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    भगवान विष्णु ने क्यों लिया था मोहिनी अवतार? समुद्र मंथन से जुड़ी है कथा

    Updated: Thu, 23 Apr 2026 03:27 PM (IST)

    भगवान विष्णु ने मोहिनी अवतार क्यों लिया था? आइए समुद्र मंथन से जुड़ी इस पौराणिक कथा को पढ़ते हैं। ...और पढ़ें

    मोहिनी अवतार: जब भगवान विष्णु ने देवताओं को पिलाया अमृत। (Ai Generated Image)

    मोहिनी अवतार: जब भगवान विष्णु ने देवताओं को पिलाया अमृत। (Ai Generated Image)

    HighLights

    1. समुद्र मंथन के दौरान अमृत कलश निकला था 

    2. अमृत को लेकर देवताओं और असुरों में भयंकर विवाद हो गया था

    3. असुरों को अमर होने से रोकने के लिए भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप लिया था

    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। पुराणों में भगवान विष्णु के दशावतारों के साथ-साथ कई अन्य मायावी अवतारों के बारे में भी बताया गया है। इन्हीं में से एक बेहद खास और रहस्यमयी अवतार है मोहिनी। श्रीहरि का यह एकमात्र ऐसा अवतार है, जिसमें उन्होंने एक स्त्री का रूप लिया था, आखिर सृष्टि के पालनहार को एक नारी का रूप क्यों धारण करना पड़ा? आइए इसके पीछे की कथा पढते हैं।

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    Ai Generated Image

    समुद्र मंथन और अमृत कलश की प्राप्ति

    श्रीमद्भागवत महापुराण के 8वें स्कंध के अनुसार, एक बार महर्षि दुर्वासा के श्राप की वजह से स्वर्ग लोक 'श्रीहीन' यानी कि धन-वैभव और शक्ति से विहीन हो गया था। तब भगवान विष्णु की सलाह पर देवताओं ने असुरों के साथ मिलकर क्षीर सागर में 'समुद्र मंथन' किया। इस महान मंथन से 14 अनमोल रत्न निकले, जिनमें से सबसे अंत में देव वैद्य भगवान धन्वंतरि अपने हाथों में अमृत कलश लेकर प्रकट हुए।

    देवताओं और असुरों के बीच विवाद

    जैसे ही अमृत कलश प्रकट हुआ, असुरों ने बलपूर्वक उसे धन्वंतरि जी के हाथों से छीन लिया। असुरों अमृत पीकर अमर होना और तीनों लोकों पर हमेशा के लिए अपना अधिकार चाहते थे। अगर असुर अमृत पी लेते, तो सृष्टि में अधर्म और अत्याचार बढ़ जाता। यह देखकर देवता घबरा गए और उन्होंने भगवान विष्णु से मदद मांगी।

    तब श्रीहरि ने धारण किया मोहिनी अवतार

    असुरों से अमृत कलश वापस लाना आसान नहीं था। तब भगवान विष्णु ने ब्रह्मांड की सबसे सुंदर और मायावी नारी मोहिनी का रूप धारण किया। उनका रूप इतना मनमोहक था कि जो भी उन्हें देखता, वह अपनी सुध-बुध खो बैठता। इसी दिव्य रूप को धारण कर श्रीहरि असुरों के पास पहुंचे।

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    असुरों को छला और देवताओं को अमृत पान कराया

    असुर मोहिनी के अद्भुत सौंदर्य और उनकी मीठी बातों पर मोहित हो गए। वे आपस का विवाद भूल बैठे और अमृत कलश खुद मोहिनी के हाथों में सौंप दिया ताकि वह अमृत बांट सके। मोहिनी ने अपनी माया से देवताओं और असुरों को अलग-अलग बैठाया। उन्होंने असुरों को अपने रूप के जाल में उलझाए रखा और सारा अमृत देवताओं को पिला दिया। इसी दौरान स्वर्भानु नामक असुर ने छल से देवताओं के साथ बैठकर अमृत पान कर लिया।

    इसकी जानकारी जैसे ही श्री हरि को हुई उन्होंने तुरंत उसे सुदर्शन चक्र से दो भागों में काट दिया था। अमृत पीने की वजह से वह अमर हो गया। बाद में जिसके सिर वाला हिस्सा राहु और धड़ वाला हिस्सा केतु कहलाया।

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    अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।