सिर्फ श्रीराम की वापसी नहीं, दीवाली के दिन घटी थीं ये 6 घटनाएं! इन कहानियों में छुपा है दीपोत्सव का रहस्य
दीपावली केवल भगवान राम की अयोध्या वापसी का पर्व नहीं है, बल्कि इसके पीछे कई अन्य महत्वपूर्ण कथाएं भी हैं।

श्रीराम की वापसी ही नहीं, दीपावली से जुड़ी हैं 6 अनसुनी कहानियां (Picture Credit: AI Generated)
HighLights
भगवान राम की अयोध्या वापसी के अलावा अन्य कथाएं।
नरकासुर वध, गुरु हरगोबिंद की रिहाई भी दीपावली पर।
देवी लक्ष्मी प्राकट्य, महावीर निर्वाण, राजा बलि से जुड़ी।
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। दीवाली का नाम सुनते ही मन में बस एक तस्वीर उमड़ती है प्रभु श्री राम की रावण पर विजय पाने के बाद अयोध्या वापसी की। बहुत से लोगों के लिए, इस पर्व का मतलब है देवी लक्ष्मी का स्वागत करना, भगवान गणेश की पूजा करना, उपहारों का आदान-प्रदान करना और पटाखों की गूंज में सराबोर हो जाना है।
वहीं शायद ही कुछ लोग ये जानते होंगे कि दीवाली का पर्व एक ऐसा अवसर है जो सिर्फ श्री राम के आगमन की खुशी में नहीं मनाया जाता है बल्कि इसके पीछे अन्य कई कथाएं भी छुपी हैं, जो इस अवसर को और ज्यादा महत्वपूर्ण बनाती हैं।
भगवान राम की अयोध्या वापसी की प्रचलित कथा के अलावा, दीपोत्सव से जुड़ी कई ऐसी कहानियां भी हैं जो इस त्योहार के गहरे अर्थ को उजागर करती हैं। आइए आपको बताते हैं उनके बारे में यहां विस्तार से।
दीवाली पर भगवान राम की वापसी
अगर आप किसी से पूछें कि दीवाली क्यों मनाई जाती है, तो सबसे आम जवाब यही मिलेगा कि यह चौदह साल के वनवास के बाद भगवान राम की अयोध्या वापसी और रावण पर उनकी जीत का प्रतीक है।
रामायण के अनुसार, अयोध्या के लोगों ने उनके वापस आने की खुशी में मिट्टी के दीये जलाकर राम, सीता और लक्ष्मण का स्वागत किया था। ये दीपक खुशी, उम्मीद और बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक थे।
नरकासुर और नरक चतुर्दशी की कथा
दीवाली से जुड़ी कहानियों में से एक ऐसी कथा है जिसके बारे में कम ही लोग जानते हैं, वह है नरकासुर की पराजय की कहानी है। नरकासुर एक शक्तिशाली असुर था, जिसने स्वर्गलोक में काफी उपद्रव मचाया था और 16 हजार से भी ज्यादा महिलाओं को बंदी बना लिया था।
हिंदू परंपराओं के अनुसार, भगवान कृष्ण ने सत्यभामा के साथ मिलकर नरकासुर को पराजित किया और उसकी कैद में फंसी महिलाओं को मुक्त कराया। इस विजय को 'नरक चतुर्दशी' के रूप में मनाया जाता है, जो कई क्षेत्रों में मुख्य दीवाली से एक दिन पहले मनाई जाती है। इस दिन को छोटी दीवाली भी कहा जाता है।
सिखों के लिए दीवाली से जुड़ी कहानी
सिखों के लिए दीवाली का विशेष महत्व है, क्योंकि इसी दिन 'बंदी छोड़ दिवस' मनाया जाता है, जिसका अर्थ है 'मुक्ति का दिन'। यह दिन सिखों के छठे गुरु, गुरु हरगोबिंद साहिब की ग्वालियर के किले से रिहाई की याद दिलाता है। जहां उन्हें मुगल काल के दौरान कैद कर लिया गया था।
सिख परंपरा के अनुसार, उन्होंने 52 कैद राजाओं को भी मुक्त कराया था। आज भी अमृतसर में उनकी वापसी के उपलक्ष्य में स्वर्ण मंदिर में जश्न मनाया जाता है और इस मौके पर पूरे मंदिर को रोशनी से सजाया जाता है।
माता लक्ष्मी का प्राकट्य दिवस
दीपावली का संबंध धन, वैभव और सुख-समृद्धि की देवी मां लक्ष्मी से भी है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, देवताओं और असुरों ने जब अमृत प्राप्त करने के लिए क्षीरसागर का मंथन किया, तब समुद्र मंथन से कई दिव्य रत्न निकले। इन्हीं में एक थीं माता लक्ष्मी।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान मां लक्ष्मी कमल पर विराजमान होकर प्रकट हुईं। उनके प्राकट्य से चारों ओर दिव्यता और खुशहाली का वातावरण छा गया। इसके बाद मां लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को अपने पति के रूप में स्वीकार किया। इसी मान्यता है कि माता लक्ष्मी जिस दिन प्रकट हुईं थी, उसी दिन को दीपावली मनाई जाने लगी।
भगवान महावीर ने प्राप्त किया था निर्वाण
दीपावली का महत्व केवल हिंदू धर्म तक सीमित नहीं है। जैन धर्म में भी इस पर्व का विशेष स्थान है। जैन मान्यताओं के अनुसार, 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर ने कार्तिक अमावस्या यानी कि दीपावली के दिन ही बिहार के पावापुरी में निर्वाण प्राप्त किया था। भगवान महावीर के निर्वाण के बाद उनके अनुयायियों ने उनके ज्ञान और उपदेशों की स्मृति में दीप जलाए थे।
ऐसा कहा जाता है कि उनके जाने से जो आध्यात्मिक अंधकार छाया, उसे दूर करने के लिए लोगों ने दीपों से वातावरण को रोशन किया। उसी समय से जैन धर्म में दीपावली का चलन शुरू हुआ।
भगवान विष्णु ने राजा बलि को दिया था वरदान
दीपावली से जुड़ी एक अन्य महत्वपूर्ण पौराणिक कथा भगवान विष्णु के वामन अवतार और राजा बलि की है। राजा बलि अपने दान और पराक्रम के लिए प्रसिद्ध थे। उन्होंने अपने तप और शक्ति से तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया था। इससे देवता चिंतित हो गए और उन्होंने भगवान विष्णु से सहायता मांगी।
तब भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण करके उनसे तीन पग भूमि मांगी। बलि से वामन जी को तीन पग जमीन देने का वचन दिया। उस समय वामन जी ने पहले पग में पूरी पृथ्वी और दूसरे पग में स्वर्गलोक नाप लिया। तीसरे पग के लिए कोई स्थान नहीं बचा, तो राजा बलि ने अपना सिर आगे कर दिया।
भगवान ने उनके सिर पर तीसरा पग रखकर उन्हें पाताल लोक भेज दिया। धार्मिक परंपराओं में राजा बलि के लौटने और बलि प्रतिपदा का संबंध दीपावली के अगले दिन से जोड़ा जाता है। कुछ परंपराओं में यह मान्यता भी है कि राजा बलि को वर्ष में एक बार अपनी प्रजा से मिलने का अवसर मिलता है और इसी खुशी में दीवाली का पर्व मनाया जाता है।
दीपावली के पर्व से जुड़ी ये कुछ ऐसी कहानियां हैं जिनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। श्री राम की अयोध्या वापसी हो या नरकासुर का संहार, दीपावली का पर्व अपने आप में विशेष अहमियत रखता है।
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