Trending

    विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

    यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jul 06, 2016 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

    किसी भी रिश्ते में त्याग की महत्वपूर्ण भूमिका होती है

    By Preeti jhaEdited By:
    Updated: Wed, 06 Jul 2016 11:49 AM (IST)

    यह महत्वपूर्ण नहीं है कि हम जीवन में क्या-क्या बनना चाहते हैं, बल्कि जरूरी यह है कि हम उसके लिए क्या-क्या त्याग करना चाहते हैं। ...और पढ़ें

    किसी भी रिश्ते में त्याग की महत्वपूर्ण भूमिका होती है
    किसी भी रिश्ते में त्याग की महत्वपूर्ण भूमिका होती है

    किसी भी रिश्ते में त्याग की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, क्योंकि त्याग की भावना में नफरत, प्रतिस्पर्धा, एकाधिकार, नियंत्रण जैसी तमाम नकारात्मक बातें नष्ट हो जाती हैं। इसके बाद जो रह जाता है तो वह है सिर्फ प्रेम। प्यार में त्याग की भावना अमृत के समान है, जो हमें मुश्किल समय में भी नया जीवन देता है। तब हमारे पास थोड़ा होते हुए भी हमें परिपूर्णता का अहसास होता है।
    असल में, जब हम सच्ची भावना से त्याग करते हैं, तब हमें कुछ खोने का नहीं, बल्कि पाने का अहसास होता है। ऐसी स्थिति में सामने वाले के मन में हमारे लिए सम्मानजनक स्थान बनना है। त्याग की भावना जितनी प्रबल होगी, प्रेम उतना ही गहरा होता जाता है और जिस रिश्ते में प्रेम होगा, वहां कलह की कोई गुंजाइश नहीं होती, बल्कि एक-दूसरे के लिए सम्मान होगा। तब दोनों ओर भरोसे की भावना अपने चरम पर पहुंच जाती है। संत कबीरदास से एक व्यक्ति ने पूछा, कृपया यह बताएं कि मुङो गृहस्थ बनना चाहिए या संन्यासी? कबीरदास बोले, जो भी बनो आदर्श बनो। तब दोपहर का समय था।
    कबीर ने अपनी पत्नी को बुलाकर कहा, दीपक जलाकर दो, मुङो कपड़े बुनने हैं। पत्नी ने तर्क किए बगैर दीपक जला दिया। कबीर ने उस व्यक्ति से कहा, गृहस्थ बनना है तो आपस में ऐसा विश्वास बनाना कि दूसरे की इच्छा ही अपनी इच्छा हो। इसके बाद उस व्यक्ति को कबीर एक पहाड़ी पर ले गए, जहां एक बुजुर्ग संत रहते थे। कबीर ने संत से पूछा, बाबा आपकी आयु कितनी है? बाबा ने कहा कि 80 साल। कबीर ने फिर से पूछा, बाबा आयु बताइए? उन्होंने फिर से कहा, 80 साल। 1 थोड़ी-थोड़ी देर में कबीर उनसे उनकी उम्र पूछते रहे और वह धैर्य के साथ उत्तर देते रहे। कुछ समय बाद कबीर और व्यक्ति पहाड़ी से उतर आए। नीचे पहुंचकर कबीर ने आवाज लगाई, बाबा नीचे आ सकते हैं, कुछ पूछना रह गया था। बाबा नीचे उतरकर आए। कबीर ने कहा, आपकी आयु एक बार और पूछनी थी। बाबा ने कहा, 80 साल और वापस चले गए। यह नजारा देखकर वह व्यक्ति दंग रह गया और पूछने लगा कि वृद्ध संत को बेवजह पहाड़ी से उतारकर फिजूल का सवाल क्यों? कबीर बोले, यदि संत बनना हो तो इसी तरह धैर्यवान और क्षमाशील बनना। यह महत्वपूर्ण नहीं है कि हम जीवन में क्या-क्या बनना चाहते हैं, बल्कि जरूरी यह है कि हम उसके लिए क्या-क्या त्याग करना चाहते हैं।