आखिर क्यों जन्म लेते ही सूर्य को निगल गए थे हनुमान जी? पढ़ें इसके पीछे का गहरा रहस्य
हनुमान जी का जीवन सहजयोग में स्थित है, जहाँ वे बिना किसी प्रयास के अखंड राम से जुड़े रहते हैं। इसमें हनुमान जी की भक्ति, ज्ञान और प्राणायाम की प्रक्रि ...और पढ़ें
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हनुमान जी के प्राणायाम का गुप्त रहस्य
HighLights
हनुमान जी का जीवन सहजयोग का प्रतीक है
प्राणायाम से भक्तों के कष्ट दूर करते हैं
राम के प्रति उनकी भक्ति अविनाशी है
स्वामी मैथिलीशरण, (संस्थापक अध्यक्ष, श्रीरामकिंकर विचार मिशन)। हनुमान जी का जीवन सहजयोग में स्थित है। समाधि तो उन साधकों के लिए है, जिन्हें कुछ बाहर छोड़ना है और समाधि में जाकर कुछ अद्भुत प्राप्त करना है, पर हनुमान जी का सहज स्वरूप ही उस अखंड, व्यापक, अनंत रूप राम को पाकर धन्य है, जिसके कारण उनके अंत:करण में पाने और छोड़ने का संकल्प और विकल्प कभी आता ही नहीं है। ज्येष्ठ मास के प्रथम मंगल पर विशेष...
हनुमान जी, प्राणायाम की पूरक क्रिया के द्वारा भक्तों के कष्टों को अपने अंदर लेकर उन्हें कष्टमुक्त कर देते हैं। कुंभक क्रिया के द्वारा वे प्रभु के रूप, गुण, करुणा, कृपा और वात्सल्य को अंदर लेकर अहं ब्रहास्मि वृत्ति के द्वारा कुंभक क्रिया करते हैं।
राम नाम का उद्घोष करके भक्तों को पूर्ण कर रेचक क्रिया करते हैं तथा रावण के यहां लंका दहन के पश्चात उच्चस्तरीय अट्टहास करते हैं कि इस रेचक प्रक्रिया के द्वारा निशाचरों की स्त्रियों का गर्भपात हो जाता है - चलत महाधुनि गर्जेसि भारी। गर्भ स्रवहिं सुनि निसिचर नारी॥ गुणों को लेना और दोषों को समाप्त करना। जीवन में प्राणायाम की इसी प्रक्रिया के द्वारा हमें भी अपने चित्त को पवित्र करके दुर्वृत्तियों को समाप्त करना होगा।
विश्व को यह संदेश देना चाहिए कि बाहर नहीं, रामराज्य पहले अंदर बनाना होगा। हनुमान जी का जीवन सहजयोग में स्थित है। समाधि तो उन साधकों के लिए है, जिन्हें समाधि में जाने के लिए कुछ बाहर छोड़ना है और समाधि में जाकर कुछ अद्भुत प्राप्त करना है, पर हनुमान जी का सहज स्वरूप ही उस अखंड, व्यापक, अनंत रूप राम को पाकर धन्य है, जिसके कारण उनके अंत:करण में पाने और छोड़ने का संकल्प और विकल्प कभी आता ही नहीं है।
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ज्ञान स्थिति में सत की भी विस्मृति उनका स्वस्वरूप है। हनुमान अक्षर स्वरूप होने के कारण उनका क्षरण और क्षय कभी नहीं होता है। उनको अग्नि जला नहीं सकी, पानी डुबा नहीं सका, वायु के वे स्वयं पुत्र हैं। हनुमान जी में अज्ञान जनित अविद्या का ऐसा ही अभाव है, जैसे अग्नि में शीतलता संभव नहीं, बर्फ में गर्मी संभव नहीं है। ज्ञान में अज्ञान का अभाव भी सहज ही होता है। हनुमान जी आकाश के रूप में ही व्यक्त हैं और आकाश के रूप में ही अव्यक्त भी हैं। व्यक्त और अव्यक्त साकार और निराकार, चिदाकाश और आकाश सब वे ही हैं। हनुमान जी स्वर की तरह सुनाई देते हैं।
अर्थ की तरह समझ आते हैं और तत्व के रूप में ग्रहणीय हैं। इन तीनों में कोई भी साकार तत्व नहीं है। क्रिया के रूप में जब वे अपने इन गुणों का उपयोग भगवान की सेवा के लिए करते हैं, तब उपादान के रूप में भले ही सामने दिखाई दें, पर वे व्यक्त रूप राम में, अव्यक्त राम के स्वरूप उनकी आत्मा ही हैं।
समाज को इसी प्राणायाम प्रक्रिया की आवश्यकता है। ज्ञान का पहले अर्जन करें, फिर धारण करें, तत्पश्चात उस ज्ञान को समाज में बांट दिया जाए। अर्थ को, सुख को या किसी भी उपलब्धि में इस प्राणायाम प्रक्रिया से ही पूर्णता संभव है। पतझड़ नए पत्तों को आमंत्रित करती है, नया पुराना होता है, गिर जाना ही पतझड़ है। हनुमान जी लंका गए, लौटकर श्रीराम के पास आ गए। लक्ष्मण के लिए औषधि लेने गए और लौट आए। यह लौटकर आ जाना ही अपनी स्वस्थिति में स्थित हो जाना है।
जिस घर में हवा निकलने की जगह नहीं होती है, वहां हवा आती भी नहीं है। हवा का आना, रुकना और निकल जाना शरीर में भी यही प्रक्रिया पंचप्राणों का संचालन करती है।आदि-मध्य-अंत, ब्रह्मा-विष्णु-महेश, उदय-मध्य-अस्त सब कुछ वही प्रक्रिया है। उद्भव स्थिति संहार भी वही पूरक, कुंभक और रेचक प्रक्रिया है। गोस्वामी तुलसीदास जी के द्वादश ग्रंथों में राम जी के बाद यदि सबसे अधिक किसी की महिमा गाई है तो वे हनुमान जी ही हैं। जिसको हनुमान जी का सहारा है, उसकी प्रतिज्ञा सदा पूरी होती है। यह वचन वैसे ही अटल है, जैसे पत्थर पर वज्र-कुलिश की लकीर। हनुमान जी असंभव को संभव और संभव को असंभव कर सकते हैं।
ऐसी महिमा और विरुदावली किसी और की नहीं है। आनंद की खान हनुमान जी का स्मरण करने मात्र से सारे संकट और शोक दूर हो जाते हैं। जिस पर हनुमान जी की कृपा होती है, उस पर माता पार्वती (गिरिजा), शिव (हर), लक्ष्मण, राम और जानकी भी अनुकूल रहते हैं। तुलसीदास जी कहते हैं कि कपिराज हनुमान की कृपा भरी चितवन-दृष्टि कल्याण की खान है, सब प्रकार का मंगल करती है।
श्रीमद्भगवद्गीता के 15वें अध्याय के अनुसार, हनुमान जी निर्वानमोहा हैं-कोई उनमें मान नहीं, कहीं मोह नहीं। जितसंगदोषा हैं, क्योंकि उन्होंने संसार की सारी आसक्तियों पर विजय प्राप्त कर ली है। अध्यात्मनित्या हैं, क्योंकि उनकी परमात्मा राम में नित्य स्थिति है। विनिवृत्तिकामा: हैं, क्योंकि न उनमें कोई कामना थी, न ही किसी कामना के त्याग का कोई अहंकार या प्रदर्शन है। सारे द्वंद्वों से मुक्त हैं। राममय होने के कारण वे अविनाशी भी हैं।
वे जन्म लेते ही सूर्य को मुख में ले लेते हैं, क्योंकि उनकी स्थिति भगवान के जिस परमधाम में स्थित है, उसे सूर्य, चंद्रमा और अग्नि प्रकाशित नहीं करते हैं। वे भगवान की उस भक्ति मणि युक्त राम नाम की मुद्रिका को मुख में धारण करते हैं, जिस भक्तिमणि को प्रकाशित होने के लिए कोई दिया, घृत और बत्ती की आवश्यकता नहीं होती है।
मन की गति से चलकर भी उन्हें अपनी गति पर पूर्ण नियंत्रण है। उनका मन रामलक्ष्य होने के कारण अनत् कहीं भटकता ही नहीं। जितेंद्रिय हैं, क्योंकि राम काज करिबे को आतुर रहते हैं। उनकी इंद्रियों की आतुरता का आधार कुछ और है ही नहीं। बुद्धिमतां वरिष्ठं का तात्पर्य है-बुद्धि जब संसार विषयक होती है, तब वह कलंकित होती ही रहती है, पर जो बुद्धि को विवेक के रूप में सद् को स्वीकार कर असद् का त्याग करते हैं तो बुद्धि को भी निष्कलंकित कर देते हैं। नेत्रों से भगवान को देखकर अश्रुप्रवाह करते हैं। कान से भगवान की कथा सुनकर स्वयं को समुद्र बनाकर कथा सरिता को भरते रहते हैं। पैर से भगवान के कार्य के लिए चलते हैं। हाथ से भगवान के चरण दबाते और पंखा झलते हैं। जिव्हा से भगवान की कथा कहते भी हैं और उनकी दिव्यता का अनुभव कर अपने रोम-रोम में उन्हें बसाए रहते हैं।
हनुमान जी ने भगवान के प्रिय पात्रों की सेवा करके भगवान को अपने वश में कर रखा है। जिस राम नाम को सुनाकर शंकर जी काशी में मरने वालों को मुक्ति दिलाकर अविनाशी कहलाते हैं, उन राम के प्रिय श्रीभरत ने हनुमान जी से कहा कि कि यदि मेरे अंदर मन वचन और कर्म से मेरे भैया श्रीराम के चरणों में विशुद्ध प्रेम हो तो हे वानरराज, आप मूर्छा से उठिए तभी मानूंगा कि भगवान मेरे प्रति अनुकूल हैं।
भगवान कहते हैं - प्रति उपकार करौं का तोरा। सनमुख होइ न सकत मन मोरा।। हे हनुमान, तुमने जो उपकार मेरे प्रति किया है, उसके बदले में मेरे पास कुछ ऐसा है ही नहीं कि मैं तुमसे उऋण हो सकूं। मैं तो तुम्हारे सामने मुंह करने योग्य नहीं हूं। युद्ध समाप्ति के पश्चात स्वयं सीता जी को लंका जाकर हनुमान जी ने जब श्रीराम की कुशलता और उनके प्रति उनकी प्रेमभावना की आतुरता का बखान किया तो श्रीसीता जी ने भी यही कहा कि हनुमान! मैं तुम्हें क्या दूं, मेरे पास तो कुछ है ही नहीं- का देउं तोहि त्रैलोक महुं कपि किमपि नहिं बानी समा। हनुमान जी ने सबसे ऊंचा उत्तर देकर मां के संकोच को मिटा दिया।
हनुमान जी बोले- सुनु मातु मैं पायो अखिल जग राजु आजु न संशयं। मां, इसमें कोई संदेह नहीं कि आज मैंने चौदह लोकों के राज्य का स्वामित्व पा लिया है। हनुमान जी जानते हैं कि आज मेरी मां को जो प्रसन्नता हो रही है, यदि उनके पास वर्तमान में यह सुविधा होती तो वे चौदह लोकों का मुझे स्वामित्व दे देतीं। हनुमान जी ने सोचा जो आप देना चाहती हैं, वह तो मुझे मिल ही गया।
धन्य हैं हनुमान जी और उनका ज्ञान, भक्ति और कर्म के साथ शरणागति।