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    Rangbhari Ekadashi 2026: कब और क्यों मनाई जाती है रंगभरी एकादशी? यहां पढ़ें धार्मिक महत्व

    Updated: Mon, 23 Feb 2026 12:22 PM (GMT+05:30)

    बाबा विश्वनाथ का विशेष शृंगार किया जाता है और उन्हें गुलाल अर्पित कर भक्तगण होली के रंगों से सराबोर हो जाते हैं। ...और पढ़ें

    प्रेम और सद्भावना समाज को सशक्त बनाते हैं

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    प्रो. रामनारायण द्विवेदी (महामंत्री, श्रीकाशी विद्वत परिषद्, वाराणसी)। फाल्गुन शुक्ल पक्ष की एकादशी रंगभरी होती है। इस दिन बाबा विश्वनाथ का विशेष शृंगार होता है। रंगभरी एकादशी के अवसर पर बाबा विश्वनाथ को दूल्हे के रूप में सजाया जाता है और मां गौरा का गौना करवाया जाता है।

    vshnu ji

    रंगभरी एकादशी के दिन भगवान शिव माता पार्वती से विवाह के बाद पहली बार उन्हें काशी नगरी लाए थे। यही वह दिन है, जब से होली का हुड़दंग आरंभ हो जाता है। इस वर्ष गुरुवार, 26 फरवरी को एकादशी रात्रि 12 बजकर 06 मिनट से लगकर शुक्रवार 27 फरवरी को रात्रि में 9 बजकर 58 मिनट तक रहेगी। अतः 27 फरवरी को रंगभरी एकादशी मनाई जाएगी।

    यह रंगभरी एकादशी 'आमलकी' कहलाती है। इस दिन आंवले के समीप बैठकर भगवान का पूजन करने का विधान है। ब्रहाांडपुराण में कथा आती है कि वैदेशिक नगर में चैत्ररथ राजा के यहां एकादशी व्रत का अत्यधिक प्रचार था।

    एक दिन आमलकी एकादशी के दिन नगर के संपूर्ण नर-नारियों को व्रत के महोत्सव में मग्न देखकर कुतूहलवश एक बहेलिया वहां आकर बैठ गया और भूखा-प्यासा दूसरे दिन तक वहीं बैठा रहा। इस प्रकार अकस्मात ही व्रत और जागरण हो जाने से दूसरे जन्म में वह जयंती का राजा हुआ। अतः इस व्रत को करने से धन-धान्य, यश की वृद्धि होती है।


    रंगभरी एकादशी का आध्यात्मिक महत्व है। जो सर्वेश्वर सर्वशक्तिमान अनंतकोटि ब्रह्मांडनायक भगवान है, वे रसरीति से अत्यंत सुलभ हो जाते हैं। कहते हैं- प्रेमदेवता जिसको छू लेता है, वह कुछ-का-कुछ हो जाता है। अल्पज्ञ सर्वज्ञ हो जाता है और सर्वज्ञ अल्पज्ञ हो जाता है। अल्पशक्तिमान सर्वशक्तिमान हो जाता है। सर्वशक्तिमान अल्पशक्तिमान हो जाता है। परिच्छिन्न व्यापक हो जाता है, व्यापक परिच्छिन्न हो जाता है। इस प्रकार प्रेम देवता के स्पर्श से कुछ का कुछ हो जाता है।

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    प्रेमरंग में रंगे हुए प्रेमी के लिए संपूर्ण संसार ही प्रेमास्पद प्रियतम हो जाता है। यह जो रंगभरी एकादशी होती है, इसमें रंग क्या है? जिसके द्वारा जगत रंग जाता है- 'उड़त गुलाल लाल भए अंबर' अर्थात गुलाल के उड़ने से आकाश लाल हो गया। आकाश इस सारे भौतिक प्रपंच का उपलक्षण है। इस भौतिक जगत की इसमें ब्रह्मात्मकता का आविर्भाव होता है।

    काशी की पावन धरती पर मनाया जाने वाला रंगभरी एकादशी का पर्व धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह उत्सव विशेष रूप से श्री काशी विश्वनाथ मंदिर से जुड़ा हुआ है और भगवान शिव एवं माता पार्वती के दांपत्य जीवन की मधुर स्मृति का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि महाशिवरात्रि के पश्चात इस दिन भगवान शिव माता पार्वती को पहली बार काशी लेकर आते हैं, जिसे ‘गौना’ की परंपरा के रूप में देखा जाता है। इस अवसर पर काशी नगरी में अद्भुत उल्लास और भक्ति का संगम देखने को मिलता है।

    बाबा विश्वनाथ का विशेष शृंगार किया जाता है और उन्हें गुलाल अर्पित कर भक्तगण होली के रंगों से सराबोर हो जाते हैं। यह पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और सौहार्द का भी संदेश देता है। सभी वर्ग, जाति और आयु के लोग एक साथ मिलकर इस उत्सव में भाग लेते हैं, जिससे समाज में समरसता और भाईचारे की भावना सुदृढ़ होती है।

    आध्यात्मिक दृष्टि से रंगभरी एकादशी आत्मिक आनंद और ईश्वर से जुड़ने का विशेष अवसर प्रदान करती है। भक्तजन इस दिन भगवान शिव की आराधना कर अपने जीवन में सुख, शांति और समृद्धि की कामना करते हैं। रंगों का यह उत्सव जीवन में सकारात्मकता, प्रेम और नई ऊर्जा का संचार करता है। यह संदेश देता है कि जैसे रंग जीवन को सुंदर बनाते हैं, वैसे ही प्रेम और सद्भावना समाज को सशक्त बनाते हैं।

    यह पर्व काशी की जीवंत परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। स्थानीय कलाकार, शिल्पकार और व्यापारी इस अवसर पर सक्रिय होते हैं। अतः रंगभरी एकादशी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि काशी की आत्मा का उत्सव है, जो आस्था, प्रेम और सामाजिक एकता के रंगों से समाज को जोड़ता है।

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