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    कामदेव के भस्म होने के बाद माता पार्वती ने शिव जी को प्रसन्न करने के लिए कौन सी कठोर तपस्या की थी?

    Updated: Thu, 22 Jan 2026 03:30 PM (IST)

    क्या आप जानते हैं कामदेव के भस्म होने के बाद माता पार्वती ने शिव जी को कैसे मनाया? जानें उनके कठोर 'पंचाग्नि तप' और 'अपर्णा' बनने की पूरी कहानी, जिसका ...और पढ़ें

    मां पार्वती ने कैसे किया शिव को प्रसन्न (Image Source: AI-Generated)

    मां पार्वती ने कैसे किया शिव को प्रसन्न (Image Source: AI-Generated)

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    जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

    संक्षेप में पढ़ें

    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। भगवान शिव द्वारा कामदेव को भस्म किए जाने के बाद, माता पार्वती का मन अत्यंत व्यथित हो गया था। उन्होंने महसूस किया कि शिव को केवल शारीरिक सौंदर्य से नहीं, बल्कि सच्ची भक्ति और तपस्या से ही प्राप्त किया जा सकता है। इसके बाद उन्होंने जो तपस्या की, वह अडिग विश्वास और प्रेम की एक अद्भुत मिसाल है।

    माता पार्वती की कठिन तपस्या का सफर

    1. राजसी सुखों का त्याग

    माता पार्वती ने हिमालय की चोटियों पर जाकर तपस्या करने का फैसला लिया। उन्होंने अपने राजसी वस्त्रों और आभूषणों को त्याग दिया और मृगछाल धारण की। उन्होंने अपने शरीर पर भस्म रमाई और एक तपस्विनी का जीवन शुरू किया।

    2. पंचानन तपस्या

    पार्वती जी ने 'पंचाग्नि' तप किया, जिसमें तपती गर्मी के दौरान चारों ओर अग्नि जलाकर और ऊपर से सूर्य की प्रचंड गर्मी को सहते हुए वे मंत्रों का जाप करती रहीं। वर्षा ऋतु में उन्होंने खुले आसमान के नीचे जल की मूसलाधार धाराओं को सहा, लेकिन उनकी एकाग्रता नहीं टूटी।

    3. 'अपर्णा' का नाम मिलना

    तपस्या के अगले चरण में उन्होंने भोजन का त्याग कर दिया। शुरुआत में वे केवल कंद-मूल और फल खाती थीं। फिर उन्होंने केवल पेड़ों से गिरने वाले पत्तों पर निर्भर रहना शुरू किया। अंत में, उन्होंने पत्तों को खाना भी छोड़ दिया, जिसके कारण उनका नाम 'अपर्णा' (बिना पत्ते के रहने वाली) पड़ा।

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    Shiva Parvati

    (Image Source: AI-Generated)

    4. शिव की परीक्षा

    जब उनकी तपस्या चरम पर थी, तब भगवान शिव एक ब्रह्मचारी बटुक का रूप धारण कर उनके पास आए। उन्होंने शिव की बुराई की ताकि पार्वती जी की निष्ठा जांची जा सके। लेकिन, पार्वती जी ने बड़े ही शांत भाव से उत्तर दिया कि वे शिव के हर रूप से प्रेम करती हैं और उनके अलावा किसी और का वरण नहीं करेंगी।

    पार्वती की तपस्या का फल

    पार्वती जी की इस कठोर परीक्षा और अटूट भक्ति को देखकर शिव जी बेहद प्रसन्न हो गए। इसके बाद वे पार्वती के सामने अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हुए और पार्वती जी को अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया।

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    अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।