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सफल व सुखी जीवन के लिए क्यों जरूरी है विनम्रता और दूसरों के गुणों की प्रशंसा? जानें मानस रोगों से बचने के उपाय

Published: Mon, 05 Oct 2026 09:27 AM (IST)

प्रशंसा करना परियोजना नहीं, अपितु स्वभाव होना चाहिए। स्वभाव प्रभाव को तुरंत स्वीकार कर लेता है, किंतु प्रभावशाली अहं में ग्रस्त रहने के कारण स्वभाव को नहीं समझता है...

आलोचना और दोष निकालने की आदत छोड़ना

आलोचना और दोष निकालने की आदत छोड़ना

स्वामी मैथिलीशरण (संस्थापक अध्यक्ष, श्रीरामकिंकर विचार मिशन)। भूमि पर विजय प्राप्त करने के लिए पुरुषार्थ चाहिए, लेकिन हृदय पर विजय प्राप्त करने के लिए ईश्वर कृपा, विनम्रता और दूसरे के गुणों की चर्चा आवश्यक है, जिसमें मनुष्य को तन-मन-धन से आनंदमय करने की अद्भुत शक्ति होती है।

अत: मानसिक अपंगता से दूर हों, पर-निंदा छोड़कर गुणों की सुशुप्त स्तुति को जगाइए और श्रेय और प्रेय की प्राप्ति करके स्वयं और समाज में आनंदोत्सव मनाइए।

जो पतंग तनी रहती है, उसके कटने की आशंका अधिक रहती है, क्योंकि उसमें काटने की क्षमता तो बहुत होती है, पर उसको यह पता ही नहीं होता है कि जो बिल्कुल विनम्र, लचीली व ढीली पतंग होती है, उसकी एक झटके की धार भी तनी हुई पतंग को काटने में सक्षम हो सकती है।

नवम सरल सब सन छलहीना।
मम भरोस हियं हरष न दीना।।

भगवान का भक्त स्वाभाविक रूप से सबमें भगवान को देखता है। इस सहज स्वभाव के कारण जड़ चेतन, अनुकूलता-प्रतिकूलता में हर स्थिति में वह सदा हर मौसम में रहने का अभ्यस्त रहता है। जो बीज हम बोते हैं, फल वही प्राप्त होता है; परंतु हम यह नहीं जानते हैं कि यदि बीजारोपण की पद्धति, काल, नाप-तौल का यदि संयमित ज्ञान हमें हो तो हम फल का नाम तो नहीं बदल सकते हैं, पर उसकी उपज-गुणवत्ता को कई गुना बढ़ाकर, हम न केवल अपने अपितु दूसरों के जीवन में भी अमृतत्व का विस्तार कर सकते हैं।

अपनी विफलता में कई बार कारण रूप हम स्वयं होते हैं और दोष दूसरे में देखने की प्रवृत्ति के कारण अपनी प्रगति में बाधक बने रहते हैं। दूसरों में दोष देखना भविष्य में मानस रोग बनकर हमारी अवनति का कारण हो जाता है। हम उन्हीं दोषों का शिकार बन जाते हैं, जिन्हें हम दूसरों में देख रहे थे। हम मानते हैं कि हम गुणी हैं और किसी को हमारे गुण की आवश्यकता है तो हम किसी दूसरे की प्रशंसा क्यों करें?

वह हमारी पहचान, हमारा उपयोग और मूल्यांकन कर लेगा। उस गुणी को यह पता नहीं होता है कि उसके पास आप जैसे बहुत आते हैं और उन बहुतों में वह उसको चुन लेता है, जो उसे गुणी मानता है तथा अपने मुख से उसके गुणों की प्रशंसा करके आपने जीवन में उसको अपनी उपलब्धि बताता है।

अधिकांश बार जीवन में विफलता का कारण मात्र वह होता है, जो हम स्वयं अपने लिए चाहते हैं, पर दूसरों को नहीं देते हैं। लोगों को यह भ्रम होता है कि उन्हें अपनी योग्यतानुरूप फल नहीं मिलता है। ज्यों ही यह भाव आया और फिर व्यक्ति खोज करने लग जाता है कि किसको उसकी योग्यता से अधिक मिल रहा है। निश्चित रूप में उस खोज की प्रक्रिया बिल्कुल मिथ्या होती है।

अधिकांश लोग किसी एक या एक से अधिक योग्यता को यह मानकर चलते हैं कि जब हम इतने योग्य हैं तो जीवन के अन्य संदर्भ में चाहे जितने अयोग्य हों, पर हमें अपनी योग्यता का परिणाम तो मिलना ही चाहिए। योग्य की योग्यता की परिभाषा समय, व्यक्ति, देश के संदर्भ में उसी तरह बदल जाती है, जिस तरह मौसम बदलने से उपयोग में आने वाले वस्त्रों की उपयोगिता बदल जाती है। तो हमें करना क्या है?

घर के छोटे-बड़े सदस्यों से लेकर बाहर व्यवहार में आने वाले सभी लोगों के समक्ष स्वयं को जिज्ञासु बनाए रहें। साथ ही दूसरे के अच्छे कार्य की न्यूनतम प्रशंसा अवश्य करें। अपने चेहरे पर किसी के प्रति व्यंग्यात्मक भाव को कभी न आने दें। कोई व्यक्ति कुछ लिख रहा है, पढ़ रहा है, किसी से बात कर रहा है तो गलती से भी उसके पास जाकर न बैठें।

आप जितना दूसरे को सहज रहने में सहयोग करेंगे, वह धीरे-धीरे आपसे सहज हो जाएगा। यह कपट नहीं है अपितु यह वह शिक्षा है, जो हमें अनेक मानसिक रोगों के कारण होने वाली पीड़ा में औषधियों के सेवन से बचा सकती है।

अपने संपूर्ण लीलाकाल में भगवान श्रीराम का जितने लोगों से संपर्क हुआ, उन्होंने उनकी न केवल प्रशंसा की अपितु उनके कार्यों में गुणदर्शन किया। इसको लेकर भक्तों ने कई बार मीठा विनोद भी किया कि आपमें गुण तो बहुत हैं, पर एक दोष है कि आपको किसी में दोष नहीं दिखाई देता है।

कदाचित जो लोग भगवान को यह कहकर व्यंग्य करते हैं, उन्हें यह पता नहीं होता है कि यदि भगवान को किसी में दोष दिखाई देते होते तो भगवान पर दोषारोपण करने वाले सज्जन स्वयं भी भगवान के पास नहीं होते। वानर सेना में सुग्रीव भी उनमें एक हो सकते हैं।

हम कोयल की प्रशंसा करते हैं, खेत में फूले सरसों के फूलों की प्रशंसा करते नहीं समाते, शीतल वायु, उदीयमान सूर्य को देखकर तो खड़े होकर आंखें बंद करके भी उसकी प्रशंसा करते हैं, क्योंकि इनकी प्रशंसा संसार में हमें बड़ा बनाती है। हम प्रकृति प्रेमी कहलाते हैं।

सौंदर्य के प्रति संवेदना और परख हमारा यश बढ़ाती है। चैतन्य की प्रशंसा करने में हमारी मति जड़ हो जाती है। जबकि जड़ और चैतन्य दोनों के मूल में एक मात्र ईश्वर ही है, जो जड़ में जड़ जैसा और चैतन्य में चैतन्य जैसा दिखाई देता है।

जो चेतन कह जड़ करइ, जड़हि करइ चैतन्य।
अस समर्थ रघुनायकहि भजहिं जीव ते धन्य॥
बोले बिहंसि महेस तब ज्ञानी मूढ़ न कोए।
जेहि जस रघुपति करहिं तब सो तस तेहि छन होए।।

सबमें ईश्वर को देखने वाला प्रशंसा ईश्वर की करेगा और लाभ उसको मनुष्य से होगा। संसार ने अपभ्रंश शब्दों के जाल में फंसकर स्वार्थ और परमार्थ को अलग-अलग कर दिया, जबकि दोनों अलग हैं ही नहीं।

उमा जे राम चरन रत बिगत काम मद कोह।
निज प्रभु मैं देखईं जगत केहि सन करहिं विरोध।।

जो भगवान में रत है, जो भक्ति में रत है, वह किसी दूसरे की प्रशंसा उसी तरह करना चाहेगा, जैसे किसी भूखे को भोजन कराकर सुख लिया जाता है। उसके मन में किसी से राग-द्वेष विरोध होता ही नहीं है।

एहि बिधि सकल जीव जग रोगी।
सोक हर्ष भय प्रीति बियोगी।
मानस रोग कछुक मैं गाये।
हहिं सबके लखि बिरलेन्ह पाए।।

मानस रोगों की विशेषता है कि ये होते सब में हैं, पर आत्ममंथन की वृत्ति के अभाव में व्यक्ति स्वयं में उन रोगों को पहचान नहीं पाता है। प्रशंसा सुनने की इच्छा एक ऐसा सुशुप्त वायरस है, जिसकी कोई दवा नहीं है। प्रशंसा पाने की इच्छा गुब्बारे की तरह फैलती और फूलती ही जाती है। यदि कहीं हम प्रशंसा की हवा कम भरें तो गुब्बारे का मुंह सिकुड़ जाता है और अधिक भर दें तो गुब्बारा फट जाता है।

फटकर गुब्बारा हानि अपनी ही करता है, पर दोषी रूप में प्रमाणित दूसरे को करता है। प्रशंसा सुनने की इच्छा हमेशा यही रहती है कि दूसरों के सामने और दूसरों की तुलना में हमें सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करो। उसे श्रेष्ठता से कोई मतलब नहीं, क्योंकि अहंकार की पूर्ति श्रेष्ठ होने में नहीं, सर्वश्रेष्ठ होने में है अर्थात हमारे समान कोई नहीं है। प्रशंसा वही कर सकता है, जो प्रशंसा से ऊपर है।

जो चाहता है वह दे देना भूखे को भोजन कराने के समान है। यह बात भले ही बहुत साधारण लगती हो पर इसके रहस्य को न जान पाने के कारण हम अपने गुणों का पर्याप्त लाभ न ले पाते हैं, न ही दे पाते हैं। प्रशंसा करना परियोजना नहीं होना चाहिए, अपितु स्वभाव होना चाहिए।

स्वभाव प्रभाव को तुरंत स्वीकार कर लेता है, किंतु प्रभावशाली अहं में ग्रस्त रहने के कारण स्वभाव को नहीं समझता है। यह समीकरण बहुत जटिल लगता है, पर बहुत सरल है। स्वाभाविकता पर क्योंकि कोई पालिश नहीं होती है, इसलिए वह कभी निराश और हताश नहीं होती है। उसको कोई प्रयोजन तो है ही नहीं। हताश तो आशावादी होता है।

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