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    यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Aug 09, 2024 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

    Ekdant Ganesh Story: ऐसे मिला भगवान गणेश को एकदंत नाम, परशुराम जी से जुड़ी है कथा

    Updated: Fri, 09 Aug 2024 12:33 PM (GMT+05:30)

    भगवान गणेश की आराधना बेहद कल्याणकारी मानी जाती है। उनकी पूजा करने से सभी समस्याओं से मुक्ति मिलती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जो जातक भगवान गणेश क ...और पढ़ें

    Ekdant Ganesh Story: क्यों गणेश जी को मिला एकदंत नाम?
    Ekdant Ganesh Story: क्यों गणेश जी को मिला एकदंत नाम?

    HighLights

    1. भगवान गणेश की पूजा का खास महत्व है।
    2. गणेश भगवान को देवताओं में प्रथमपूज्य माना जाता है।
    3. बप्पा की पूजा करने से सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।

    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। सनातन धर्म में किसी भी पूजा-पाठ व नए कार्य की शुरुआत करने से पहले गणपति पूजा का विधान है। उन्हें देवताओं में प्रथमपूज्य माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि बप्पा की पूजा-अर्चना करने से सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। साथ ही सभी कामनाओं की पूर्ति होती है। भगवान गणेश को गजानन, एकाक्षर, विघ्नहर्ता, एकदंत आदि नामों से जाना जाता है, जिनका अपना-अपना महत्व है। आज हम गणेश जी के एकदंत (Ekadanta) नाम की महिमा जानेंगे कि आखिर उन्हें यह नाम कैसे प्राप्त हुआ?

    क्या है बप्पा के एकदंत होने की वजह?

    एक दांत टूटा होने की वजह से गणेश भगवान को एकदंत कहा जाता है। साथ ही इस बात को लेकर कई कथाएं प्रचलित हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार परशुराम जी भगवान शिव से मिलने पहुंचे थे, लेकिन भोलेनाथ उस समय ध्यानमग्न थे, जिसके चलते भगवान गणेश ने उन्हें अंदर जाने से रोक दिया। हालांकि कैलाशपति के परमभक्त परशुराम जी इस बात पर अटल थे कि वे शिव जी से बिना मिले नहीं जाएंगे।

    वहीं, भगवान गणेश भी अपनी बात पर पूर्ण अडिग थे। इस पर परशुराम जी को क्रोध आ गया और उन्होनें गणेश जी को युद्ध के लिए ललकारा, जिसे बप्पा ने स्वीकार कर लिया और दोनों के बीच भीषण युद्ध हुआ। इसके बाद परशुरान जी ने शिव जी से ही प्राप्त फरसे से भगवान गणेश पर वार किया।

    गजानन ने अपने पिता के अस्त्र का आदर रखा और परशुराम जी के प्रहार से उनका एक दांत टूट गया। एक दांत टूट जाने के कारण भगवान गणेश एकदंत कहलाएं। हालांकि इस घटना के पश्चात भगवान परशुराम को भी अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होंने बप्पा को समस्त तेज, बल, कौशल और ज्ञान से परिपूर्ण आशीष प्रदान किया।

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