महाभारत युद्ध का वो पल, जब एक महादानी के अंत पर छलके थे माधव के आंसू
महाभारत युद्ध (Mahabharat Katha) में कर्ण की मृत्यु ने भगवान श्रीकृष्ण को भी भावुक कर दिया था। कर्ण को छल से पराजित किया गया था, जबकि वे धर्म के साक्ष ...और पढ़ें

Mahabharat Katha: महाभारत कथा।
HighLights
कर्ण का अंत तब हुआ जब वह असहाय थे
कर्ण महादानी थे
कर्ण कुंती के बड़े पुत्र थे
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। Mahabharat Katha: महाभारत का युद्ध केवल एक संग्राम नहीं था, बल्कि वह धर्म की जीत का प्रतीक था। इस युद्ध में कई महान योद्धा वीरगति को प्राप्त हुए, लेकिन महारथी कर्ण का अंत एक ऐसी घटना थी, जिसने खुद जगत के स्वामी भगवान श्रीकृष्ण को भी झकझोर कर रख दिया था। कर्ण महाभारत कथा के उन पात्रों में से एक थे जिनकी वीरता और दानवीर होने की कथा आज भी लोगों को सुनाई जाती है, आइए महाभारत युद्ध के उस पल के बारे में जानते हैं जब एक महादानी के अंत पर भगवान कृष्ण के आंसू छलके थे।

Ai Generated Image
कर्ण की हार
महाभारत कथा के अनुसार, कर्ण का अंत तब हुआ जब वह असहाय थे, उनका रथ धरती में धंसा था और वह शस्त्रहीन थे। अर्जुन के बाण ने जब कर्ण का शीश काटा, तो पांडव की ओर विजय का शंखनाद हुआ, लेकिन श्रीकृष्ण के मुख पर जरा सी भी मुस्कान नहीं थी। कृष्ण जानते थे कि जिस योद्धा को उन्होंने छल और नीति से हराया, वह खुद धर्म का साक्षात स्वरूप था।
कृष्ण की पीड़ा यह थी कि उन्हें एक ऐसे व्यक्ति की मृत्यु की योजना बनानी पड़ी, जिसने अपना पूरा जीवन केवल त्याग और अपमान में बिताया। वहीं, जब कर्ण मृत्युशैया पर थे, तब भगवान कृष्ण ने उनकी दानवीरता की अंतिम परीक्षा ली। कर्ण ने अपने रक्त से सने सोने के दांत को तोड़कर ब्राह्मण बने कृष्ण जी को दान कर दिया। उस पल माधव की आंखें आंसुओं से भर गई। उन्होंने स्वीकार किया कि दानवीरता के मामले में वे खुद भी कर्ण से पीछे हैं।
माधव की अनकही व्यथा
- कर्ण के वध के बाद जब श्री कृष्ण अर्जुन के साथ शिविर की ओर लौट रहे थे, तो वे बहुत शांत थे।
- कृष्ण भगवान जानते थे कि कर्ण कुंती के बड़े पुत्र थे। उन्हें दुख था कि पांचों पांडवों को उनके बड़े भाई के खिलाफ खड़ा करना पड़ा।
- कर्ण ने दुर्योधन के प्रति अपनी मित्रता का धर्म मरते दम तक निभाया। श्रीकृष्ण जानते थे कि कर्ण जैसा मित्र मिलना मुश्किल है।
- सम्राट बनाने के वचन के बाद भी कर्ण ने अपनी मर्यादा नहीं छोड़ी।
जब कृष्ण हुए थे भावुक
जब अर्जुन ने विजय के बाद पूछा कि माधव आप इतने दुखी क्यों हैं? तब कृष्ण ने भारी मन से कहा - " पार्थ आज युद्ध केवल एक योद्धा ने नहीं हारा, बल्कि इस संसार ने अपना सबसे बड़ा दानी खो दिया है। कर्ण का शरीर भले ही अधर्म की ओर था, लेकिन उसका चरित्र गंगा की तरह पवित्र था।"
खबरें और भी
यह भी पढ़ें- Mahabharata: महाभारत के वो 3 'महा-श्राप', जिन्होंने युद्ध का अंत और इतिहास का रुख बदल दिया
यह भी पढ़ें- Mahabharata Mystery: 18 दिन, 18 सेनाएं और 18 अध्याय, क्यों बन गया ये महाभारत का रहस्यमयी अंक
अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।