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    यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jan 03, 2025 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

    Vinayak Chaturthi 2025: विनायक चतुर्थी पर ऐसे प्राप्त करें मां लक्ष्मी की कृपा, अन्न-धन में होगी वृद्धि

    Updated: Fri, 03 Jan 2025 08:40 AM (IST)

    विनायक चतुर्थी (Vinayak Chaturthi 2025) बहुत ही शुभ दिन माना जाता है। इस दिन व्रत रखने का विधान है। मान्यता है कि इस तिथि पर जो लोग कठिन व्रत के साथ ...और पढ़ें

    Vinayak Chaturthi 2025: लक्ष्मी चालीसा का पाठ।
    Vinayak Chaturthi 2025: लक्ष्मी चालीसा का पाठ।

    HighLights

    1. विनायक चतुर्थी हिंदू धर्म के सबसे प्रसिद्ध पर्वों में से एक है।
    2. विनायक चतुर्थी पूरी तरह से भगवान गणेश की पूजा के लिए समर्पित है।
    3. विनायक चतुर्थी हर माह शुक्ल पक्ष के दौरान आती है।

    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म में विनायक चतुर्थी का पर्व बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन भगवान गणेश की पूजा होती है। यह हर महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाई जाती है। हिंदू पंचांग के अनुसार, इस बार यह 3 जनवरी, 2025 यानी आज के दिन मनाई जाएगी। जो लोग इस व्रत (Vinayak Chaturthi 2025) को रखते हैं और भगवान गणेश के साथ मां लक्ष्मी की आराधना करते हैं, उनके घर में कभी धन का अभाव नहीं रहता है। इसलिए सुबह उठें स्नान करें और मां लक्ष्मी के साथ बप्पा को मोदक, खीर, कमल का फूल अर्पित करें। घी का दीपक जलाएं।

    फिर लक्ष्मी चालीसा का पाठ और गणेश जी के मंत्रों का जाप करें। आरती से पूजा पूरी करें। इससे आपके ऊपर मां लक्ष्मी की कृपा सदैव के लिए बनी रहेगी।

    ।।लक्ष्मी चालीसा।।

    ।।दोहा।।

    मातु लक्ष्मी करि कृपा करो हृदय में वास।

    मनोकामना सिद्ध कर पुरवहु मेरी आस॥

    सिंधु सुता विष्णुप्रिये नत शिर बारंबार।

    ऋद्धि सिद्धि मंगलप्रदे नत शिर बारंबार॥ टेक॥

    ।।सोरठा।

    यही मोर अरदास, हाथ जोड़ विनती करूं।

    सब विधि करौ सुवास, जय जननि जगदंबिका॥

    ॥ चौपाई ॥

    सिन्धु सुता मैं सुमिरौं तोही। ज्ञान बुद्धि विद्या दो मोहि॥

    तुम समान नहिं कोई उपकारी। सब विधि पुरबहु आस हमारी॥

    जै जै जगत जननि जगदम्बा। सबके तुमही हो स्वलम्बा॥

    तुम ही हो घट घट के वासी। विनती यही हमारी खासी॥

    जग जननी जय सिन्धु कुमारी। दीनन की तुम हो हितकारी॥

    विनवौं नित्य तुमहिं महारानी। कृपा करौ जग जननि भवानी।

    केहि विधि स्तुति करौं तिहारी। सुधि लीजै अपराध बिसारी॥

    कृपा दृष्टि चितवो मम ओरी। जगत जननि विनती सुन मोरी॥

    ज्ञान बुद्धि जय सुख की दाता। संकट हरो हमारी माता॥

    क्षीर सिंधु जब विष्णु मथायो। चौदह रत्न सिंधु में पायो॥

    चौदह रत्न में तुम सुखरासी। सेवा कियो प्रभुहिं बनि दासी॥

    जब जब जन्म जहां प्रभु लीन्हा। रूप बदल तहं सेवा कीन्हा॥

    स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा। लीन्हेउ अवधपुरी अवतारा॥

    तब तुम प्रकट जनकपुर माहीं। सेवा कियो हृदय पुलकाहीं॥

    अपनायो तोहि अन्तर्यामी। विश्व विदित त्रिभुवन की स्वामी॥

    तुम सब प्रबल शक्ति नहिं आनी। कहं तक महिमा कहौं बखानी॥

    मन क्रम वचन करै सेवकाई। मन- इच्छित वांछित फल पाई॥

    तजि छल कपट और चतुराई। पूजहिं विविध भांति मन लाई॥

    और हाल मैं कहौं बुझाई। जो यह पाठ करे मन लाई॥

    ताको कोई कष्ट न होई। मन इच्छित फल पावै फल सोई॥

    त्राहि- त्राहि जय दुःख निवारिणी। त्रिविध ताप भव बंधन हारिणि॥

    जो यह चालीसा पढ़े और पढ़ावे। इसे ध्यान लगाकर सुने सुनावै॥

    ताको कोई न रोग सतावै। पुत्र आदि धन सम्पत्ति पावै।

    पुत्र हीन और सम्पत्ति हीना। अन्धा बधिर कोढ़ी अति दीना॥

    विप्र बोलाय कै पाठ करावै। शंका दिल में कभी न लावै॥

    पाठ करावै दिन चालीसा। ता पर कृपा करैं गौरीसा॥

    सुख सम्पत्ति बहुत सी पावै। कमी नहीं काहू की आवै॥

    बारह मास करै जो पूजा। तेहि सम धन्य और नहिं दूजा॥

    प्रतिदिन पाठ करै मन माहीं। उन सम कोई जग में नाहिं॥

    बहु विधि क्या मैं करौं बड़ाई। लेय परीक्षा ध्यान लगाई॥

    करि विश्वास करैं व्रत नेमा। होय सिद्ध उपजै उर प्रेमा॥

    जय जय जय लक्ष्मी महारानी। सब में व्यापित जो गुण खानी॥

    तुम्हरो तेज प्रबल जग माहीं। तुम सम कोउ दयाल कहूं नाहीं॥

    मोहि अनाथ की सुधि अब लीजै। संकट काटि भक्ति मोहि दीजे॥

    भूल चूक करी क्षमा हमारी। दर्शन दीजै दशा निहारी॥

    बिन दरशन व्याकुल अधिकारी। तुमहिं अक्षत दुःख सहते भारी॥

    नहिं मोहिं ज्ञान बुद्धि है तन में। सब जानत हो अपने मन में॥

    रूप चतुर्भुज करके धारण। कष्ट मोर अब करहु निवारण॥

    कहि प्रकार मैं करौं बड़ाई। ज्ञान बुद्धि मोहिं नहिं अधिकाई॥

    रामदास अब कहाई पुकारी। करो दूर तुम विपति हमारी॥

    ।।दोहा।।

    त्राहि त्राहि दुःख हारिणी हरो बेगि सब त्रास।

    जयति जयति जय लक्ष्मी करो शत्रुन का नाश॥

    रामदास धरि ध्यान नित विनय करत कर जोर।

    मातु लक्ष्मी दास पर करहु दया की कोर॥

    ।। इति लक्ष्मी चालीसा संपूर्णं।।

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