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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Oct 02, 2023 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

जीवन में मुदिता और मंगलमय परिणाम केवल संत संगति से ही मिल सकते हैं

By Pravin KumarEdited By: Pravin Kumar
Published: Mon, 02 Oct 2023 01:10 PM (GMT+05:30)

संत जिस निर्विकार को धारण कर लेते हैं संत का साथ करने वाले को वह अनायास प्रसाद रूप में मिल ...और पढ़ें

जीवन में मुदिता और मंगलमय परिणाम केवल संत संगति से ही मिल सकते हैं
जीवन में मुदिता और मंगलमय परिणाम केवल संत संगति से ही मिल सकते हैं

स्वामी मैथिलीशरण (संस्थापक-श्री रामकिंकर विचार मिशन)। संत संगति का सुख अनुपम होता है। सद्-असद् का विवेक न होने पर हम राग और द्वेष की दृष्टि से संसार को देखने लग जाते हैं। परिणामत: हम समत्व में स्थित नहीं रह जाते। भगवान श्री राम ने शबरी के समक्ष सातवीं प्रकार की भक्ति का उपदेश करते हुए कहा कि मेरा भक्त मुझसे भी अधिक संत को मानता और धारण करता है।

इसका तात्पर्य है कि ईश्वर की सर्वव्यापकता के सिद्धांत के नाम पर कहीं कोई अपवित्र को ही धारण न कर लें। पृथ्वी पर संत भगवान के सगुण रूप ही होते हैं, क्योंकि सृष्टि तो गुण-दोष से मिलकर ही बनी हुई है। केवल गुण या केवल दोष से सृजन संभव ही नहीं है। उसके लिए गुण और दोष दोनों का आश्रय लेना ही होता है, पर ध्यान केवल यह रखना है कि ग्रहण करते समय सद् को ग्रहण करके असद् का त्याग कर दिया जाता है। संत ही विभाजन करने का सही माध्यम होते हैं :

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कहहिं बेद इतिहास पुराना।

बिधि प्रपंच गुन अवगुन साना।

जड़ चेतन गुन दोष मय

बिस्व कीन्ह करतार।

संत हंस गुन कहहिं पय

परिहरि बारि बिकार।।

संत जिस निर्विकार को धारण कर लेते हैं, संत का साथ करने वाले को वह अनायास प्रसाद रूप में मिल जाता है। इसी को संत कृपा और संत महिमा कहते हैं। गरुड़ जी ने पूछा, महाराज! कौन-सा दुख सबसे बड़ा है और कौन-सा सुख सबसे बड़ा है? बड़ दुख कवन कवन सुख भारी?

तब जीवन को बिल्कुल नई दिशा देते हुए काकभुशुण्डि जी बोले, हे पक्षीराज! सबसे बड़ा दुख दरिद्रता है और संत का मिलना सबसे बड़ा सुख है। संसार मानता है कि जिसके पास धन का अभाव है, वह दुखी है और जिसके पास बहुत धन है वह सुखी है, पर श्रीरामचरितमानस कहता है कि यह निर्णय सत्य नहीं है। यदि सत्य और तथ्य ऐसा ही होता तो संसार के सारे धनी बहुत सुखी होते और जितने निर्धन हैं, वे सब दुखी दिखाई देते!

संसार जो अपरा जड़ प्रकृति को ही सत्य मानता है, उसमें परा तत्व को नहीं देख पाता है, वह परम सत्य के साक्षात्कार से वंचित रह जाता है, क्योंकि जिसके पास जितना अधिक है, वह अपने को उसका स्वामी मानने के कारण एक तो उसके संरक्षक के लिए दुखी है और उसका दूसरा दुख यह है कि हमारी तुलना में दूसरे के पास अधिक धन क्यों है, इस बात से दुखी रहता है।

संतों के संग का सुपरिणाम यह होता है कि साधक दुख से सुख में स्थित हो जाता है। संत हमें सुख के मूल ईश्वर में निष्ठ कर देता है। यही ब्रह्मविद्या है कि मन, बुद्धि, अहंकार, पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश रूप जो आठ प्रकार की जड़ प्रकृति है, संत साधक को उसमें चैतन्य का बोध करा देता है और तब वह जड़ प्रकृति भी साधक को चैतन्यरूप में ही सुख देती है, जो सत्, चित् और आनंद का अखंड रूप बन जाती है।

किसी की तुलना में अपने को प्रमाणित करने की इच्छा एक मानस रोग है, जिसके कारण हम मानसिक रूप से जीवन की हर घटना के अर्थ को अनर्थ के रूप में परिणत करके लगाते हैं और हर हाल में दूसरे को दोषी ठहराकर सुखी होना चाहते हैं। यदि दरिद्रता का अर्थ धन की कमी होता तो काकभुशुण्डि जी यह कहते कि जिसके पास धन की कमी है, वह दरिद्रता के कारण दुखी है और जिसके पास बहुत धन है, वह सुखी है। किंतु वे कहते हैं कि धन का अभाव तो दरिद्रता है, पर संत से मिलने से बड़ा कोई सुख नहीं है :

संत संग अपवर्ग कर कामी भव कर पंथ।

कहहिं संत कबि कोबिद श्रुति पुरान सद्ग्रंथ।।

संसारी का साथ बंधन का कारण होता है और संत का साथ मुक्ति का कारक होता है। संत उस चंदन के समान होता है कि वह उसको काटने वाली कुल्हाड़ी में भी अपनी सुगंध दे देता है, पर कुल्हाड़ी स्वयं किसी को सुगंध नहीं दे सकती है। वह तो केवल काटने के ही काम आती है। संत का हृदय सरोवर के उस पवित्र जल के समान है, जिसमें चार घाट हैं। जहां ज्ञान, भक्ति, कर्म और शरणागति के सूत्र सहज उपलब्ध हो जाते हैं। संत, शंभु और विष्णु की यदि कहीं निंदा हो रही हो तो मर्यादा यही है कि वहां ठहरना नहीं चाहिए। इसलिए संत का मिलना सर्वश्रेष्ठ है।

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