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    सनातन धर्म में मनुष्य के 6 सबसे बड़े आंतरिक शत्रु के नाम क्या हैं? पढ़ें षडरिपु का पूरा सच

    Updated: Thu, 09 Jul 2026 01:36 PM (GMT+05:30)

    सनातन धर्म में मनुष्य की बर्बादी का कारण उसके आंतरिक दोषों, जिन्हें षडरिपु कहते हैं, को बताया गया है। ...और पढ़ें

    हिंदू धर्म में षडरिपु क्या है?  (Picture Credits- AI Image)

    हिंदू धर्म में षडरिपु क्या है? (Picture Credits- AI Image)

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    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। सनातन धर्म में मनुष्य के बर्बादी के कारण बाहरी दुश्मन को नहीं, बल्कि उसके अंदर छिपे हुए दोषों को बताया गया है। इन्ंही आंतरिक दुश्मनों को षडरिपु कहा जाता है। जिसमें षड का मतलब 6 और रिपु का मतलब है शत्रु यानी दुश्मन। ये 6 शत्रु काम, क्रोध, मोह, लोभ, मद और मत्सर है।

    ये षडरिपु व्यक्ति के मन को अशांत करने का काम करते हैं, उसकी बुद्धि को भ्रमित करने के साथ उसे धर्म तथा आत्मज्ञान के रास्ते से दूर ले जाते हैं। जब तक व्यक्ति इन पर नियंत्रण हासिल नहीं करता, तब तक वास्तविक सुख, शांति और आध्यात्मिक उन्नति हासिल करना बेहद मुश्किल है। आइए जानते हैं मन में छिपे हुए इन 6 शत्रुओं के बारे में।

    काम

    शडरिपु के अंतर्गत आने वाला पहला शत्रु जिसे काम कहा गया है। काम का मतलब सिर्फ वासना नहीं है। इसका असल मतलब किसी भी व्यक्ति, वस्तु, पद या सुख को हासिल करने की तीव्र और काबू में न रहने वाली इच्छा है। जीवन में इच्छाएं स्वाभाविक हैं, लेकिन जब वे मनुष्य पर काबू कर लें, तब वे काम काम का रूप ले लेती हैं।

    काम के वश में आकर व्यक्ति के सोचने-समझने की क्षमता कमजोर हो जाती है। वह सही और गलत के बीच फैसला नहीं कर पाता, सिर्फ अपनी इच्छाओं की पूर्ति में लग जाता है। यही वजह है कि, शास्त्रों में काम को मनुष्य का पहला और बेहद शक्तिशाली शत्रु कहा गया है।

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    क्रोध

    जब व्यक्ति की इच्छाएं पूरी नहीं होती है या उसके अहंकार को ठेस पहुंचती है तब गुस्से का जन्म होता है। गुस्सा एक ऐसी अग्नि है जो सबसे पहले उसी व्यक्ति को जलाती है जिसके अंदर वह उत्पन्न होती है। गुस्सा के प्रभाव में मनुष्य ऐसे फैसले लेता है, जिनका उसे बाद में काफी पश्चाताप होता है। कई बार गुस्से में बुद्धि भ्रमित होने के साथ रिश्ते टूट जाते हैं और मन की शांति नष्ट हो जाती है। इसलिए शास्त्रों में गुस्से को विनाश से जोड़कर देखा जाता है।

    लोभ

    लोभ का असल मतलब होता है, जरूरत से ज्यादा पाने की इच्छा। लोभी व्यक्ति के पास भले ही कितना भी पैसा, सम्मान या संपत्ति क्यों न हो, उसे हमेशा और अधिक की चाह रहती है। लोभ कभी भी संतुष्ट नहीं होता। यह मनुष्य को असंतोष, चिंता और अधर्म के रास्ते पर ले जाता है। लोभ की वजह से ही व्यक्ति दूसरों के अधिकारों का हनन करने के साथ सिर्फ अपना ही फायदा सोचता है। जहां संतोष की कमी है वहां लोभ जन्म लेता है।

    काम, क्रोध, मोह, लोभ, मद और मत्सर

    मोह

    संसार में किसी भी व्यक्ति, वस्तु या संबंधों के प्रति ज्यादा लगाव ही मोह कहलाता है। मोह के वजह से ही व्यक्ति वस्तुओं को स्थायी समझ बैठता है, जबकि इस संसार में सब कुछ परिवर्तनशील है। मोह व्यक्ति को सच्चाई दिखाने का काम करता है।

    वह अपने खास लोगों, पैसा या पद के प्रति इतना आसक्त हो जाता है, कि धर्म और कर्म का भी त्याग कर देता है। जन्म-मरण के चक्र में बांधे रखने वाली प्रमुख शक्ति मोह ही है।

    मद

    ऐसा इंसान जिसे पैसा, ज्ञान, सौंदर्य, ताकत, पद या किसी भी तरह की उपलब्धि का घमंड हो जाता है, उसे ही मद कहते हैं। जब व्यक्ति खुद को दूसरों से बड़ा और महान समझने लगता है, तब मद यानी अहंकार का जन्म होता है।

    अहंकार व्यक्ति को विनम्रता से दूर करता है। ऐसी स्थिति में वह व्यक्ति दूसरों की बात सुनना बंद कर देता है और अपनी गलतियों को नहीं मानता है। भारतीय इतिहास और पुराण में ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं, जहां महान शक्तिशाली व्यक्ति के पतन का कारण उसका अहंकार ही बना।

    मत्सर

    ऐसा इंसान जो दूसरों की तरक्की को देखकर जलता या दुखी होता है और खुद को उनसे श्रेष्ठ साबित करने की इच्छा रखता है, उसे ही मत्सर कहते हैं यानी ईर्ष्या करने वाला व्यक्ति। ईर्ष्या व्यक्ति के अंदर से शांति को खत्म कर देती है।

    मत्सर के प्रभाव में व्यक्ति खुद के विकास पर ध्यान देने की बजाय दूसरों को नीचे गिराने में अपनी एनर्जी बर्बाद कर देता है।

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    अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।