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शारदीय नवरात्र 2026: आखिर कलश स्थापना के साथ जौ क्यों बोते हैं? ब्रह्मा जी से जुड़ा है इसका खास रहस्य

Published: Fri, 09 Oct 2026 09:13 AM (IST)Updated: Sun, 11 Oct 2026 09:24 AM (IST)

शारदीय नवरात्र में घटस्थापना के साथ जौ बोने का विशेष महत्व है, क्योंकि इसे ब्रह्मा जी द्वारा उत्पन्न पहला अनाज ...और पढ़ें

शारदीय नवरात्र में जौ बोने की सरल विधि (Picture Credit: AI Generated)

शारदीय नवरात्र में जौ बोने की सरल विधि (Picture Credit: AI Generated)

HighLights

  1. जौ ब्रह्मा जी द्वारा उत्पन्न पहला अनाज, सृष्टि का प्रतीक।

  2. घटस्थापना के दौरान जौ बोना अत्यंत शुभ और महत्वपूर्ण।

  3. जौ बोने से घर में सुख-शांति और मां दुर्गा की कृपा।

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। वैदिक पंचांग के अनुसार, शारदीय नवरात्र (Shardiya Navratri 2026) की शुरुआत आज यानी 11 अक्टूबर से हुई है। इस उत्सव को मां दुर्गा की कृपा प्राप्त करने के लिए शुभ माना जाता है। शारदीय नवरात्र के पहले दिन घटस्थापना करने का विधान है।

इस दौरान घटस्थापना के साथ जौ भी बोए जाते हैं। जौ के बर्तन को मंदिर में रखा जाता है और कन्या पूजन के बाद जौ को मिट्टी समेत पवित्र नदी में विसर्जित कर दिया जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि शारदीय नवरात्र में जौ क्यों बोए जाते हैं? अगर नहीं, तो आइए इस आर्टिकल में विस्तार से इसके पीछे की वजह जानते हैं।

शारदीय नवरात्र में क्यों बोए जाते हैं जौ?

शारदीय नवरात्र के पहले दिन जौ बोना बहुत ही शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, जौ बोने से घर में सदैव सुख-शांति बनी रहती है। साथ ही मां दुर्गा की कृपा परिवार के सदस्यों पर बनी रहती है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जौ को पहला अनाज माना जाता है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि जौ को ब्रह्मा जी का स्वरूप भी कहा जाता है। जब ब्रह्मा जी ने ब्रह्मांड की रचना की थी, तो सबसे पहली वनस्पति और अन्न के रूप में जौ ही उत्पन्न हुआ था। इसे सृष्टि की पूर्णता और शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। इसी वजह से शारदीय नवरात्र के पहले दिन जौ बोने का विशेष महत्व है। इसके बिना घटस्थापना अधूरी मानी जाती है।

जौ बोने की सही विधि

  • शारदीय नवरात्र से एक रात पहले जौ को पानी में भिगो दें।
  • अगले दिन सुबह स्नान करने के बाद, घटस्थापना के लिए एक मिट्टी के बर्तन में शुद्ध मिट्टी लें।
  • बर्तन में मिट्टी की एक परत बिछाकर भीगे हुए जौ के दाने समान रूप से फैलाएं।
  • इसके बाद बीजों को मिट्टी की एक बहुत पतली परत से ढक दें।
  • अब इसके ऊपर हल्के से पानी का छिड़काव करें।
  • इस पात्र को माता रानी की चौकी या कलश के पास स्थापित करें।
  • रोजाना इसमें थोड़ा-थोड़ा पानी छिड़कें।
  • मां दुर्गा की पूजा के साथ-साथ जौ की भी पूजा-अर्चना करने का विधान है।
  • अष्टमी या नवमी के दिन कन्या पूजन के बाद, इसे पूजा की अन्य सामग्री के साथ पवित्र नदी में विसर्जित कर दें।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।