विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jul 04, 2017 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

मन बहुत चालबाज है, बहुत चालाक है : ओशो

By prabhapunj.mishraEdited By:
Updated: Tue, 04 Jul 2017 06:05 PM (IST)

मैं कौन हूं, मैं कहां से आया हूं और क्या मेरी नियति है ये हर इंसान के मन में प्रश्‍न आता है। जिसका उत्‍तर उसे जीवन के अंतिम क्षणों तक प्राप्‍त नहीं हो पता है। ओशो कहते हैं मन बहुत चालबाज है।

मन बहुत चालबाज है, बहुत चालाक है : ओशो
मन बहुत चालबाज है, बहुत चालाक है : ओशो

खुद से खोजना होगा उत्‍तर

उपनिषदों में उत्तर हैं, वेदों में उत्तर हैं, कुरान में, गीता में, बाइबिल में। उत्तरों से भरा हुआ है इतिहास, मगर वे उत्तर पराए हैं। किससे पूछ रहे हो यह प्रश्‍न तो अपने से ही पूछने योग्य है। यह प्रश्‍न तो मंत्र है। इस प्रश्‍न को लेकर तो भीतर डुबकी मारनी जरूरी है। जब तक तुम अपने चित्त को इतना शांत न कर लो कि चित्त दर्पण हो जाए, तब तक तुम्हें अपनी प्रतिछवि दिखाई नहीं पड़ेगी। और लाख उत्तर दिए जाएं, उधार होंगे। कोई कह दे कि तुम आत्मा हो, क्या होगा सार? सुन लोगे, समझोगे क्या खाक! कोई कह दे कि तुम परमात्मा हो, तो भी क्या होगा? कहा तो गया है बहुत बार। सुना भी तुमने बहुत बार, मगर जीवन जहां है, वहीं का वहीं है।

मन बहुत चंचल है

जल्दी से किसी उत्तर से राजी मत हो जाना, क्योंकि मन बहुत चालबाज है, बहुत चालाक है, चतुर है। मन कहेगा- यह भी क्या बात! अरे साफ तो कृष्ण ने कहा है कि तुम कौन हो। साफ तो उपनिषद कहते हैं कि तुम कौन हो। और क्या होगी स्पष्ट बात? अहं ब्रह्मास्मि! मैं ब्रह्म हूं! उदघोषणा कर गए ऋषि-मुनि, जिन्होंने जाना, द्रष्टा, जिन्होंने देखा। अब तुम क्यों सिर पचा रहे हो? तुम भी दोहराओ-अहं ब्रह्मास्मि! और यही लोग कर रहे हैं, दोहरा रहे हैं। मगर जो उत्तर तुम्हारा नहीं है, वह दो कौड़ी का है। कितना ही कीमती मालूम पड़े, उसमें प्राण नहीं हैं, उसमें श्वास नहीं चलती, हृदय नहीं धड़कता।

तुम पूछते हो कि कहां से मेरा आना हुआ

इसे स्मरण रखो- न तो तुम कहीं से आए हो, न कहीं जा रहे हो। महर्षि रमण के अंतिम क्षण थे। और किसी ने पूछा कि आप जा रहे हैं, आप हमें छोड़ कर जा रहे हैं, हमें अनाथ किए जा रहे हैं। रमण ने आंखें खोलीं और कहा- तुम पागल हुए हो! मैं जाऊंगा भी तो कहां जाऊंगा? जाने को जगह कहां है? यहीं हूं और यहीं रहूंगा। शरीर में नहीं तो शरीर के बाहर। घर में नहीं तो घर के बाहर। इधर नहीं तो उधर। मगर जाऊंगा कहां? जाने को जगह कहां है? न आया हूं, न जाऊंगा।