यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jan 15, 2015 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
आइए जानें क्यों है प्रकृति इतना रहस्यपूर्ण, क्या है प्रकृति के रहस्य
यह संपूर्ण जगत अजीबोगरीब रहस्यों से भरा है। रहस्य का अर्थ है, जो हमें चमत्कृत कर दे, आश्चर्य में डाल दे। इसीलिए इस पूरे ब्रह्मांड को हमारे संत महात्मा ...और पढ़ें

यह संपूर्ण जगत अजीबोगरीब रहस्यों से भरा है। रहस्य का अर्थ है, जो हमें चमत्कृत कर दे, आश्चर्य में डाल दे। इसीलिए इस पूरे ब्रह्मांड को हमारे संत महात्मा रहस्यमय ब्रह्मंड कहते हैं। ऐसा इसलिए, क्योंकि जिस प्रकार यह विश्व-ब्रह्मांड चल रहा है, वह स्वयं में एक रहस्य है, एक महान आश्चर्य है।
अनादि काल से यह संपूर्ण जगत गतिमान है। इसे न कोई चलाने वाला दिखता है और न कोई ऐसी व्यवस्था दिखती है, जिस व्यवस्था से अंतरिक्ष के सारे ग्रह, नक्षत्र, तारे एक ही गति से चल चल रहे हैं। इस रहस्य को विज्ञान समझने का प्रयास अवश्य कर रहा है, लेकिन अभी तक कोई भी परिणाम हाथ नहीं आ सका है। इसका मूल कारण यह है कि विज्ञान केवल पदार्थ की गति और भाषा समझता है, पदार्थ के अतिरिक्त जो कुछ भी है, उसे विज्ञान पकड़ नहीं पाता।
स्पष्ट है कि इस जगत को चलाने वाली कोई ऐसी शक्ति है, जो अनुभवगम्य नहीं है। हमारे शास्त्रों में अणु और विभु दो बड़े ही महत्वपूर्ण शब्द आए हैं। अणु का अर्थ है- पदार्थ और विभु का अर्थ है- अ-पदार्थ। पदार्थ के अतिरिक्त और सभी कुछ। विभु-भाव रूप है। इसलिए यह दिव्य है। इसे कोई पकड़ नहीं सकता, छू नहीं सकता। कोई अनुभव कर सकता है, जो लोग इस विभु का अनुभव कर लेते हैं, वे आसानी से इस निसर्ग-प्रकृति को समझने लगते हैं।
प्रकृति का अर्थ है प्र-कृति। जो कृति पहले से है, जो पहले से ही अस्तित्व में है। इस अस्तित्व का कभी लोप नहीं होता। इसी अस्तित्व से यह प्रकृति या फिर जीव-जगत चलता रहता है। नक्षत्र, ग्रह और तारों में जो गति है, वह इसी अस्तित्व के कारण है। अस्तित्व ही प्राण है, शक्ति तेज और आकर्षण है, जिसकी चुंबकीय शक्ति से यह संपूर्ण ब्रह्मंड अनंत काल से समान दूरी पर नाचते हुए गतिमान हो रहा है। वह एक ही शक्ति है, जो विभिन्न रूपों में दृश्यमान हो रही है। यह सत्य है, कि हमारी आंखों में उतनी शक्ति नहीं है कि हम उन परिवर्तनों को देख सकें। इसलिए प्रकृति के बदलते हुए स्वरूप को हम नया मानने लगते हैं। जिस प्रकार कलाकार मिट्टी से खिलौना बनाता है, कभी हाथी, कभी घोड़ा आदि बहुत चीजें बनाता है। हाथी और घोड़ा बनकर तैयार भी हो जाता है। हम उसे सही भी मान लेते हैं, लेकिन जब उस मिट्टी के घोड़े को तोड़ा जाता है, तो वह फिर मिट्टी बन जाता है। इस जगत की सभी प्रक्रियाएं उसी प्रकार चल रही हैं। परिवर्तन इस प्रकृति का नियम है।