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    शिवलिंग पूजा के दौरान न करें ये बड़ी गलतियां, नोट करें सही विधि और नियम

    Updated: Fri, 24 Apr 2026 07:15 PM (IST)

    वैशाख माह का अंतिम प्रदोष व्रत 29 अप्रैल को रखा जाएगा। आइए इस दिन से जुड़ी प्रमुख बातों को जानते हैं। ...और पढ़ें

    Pradosh Vrat Dos and Donts: शिव पूजा में वर्जित वस्तुएं। (Ai Generated Image)

    Pradosh Vrat Dos and Donts: शिव पूजा में वर्जित वस्तुएं। (Ai Generated Image)

    HighLights

    1. शिवलिंग पर सिंदूर, तुलसी और केतकी के फूल नहीं चढ़ाने चाहिए

    2. इस दिन प्रदोष काल में शिव पूजा का महत्व है

    3. प्रदोष व्रत 29 अप्रैल को रखा जाएगा

    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत को भगवान शिव की कृपा पाने का सबसे शुभ दिन माना गया है। खासकर वैशाख माह का अंतिम प्रदोष व्रत आध्यात्मिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। इस दिन भक्त बड़ी श्रद्धा से शिवलिंग का अभिषेक करते हैं, लेकिन अनजाने में कुछ ऐसी गलतियां कर बैठते हैं, जिससे पूजा का पूरा फल नहीं मिलता है। शास्त्रों में महादेव की पूजा के कुछ कड़े नियम बताए गए हैं। अगर आप इस प्रदोष व्रत पर अपनी मनोकामना पूरी करना चाहते हैं, तो इन 5 बड़ी गलतियों से जरूर बचें।

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    वर्जित सामग्री

    शिवलिंग पर कुछ चीजें चढ़ाना पूरी तरह वर्जित है। भगवान शिव को सिंदूर, कुमकुम नहीं चढ़ाया जाता। पूजा में इसकी जगह चंदन या भस्म का प्रयोग करें। इसके अलावा तुलसी दल, केतकी के फूल और नारियल पानी भी शिवलिंग पर अर्पित न करें। शंख से शिवलिंग का अभिषेक भी वर्जित माना गया है, क्योंकि शिवजी ने शंखचूड़ नामक दैत्य का वध किया था।

    तांबे के पात्र से दूध चढ़ाना

    अक्सर लोग तांबे के लोटे में दूध डालकर शिवलिंग पर चढ़ाते हैं। तांबे के साथ दूध का संपर्क उसे विष के समान बना देता है। ऐसे में महादेव को दूध चढ़ाने के लिए हमेशा पीतल, चांदी या स्टील के पात्र का ही प्रयोग करें। तांबे के पात्र का उपयोग केवल जल चढ़ाने के लिए ही शुभ होता है।

    जलाभिषेक की दिशा

    शिवलिंग पर जल चढ़ाते समय कभी भी धारा बहुत तेज न रखें। जल हमेशा एक पतली धार में चढ़ाना चाहिए। साथ ही, जल चढ़ाते समय आपका मुख दक्षिण दिशा की ओर नहीं होना चाहिए। उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके जल चढ़ाना सबसे शुभ माना जाता है।

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    शिवलिंग की आधी परिक्रमा

    शिवलिंग की पूजा में सबसे बड़ी गलती परिक्रमा के दौरान होती है। याद रखें, शिवलिंग की कभी भी पूरी परिक्रमा नहीं की जाती। जहां से अभिषेक का जल बाहर निकलता है। उसे लांघना घोर पाप माना जाता है। ऐसे में हमेशा आधी परिक्रमा करें और वहीं से वापस लौट आएं।

    प्रदोष काल का ध्यान न रखना

    प्रदोष व्रत की पूजा हमेशा सूर्यास्त के समय यानी 'प्रदोष काल' में ही की जानी चाहिए। दिन के समय की गई सामान्य पूजा और शाम की विशेष पूजा में बड़ा अंतर है। वैशाख के इस अंतिम प्रदोष पर सूर्यास्त के 45 मिनट पहले और 45 मिनट बाद तक का समय शिव साधना के लिए सबसे शुभ माना जाता है।

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