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    Pinaka Dhanush: कैसा था सीता स्वयंवर का पिनाक धनुष? जानिए इससे जुड़ी रोचक कथा

    Updated: Fri, 14 Nov 2025 02:00 PM (IST)

    सीता स्वयंवर रामायण का एक महत्वपूर्ण प्रसंग है, जहां भगवान शिव के दिव्य धनुष 'पिनाक' की प्रत्यंचा चढ़ाने की शर्त रखी गई थी। यह धनुष इतना विशाल और वजनी ...और पढ़ें

    Pinaka Dhanush: पिनाक धनुष से जुड़ी कहानी।

    Pinaka Dhanush: पिनाक धनुष से जुड़ी कहानी।

    HighLights

    1. सीता स्वयंवर में पिनाक धनुष की अहम भूमिका थी।

    2. इसे शिव धनुष के नाम से भी जाना जाता है।

    3. पिनाक धनुष का निर्माण विश्वकर्मा जी ने किया था।

    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। सीता स्वयंवर का प्रसंग भारतीय महाकाव्य रामायण के सबसे महत्वपूर्ण अध्यायों में से एक है। इस स्वयंवर में जिस धनुष को उठाने और उसकी प्रत्यंचा चढ़ाने की शर्त रखी गई थी उसका नाम पिनाक था। पिनाक कोई साधारण धनुष नहीं, बल्कि स्वयं भगवान शिव का दिव्य और शक्तिशाली अस्त्र था, जिसे शिवधनुष (Pinaka Dhanush Story) के नाम से भी जाना जाता है।

    pinak dhanush

    (AI Generetded)

    (श्रीरामचरितमानस बालकांड )

    नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥
    आयसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही॥1॥

    पिनाक धनुष का स्वरूप और उत्पत्ति की कथा

    श्रीरामचरितमानस के बालकांड में भगवान राम द्वारा भगवान शिव के धनुष (Lord Shiva Divine Bow) तोड़ने का वर्णन विस्तार पूर्वक किया गया है। इस धनुष का निर्माण देव शिल्पी विश्वकर्मा ने किया था, जिससे भगवान शिव ने त्रिपुरासुर का वध किया था। पिनाक धनुष इतना विशाल और वजनी था कि इसे उठाना साधारण मनुष्य के बस की बात नहीं थी। कहा जाता है कि इसका वजन और इसकी लंबाई भी एक औसत मनुष्य से काफी अधिक थी। बाद में, भगवान शिव ने यह धनुष परशुराम जी को सौंप दिया था, और परशुराम ने इसे मिथिला के राजा जनक के पूर्वज देवरथ जी को दिया था।

    स्वयंवर की रोचक कथा

    ऐसा कहा जाता है कि बचपन में ही देवी सीता ने खेल-खेल में उस विशाल धनुष को उठा लेती थी, जिसे बड़े-बड़े योद्धा हिला भी नहीं सकते थे। तभी इस अद्भुत दृश्य को देखकर राजा जनक ने प्रण लिया था कि उनकी पुत्री का विवाह उसी वीर पुरुष से होगा, जो इस धनुष को उठाकर उसकी प्रत्यंचा चढ़ा सकेगा। जब सीता स्वयंवर (Sita Swayamvar Legend) हुआ तब उसमें दूर-दूर से अनेक पराक्रमी राजा और राजकुमार आए, लेकिन कोई भी इस धनुष को हिला तक नहीं सका।

    सभी के प्रयास विफल होने पर राजा जनक बहुत दुखी हुए। तब, गुरु विश्वामित्र के कहने पर भगवान श्री राम ने इसपर प्रत्यंचा चढ़ाकर राजा जनक के प्रण को पूरा किया था।

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