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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jul 16, 2022 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

Sawan 2022: भगवान शिव पार्वती का स्वाभिमान हैं तो माता पार्वती महादेव का स्वावलंबन

By Sanjay PokhriyalEdited By:
Updated: Sat, 16 Jul 2022 01:32 PM (IST)

सावन भगवान शिव का पावन माह है तो उनकी शक्ति देवी पार्वती का भी। शिव पार्वती का स्वाभिमान हैं तो ...और पढ़ें

Sawan 2022: शिव, सावन और नारी स्वावलंबन।
Sawan 2022: शिव, सावन और नारी स्वावलंबन।

उषा किरण खान। शिव हो, उतरब पार कवने विधि लोढ़ब फूल तोड़ब बेलपात...यह या इसी तरह के लोकगीत गाती हुई महिलाएं फूल और बेलपत्र एकत्र कर शिव का पूजन करती हैं सावन माह में। सावन एक समृद्ध और सौष्ठवपूर्ण माह है। यह माह प्रकृति में हरीतिमा का सौंदर्य और अपनी एक अलग छटा बिखेरता है। शायद यही कारण था कि भगवान श्रीकृष्ण ने कहा था कि माह में मैं सावन हूं। अपने जन्म मास भाद्रपद को नहीं कहा।

हम मूलत: कृषि आधारित देश के वासी हैं। अब तक ऋतुओं के वर्णन के हिसाब से सावन वर्षा ऋतु का दूसरा अहम् मास है। यह माह मेघ जल से सिंचित कर देता है धरणी को। इस दौरान धान रोपे जाते हैं साथ ही भविष्य की आशा लहराने लगती है। पोखर, झीलें और नदियां जल से भर जाती हैं। कृषि कार्य का परिणाम भी दिखने लगता है। इसीलिए सावन को पूजन का माह मानने लगते हैं लोग। शिव महादेव हैं और उनके गण, उनका परिवार विश्व है। उन्हें देह-गेह की चिंता नहीं रहती, वह जनकल्याणकारी परमेश्वर हैं। वह सहज समन्वयकारी हैं।

शायद यही कारण है कि उनके सान्निध्य में मूषक, सांप, बैल, बाघ, मोर जैसे परस्पर विरोधी प्राणी स्थायी रूप सेे अकुंठ भाव से रहते आए हैं। वह प्रकाश के भी स्रोत है। प्रकाश उनके पास है चंद्रमा के रूप में शीतलता प्रदान करता हुआ। पतित पावनी गंगा उनकी जटाओं में हैं पृथ्वी को जलाप्लावित करने की आकांक्षा लिए। अत: शिव एक संपूर्ण इकाई हैं, परंतु शिव कभी अकेले नहीं होते, उनके साथ हमेशा शक्ति होती हैं। वह युग्म हैं, वह अद्र्र्धनारीश्वर हैं। शिव, शक्ति के बिना शव हैं। दीर्घ ईश्वर इस इकाई के बिना अपने को शव जानते हैं। यही प्रकृति की रचना का रहस्य है; यही उनके जीने की कला है। जियो और जीने दो। शिव की पत्नी उमा, सती, पार्वती सब एक में अनेक हैं। स्त्री को पूर्ण सम्मान देने वाले शिव को स्वयं के मान अपमान का बोध नहीं रहता है।

यह कथा बहुप्रचलित है कि सती के पिता दक्ष प्रजापति भगवान शिव को श्मशानचारी समझ यज्ञ में नहीं बुलाते हैं। वह अपनी बेटी सती को भी नहीं बुलाते हैं। फिर भी सती पितृगृह जाती हैं। वहां वह देखती हैं कि देवताओं में से उनके पति और भगवान शिव का नाम हटा हुआ है। सती के प्रश्न करने पर पिता दक्ष उनके प्रश्न का उत्तर न देकर साथ ही उनके पति और भगवान शिव को श्मशान में बैठने वाला अवधूत कहकर हंसी उड़ाते हैं। इसके साथ ही दक्ष प्रजापति यह भी कहते हैं कि तुम्हें तो बुलाया ही नहीं गया है, फिर आई क्यों हो? पिता की बात सुनकर देवी सती को अपमान बोध होता है और वह पिता द्वारा किए गए अपमान से पीडि़त होकर वहां हो रहे यज्ञ की अग्नि में अपने शरीर की आहुति दे देती हैं। इससे यज्ञ तो ध्वंस होता ही है साथ ही हर तरफ और दसों दिशाओं में हाहाकार मच जाता है।

देवी सती के भस्म होने की जानकारी होते ही भगवान शिव यज्ञशाला आते हैं और वहां आते ही भयंकर क्रोध में आ जाते हैं। वह क्रोधित होकर अपनी तीसरी आंख खोलते हैं। भगवान शिव के ऐसा करते ही भीषण च्वाला से धरती और आकाश जलने लगते हैं। पत्नी का अपमान हो जाने की वजह से वह क्रोधित होकर देवी सती के पिता और अपने श्वसुर दक्ष प्रजापति का सिर धड़ से अलग कर देते हैं। इतने पर भी शिव का क्रोध शांत नहीं होता है और वह देवी सती का शरीर अपने हाथों में उठाते हैं और तांडव करने लगते हैं। कहा जाता है कि देवी सती के जले अंग जिस-जिस स्थान पर जाकर गिरे थे, वे पवित्र स्थान ही आज शक्तिपीठ के रूप में पूजे जाते हैं।

बहुत ही अनुनय-विनय के बाद भगवान शिव शांत होते हैं, आखिर वह आशुुतोष जो ठहरे। वह देवी सती के पिता दक्ष प्रजापति को सिर भी प्रदान करते हैं, परंतु दक्ष को हमेशा अपनी भूल का पश्चाताप होता रहे। इसलिए उनके धड़ पर मनुष्य के बजाय बकरे का सिर लगाते हैं। पत्नी के स्वाभिमान की रक्षा करने वाले भगवान शिव की पवित्र सावन माह में विशेष पूजा-अर्चना करके महिलाएं अपने मन में यही कामना करती हैं कि भगवान उन्हें भी ऐसा ही वर दे, जो उनके स्वाभिमान की रक्षा करे। स्त्रियां भगवान शिव को इतना महत्व क्यों देती हैं, इसका एक और बड़ा कारण भी है कि जहां देवी लक्ष्मी हमेशा भगवान विष्णु की सेवा करते हुए उनके चरण कमल दबाती हुई दिखाई पड़ती हैं, वहीं मां गौरी अर्थात देवी पार्वती शिव के आधे शरीर में विराजती हैं। भगवान शिव ऐश्वर्य के लिए नहीं जाने जाते हैं। वह ऐश्वर्य से दूर रहते हैं, लेकिन प्रकृति के सर्वाधिक निकट हैं। यही वजह है कि वह पशुपतिनाथ भी कहलाते हैं अर्थात जीव-जंतुओं के संरक्षक। वह अपने साथ कभी भी धन-दौलत लेकर नहीं चलते हैं, किंतु बड़े दानी कहलाते हैं। वह औघड़दानी के नाम से भी जाने जाते हैं। इस संदर्भ में

मैथिल कविवर विद्यापति के गीत जन-जन में व्याप्त हैं-

टूटली फाटली मड़ैया

अधिक सोहावन हे

ताही तर गौरा भेली ठाढि़

मनहिं मन झांखथि हे...

इसका अर्थ है कि महादेव की पत्नी गौरा टूटी झोपड़ी के सामने खड़ी हैं और चिंतित हैं। यह शिव का जनपक्षी रूप है।

एक लोककथा है कि एक बार देवी गौरा ने शिव से कहा कि आप खेती-किसानी कीजिए। इस पर शिव उनकी बात मान जाते हैं और किसी से दूसरा बैल मांग लाते हैं और जमकर मेहनत करते हैं। देवी गौरा कुछ दिनों बाद खेतों की तरफ जाती हैं तो वहां हरे-भरे खेतों में भांग और धतूरे लहलहा रहे होते हैं। इस पर देवी गौरा अपना सिर पीट लेती हैं। ऐसे भोले हैं भोले बाबा! आधुनिक काल में स्त्रियों को शिव सबसे अधिक आकर्षित करते हैं, क्योंकि उनके जीवन में किसी प्रकार का निषेध नहीं है। यही कारण है कि देवी पार्वती घोर तपस्या करके बाघंबर धारी शिव को चुनती हैं। गौरी शिव की तरह सहजीवन जीते सर्वसुलभ सर्वव्यापक जोड़ी ही सावन का अभीष्ट है।

[वरिष्ठ साहित्यकार]