हिमालय की महायात्रा: जानिए कैसे 4 सींग वाली भेड़ करती है 'नंदा देवी राजजात' का नेतृत्व?
उत्तराखंड में हर 12 साल में आयोजित होने वाली नंदा देवी राजजात यात्रा एक महत्वपूर्ण धार्मिक जुलूस है, जिसका नेतृत्व चार सींग वाली भेड़ करती है।

नंदा देवी राज जात यात्रा
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। उत्तराखंड के कुमाऊं में कई जगहों पर मां नंदा देवी की पूजा की जाती है। हर 12 साल में नंदा देवी के सम्मान में 'नंदा देवी राजजात यात्रा' जो कि एक बड़ा धार्मिक जुलूस है, आयोजित किया जाता है। नंदा राजजात यात्रा में कुमाऊं, गढ़वाल के साथ-साथ भारत के कई हिस्सों से श्रद्धालु इसमें भाग लेने के लिए आते हैं।
इस जुलूस का नेतृत्व 4 सींग वाली भेड़ करती है। उत्तराखंड में भेड़ को पवित्र जानवर माना जाता है, जो कर्णप्रयाग के पास नौटी गांव से करीब 18 दिनों तक करीब 280 किलोमीटर की पदयात्रा करते हुए जुलूस का नेतृत्व करता है। यह हर रात देवी की पवित्र छतरी के पास नजदीक आराम करता है।
भेड़ के पीछे नंगे पैर चलते हुए तीर्थयात्री रूप कुंड और शैल समुद्र ग्लेशियर की ऊंचाई से लेकर होमकुंड झील तक जाते हैं। हेमकुंड में नंदा घुंटी पर्वत के आधार के पास भेड़ देवी के लिए उपहास से लदी हुई पहाड़ों में चली जाती है। माना जाता है कि यह भेड़ फिर कभी नहीं दिखाई देती है।
नंदा देवी राज जाट का इतिहास
माना जाता है कि, नंदा देवी राज जाट यात्रा की शुरुआत 7वीं शताब्दी में हुई थी। तब से यह हिमालयी समुदायों के बीच धार्मिक पहचानों को एकजुट करने में अहम भूमिका निभाती है।
करीब 1970 में कुमाऊं के कुमार परिवार ने यात्रा के आयोजन की जिम्मेदारी संभाली थी। वे करीब 300 सालों से इस भूमिका को निभाते हुए आ रहे हैं।

नंदा देवी का महत्व
नंदा देवी को कुमाऊं क्षेत्र की कुलदेवी के रूप में पूजा जाता है। गढ़वाल के स्थानीय भक्त उन्हें 'राज राजेश्वरी' के नाम से जानते हैं। आज उनकी तीर्थयात्रा कुमाऊं और गढ़वाल क्षेत्र के सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और पर्यावरणीय महत्व को भी दर्शाती है।
उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में नंदा देवी को माता पार्वती का अवतार माना जाता है। कुमाऊं में नंदा देवी की पूजा चंद वंश के शासन काल से ही चली आ रही थी। शुरुआत में भक्त सिर्फ नंदा देवी की एक ही मूर्ति की पूजा करते हैं। लेकिन बादशाह बाज बहादुर चंद के शासनकाल में देवी सुंनदा की एक और मूर्ति को शामिल किया जाने लगा।
कुमाऊं मंडल के अधिकतर हिस्सों से दिखाई देने वाली नंदा देवी और सुनंदा देवी की जुड़वा चोटियों को इन देवियों का निवास स्थान भी माना जाता है। यह पर्वत करीब 7816 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है, जो इसे भारत की दूसरी सबसे ऊंची चोटी बनाता है।
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