्लोक का अर्थ है- तुम्हारा अधिकार केवल कर्म है। कर्म के फल पर तुम्हारा कोई अधिकार नहीं है। तुम कभी भी कर्म के फल की इच्छा मत करो और कर्म न करने की तुम्हारी कभी इच्छा न हो। जो व्यक्ति बिना फल की इच्छा के ही कर्म पर ध्यान देता है वही सफल होता है।

हमेशा क्रोध करने वाला व्यक्ति

जो व्यक्ति हमेशा क्रोध करता है उसे भी जीवन में कभी सफलता नहीं मिलती है। इसके लिए गीता में एक श्लोक मिलता है-

क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनोशो बुद्धिनोशात्प्रणश्यति।

इस श्लोक का मतलब यह है कि क्रोध से अविवेक उत्पन्न होता है। अविवेक से मति भ्रमित होती है। मति भ्रमित होने से बुद्धि नष्ट हो जाती है और बुद्धि का नाश होने पर मनुष्य का पतन हो जाता है। अर्थात ऐसा व्यक्ति जीवन में कभी सफल नहीं हो पाता है जो अपने क्रोध पर नियंत्रण नहीं रख पाता है।

गीता में ऐसी कई श्लोक हैं जो बताते हैं कि व्यक्ति को जीवन में सफलता कैसे मिल सकती है और किन बातों का पालन न कर पाने से वह कभी सफल नहीं होता है।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।