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    यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Feb 15, 2022 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

    ज्ञान, भक्ति और कर्म का प्रतिनिधि स्वरूप है प्रयागराज का त्रिवेणी संगम, जानें-स्नान और दान का महत्व

    By Pravin KumarEdited By:
    Updated: Tue, 15 Feb 2022 03:12 PM (IST)

    माघ मास को स्नान और कल्पवास का महीना भी माना जाता है। देह शुद्धि और आत्मशुद्धि का मार्ग रचता महीने भर चलने वाला प्रकृति और मनुष्य के जुड़ाव को नवीनता ...और पढ़ें

    ज्ञान, भक्ति और कर्म का प्रतिनिधि स्वरूप है प्रयागराज का त्रिवेणी संगम, जानें-स्नान और दान का महत्व
    ज्ञान, भक्ति और कर्म का प्रतिनिधि स्वरूप है प्रयागराज का त्रिवेणी संगम, जानें-स्नान और दान का महत्व

    भारत ने मनुष्य और प्रकृति के जुड़ाव के अद्भुत सूत्र रचे हैं। ऋतु परिवर्तन के साथ ही व्यवहार को एक नई दिशा देने के लिए भी कई अनुशासन महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसा ही एक प्रसंग वसंत ऋतु के आगमन से ठीक पूर्व जुड़ता है। यह प्रसंग है माघ मास में पवित्र स्नान का। इसीलिए माघ मास को स्नान और कल्पवास का महीना भी माना जाता है। देह शुद्धि और आत्मशुद्धि का मार्ग रचता महीने भर चलने वाला प्रकृति और मनुष्य के जुड़ाव को नवीनता सौंपता एक अद्भुत दीर्घ प्रसंग है माघ स्नान। वैसे तो सभी पवित्र नदियों और सरोवरों आदि पर माघ स्नान का विशेष महत्व है, लेकिन इस स्नान के केंद्र में है प्रयागराज का त्रिवेणी संगम। गोस्वामी तुलसीदास जी ने मानस में लिखा है :

    माघ मकर गत रवि जब होई ।

    तीरथ पतिहि आव सब कोई ।।

    देव दनुज किन्नर नर श्रेनी।

    सादर मच्जहि सकल त्रिबेनी।।

    तीर्थराज प्रयाग में कल्पवास और माघ स्नान के कुछ महत्वपूर्ण आयाम हैं, जो इसे अति विशिष्ट बनाते हैं। तुलसीदास जी ने कहा कि यहां सभी आते हैं। सभी में वे देवताओं के साथ दैत्यों को भी शामिल करते हैं, नर के साथ किन्नर की भी बात करते हैं। यह सर्व का पर्व से जुड़ाव और प्रकृति के प्रवाह से जुड़कर जीवन को सार्थक करने का अनुष्ठान ही प्रयागराज में माघ स्नान को सार्थकता का शिखर सौंपता है। प्रयागराज का त्रिवेणी संगम वैसे भी ज्ञान, भक्ति और कर्म का प्रतिनिधि स्वरूप है। गोस्वामी जी ने गंगा, यमुना और सरस्वती के प्रवाह को इन तीनों के प्रतीक से जोड़ते हुए लिखा भी है :

    राम भक्ति जह सुरसरि धारा

    सरसइ ब्रह्म विचार प्रचारा।।

    बिधि निषेधमय कलिमल हरनी

    करमकथा रवि नंदनि बरनी।।

    भारतीय चिंतन ने कर्म भक्ति और ज्ञान तीनों को मुक्ति का पथ मानकर जीवन के परम लक्ष्य को साधा है और ऐसे में जो स्थान इन तीनों को साध ले, वह तीर्थराज हो ही जाता है। प्रयागराज के इस त्रिवेणी संगम को हम आज़ादी के अमृत महोत्सव के संदर्भ के साथ देखते हैं तो स्वावलंबन, स्वाधीनता और स्वाभिमान की त्रिवेणी का अनूठा सौंदर्य भी हमसे जुडऩे लगता है। स्वावलंबन की प्रधानता को सहेजे यमुना जी का कर्म पथ, स्वाधीनता का सौंदर्य रचता गंगा जी का भक्ति पथ और स्वाभिमान का शिखर सहेजता मां सरस्वती का ज्ञान पथ।

    तीनों मिलकर उस भारतीय विचार को साकार करते हैं जो संपूर्ण जगत के लिए जीवन का सच्चा अर्थ रचता है। कितनी महत्वपूर्ण है यह स्वावलंबन, स्वाधीनता और स्वाभिमान की अनूठी त्रयी जिसे प्रतीक रूप में गंगा यमुना सरस्वती ने साधा है, इसके लिए एक छोटी सी कहानी का आश्रय लेते हैं। एक महान ऋषि अपने शिष्यों के साथ प्रयागराज में माघ स्नान के लिए आए। उन्होंने स्नान के बाद जब अपने शिष्यों को कर्म भक्ति और ज्ञान का उपदेश दिया तो उनके एक प्रमुख शिष्य ने उनसे पूछा कि इन तीनों में से किसका आश्रय मुक्त करता है।

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    तब ऋषि ने कहा कि इन तीनों का संगम सर्व के लिए फलदायी है क्योंकि शास्त्र कहता है कि जो इन्हें साथ-साथ जानता है वह अमरत्व प्राप्त कर लेता है। जब शिष्य ने इसे और अधिक स्पष्ट करने का आग्रह किया तो ऋषि ने तीन प्रमुख शिष्यों को एक कलश देकर कहा कि इसमें संगम का जल भर लाओ, मैं पूजन के पूर्व इस कलश के जल से स्नान करना चाहता हूं। एक शिष्य ने जल भरा। जब वे जल भरकर लौट रहे थे तो उन्होंने देखा कि कलश में एक छेद है तब दूसरे शिष्य ने अपना हाथ उस छेद पर रख दिया और कहा अब एक बूंद जल भी बाहर नहीं आ सकता। तीनों शिष्य लौट रहे थे तो एक विद्वान ने हंसते हुए कहा कि टूटा कलश ले जाने से बेहतर है नया कलश किसी से मांग लो कोई मना नहीं करेगा। तब तीसरे शिष्य ने कहा कि हम मांगे हुए कलश को अपने गुरु के कलश के समकक्ष नहीं रख सकते। जब वे लौटे तो गुरु ने उस जल से स्नान किया और अपने शिष्यों से उनका अनुभव पूछा।

    उन्होंने पूरी घटना सुनाई तो गुरु ने कहा कि पहले शिष्य ने जल भरा यह कर्म पथ है, दूसरे ने कलश के छिद्र को कष्ट सहकर भी दबाए रखा यह भक्ति है और तीसरे शिष्य ने गुरु वचन और साधन को छोडऩे से इंकार किया यह ज्ञान है। यदि वह कलश बदल लेता तो मैंने जो व्रत लिया था कि इसी कलश के जल से स्नान करना है वह पूरा नहीं होता। तीनों के संयुक्त प्रयास का परिणाम ही है कि लक्ष्य प्राप्त हो गया। जीवन भी ऐसा ही है जो कर्म, भक्ति और ज्ञान को सम्यक रूप में साध ले, वह परम का अधिकारी हो जायेगा। भारत के चिंतन ने अपने प्रत्येक आयाम को जो विवेक सौंपा है वह त्रिवेणी लिए अनेक संगम रचता है। इसीलिए स्वावलंबन को साधकर कर्म कथा कहती यमुना का प्रवाह पाना है।

    स्वाधीनता को सच्चे अर्थ में अपनाकर गंगा की भक्ति से मिलना है और स्वाभिमान का गौरव लेकर सरस्वती से ज्ञान का आलोकित पथ पाना है। गंगा, यमुना, सरस्वती कहें; कर्म, भक्ति, ज्ञान कहें या स्वावलंबन, स्वाधीनता, स्वाभिमान कहें, ये त्रिवेणी प्रवाह सदैव वह संगम बनायेगा जो हर भेद को मिटाकर सर्व के लिए माघ मास का पुण्य लेकर, जीवन को सार्थकता देकर और भारतीयता का अमृत कलश लेकर संपूर्ण विश्व को बंधुत्व के उस सूत्र में बांधेगा जो सभ्यताओं को हर एक संघर्ष से मुक्त कर सकेगा और बना सकेगा अमृत पथ का अधिकारी भी।

    साहित्यकार-अशोक जमनानी

    आध्यात्मिक विषयों के अध्येता