माखनचोर, गिरधारी या रणछोड़? कृष्ण के इन नामों का असली अर्थ शायद ही जानते होंगे आप
भगवान श्रीकृष्ण का अवतरण अभूतपूर्व घटना है। द्वापर में कृष्ण का जन्म एक बालक का चमत्कारिक विधि से जन्म लेना ...और पढ़ें

भगवान कृष्ण के नामों का रहस्य (Picture Credit- AI Generated)

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मालिनी अवस्थी, लखनऊ। चमत्कार और कृष्ण तो परस्पर जुड़े हुए हैं। कारागार में जन्म होना और जन्म लेते ही माता देवकी और पिता वसुदेव से बिछुड़कर गोकुल में यशोदा के ममत्व और नंद बाबा की छत्रछाया में पलना सब कुछ असाधारण है।
मथुरा नगरी कृष्ण जैसी विभूति का जन्मस्थान होने के कारण धन्य हो गई। मथुरा ही नहीं, सारा शूरसेन या ब्रज आनंदकंद कृष्ण की मनोहर लीलाओं की क्रीड़ाभूमि होने के कारण गौरवान्वित हो गया।
मथुरा और ब्रज को कालांतर में जो असाधारण महत्व प्राप्त हुआ, वह इस महापुरुष की जन्मभूमि और क्रीड़ाभूमि होने के कारण ही हो सका। महाभारत और भागवत ही नहीं, प्राचीन और अर्वाचीन साहित्य का एक बड़ा भाग कृष्ण की मनोहर लीलाओं से ओत-प्रोत है। उनके लोकरंजक रूप ने भारतीय जनता के मानस-पटल पर जो छाप लगा दी है, वो अमिट है।
ब्रज में श्रीकृष्ण को लोग कई नामों से पुकारते हैं और इन सभी नामों में कृष्ण की कोई न कोई लीला का इतिहास छिपा हुआ है। कान्हा, गोपाल, गिरधर, माधव, केशव, मधुसूदन, गिरधारी, रणछोड़, बंशीधर, नंदलाल, यशोदानंदन और मुरलीधर कृष्ण भगवान की विराट उपस्थिति भारतीय संस्कृति और भारतीय जीवन-दर्शन के कण-कण में दिखाई देती है।
कृष्ण ने इंद्र से गोधन की रक्षा की और अन्याय का प्रतिकार करते हुए उनके अहंकार को चूर किया। विषधर कालिया नाग ने, जिसने मथुरा के पास एक सुविधाजनक स्थल तक जाने का मार्ग रोक दिया था, कृष्ण ने उसका मर्दन करके उसे खदेड़ दिया किन्तु उसका वध नहीं किया। कृष्ण की यही विशेषता उनके व्यक्तित्व के उदार पक्ष को भी सामने लाती है। वे दंड देते हैं, लेकिन विनाश उनका उद्देश्य नहीं होता। वे सुधार और लोकमंगल का मार्ग खुला रखते हैं।
कृष्ण और उनके बलशाली भाई बलराम ने अखाड़े में कंस के मल्लों को परास्त किया और बाद में अत्याचारी कंस का वध कर अपनी मां देवकी और पिता वसुदेव को मुक्त कराया तथा राजा उग्रसेन को उनका राज्य वापस दिलाया। सत्ता प्राप्त करने के बाद स्वयं राजा बन बैठना कृष्ण का उद्देश्य नहीं था। उन्होंने उग्रसेन को राजसिंहासन सौंपकर यह भी दिखाया कि शक्ति का अर्थ अधिकार पाना नहीं, बल्कि उचित व्यक्ति को उसका अधिकार लौटाना है।
कंस, जरासंध, शिशुपाल जैसे अधर्मियों के अत्याचार से पृथ्वी को मुक्त कराने और धर्म को फिर से स्थापित करने के लिए उनका जन्म हुआ। श्रीकृष्ण का समय बड़े महत्त्व का है। इसी समय प्रजातंत्र और नृपतंत्र के बीच कठोर संघर्ष हुए और भारत का वह महान भीषण संग्राम हुआ, जिसे महाभारत कहते हैं।
इस काल की सांस्कृतिक महत्ता भी अत्यंत व्यापक है। कृष्ण ने सहज भाव से जीवन जीते हुए समाज को प्रेम, बंधुत्व और करुणा का संदेश दिया। माँ यशोदा के साथ वात्सल्य, गोपियों और ग्वालों के साथ सख्य भाव, राधा रानी के साथ निःस्वार्थ प्रेम भाव तथा समस्त जीवों के साथ प्रेम और सम्मान का भाव सिखलाते हुए कृष्ण ने किशोरावस्था में ही ब्रज छोड़ दिया। इस प्रस्थान के पीछे मथुरा की रक्षा का भाव था और मोह को त्यागकर आगे कर्मरत रहने का संदेश भी।
कृष्ण का व्यक्तित्व केवल लीलाओं और चमत्कारों तक सीमित नहीं है। उनका विराट स्वरूप भारतीय दर्शन में जीवन और जगत को देखने की एक ऐसी दृष्टि देता है, जिसमें प्रेम और कर्म, भक्ति और ज्ञान, नीति और लोकमंगल एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। वे जीवन से पलायन नहीं सिखाते, बल्कि जीवन के संघर्षों के बीच धर्मपूर्वक खड़े होकर अपने कर्तव्य का निर्वाह करने की प्रेरणा देते हैं। यही कारण है कि कृष्ण लोकनायक भी हैं, दार्शनिक भी, प्रेम के आराध्य भी हैं और धर्म के संरक्षक भी।
उनके विराट व्यक्तित्व में उनकी उदारता का पक्ष भी अत्यंत उज्ज्वल है। कृष्ण ने मनुष्य को उसकी सीमाओं, भूलों और दुर्बलताओं के साथ स्वीकार किया। सुदामा के प्रति उनका स्नेह हो, विदुर के घर जाकर भोजन करना हो, शरणागत की रक्षा हो या शिशुपाल जैसे विरोधी को भी बार-बार क्षमा करना, कृष्ण के व्यक्तित्व में करुणा और उदारता का अद्भुत समन्वय है। वे अपने प्रियजनों के नहीं, समस्त मानवता के कृष्ण हैं। उनके लिए मनुष्य की प्रतिष्ठा उसके पद, वैभव या सामर्थ्य से नहीं, उसके भाव से है। कृष्ण राजमहलों में भी सहज हैं और ग्वाल-बालों के बीच भी। वे अर्जुन के सारथी बनकर यह संदेश देते हैं कि महानता अधिकार में नहीं, सेवा और समर्पण में है।
महाभारत के युद्ध में जब अर्जुन मोह में पड़ गए, तब श्रीकृष्ण ने जो ज्ञान दिया, वह आज भी पूरे विश्व को रास्ता दिखाता है। युद्ध के समय कृष्ण अर्जुन को कर्मयोग की शिक्षा इस प्रकार देते हैं कि गीता सर्वकालिक महानतम पथ-प्रदर्शिका बन गई। मोह त्यागो, कर्म करो, निरासक्त कर्म करो, क्योंकि वही तुम्हारा धर्म है। तुम्हारा जन्म कर्म करने के लिए हुआ है, फल की इच्छा मत करो। ज्ञान का यह महामंत्र आज जीवन की आदर्श कुंजी है।
कृष्ण अवतार की सबसे बड़ी उपलब्धि गीता है. श्रीमद्भगवद्गीता में कर्मयोग और जीवन जीने की कला मिलती है। गीता में समत्व का संदेश है। सुख-दुःख, लाभ-हानि में समान रहो। कृष्ण का दर्शन मनुष्य को बाहरी परिस्थितियों से ऊपर उठकर अपने भीतर स्थित चेतना, विवेक और कर्तव्य को पहचानने की प्रेरणा देता है। गीता में कृष्ण आत्मा को नित्य, अविनाशी और शरीर से अलग बताते हैं। वे मनुष्य को यह बोध कराते हैं कि शरीर परिवर्तनशील है, लेकिन आत्मा का स्वरूप शाश्वत है। यही दृष्टि मनुष्य को मोह, भय और मृत्यु की चिंता से ऊपर उठने की शक्ति देती है।
कृष्ण के लिए परम सत्य केवल किसी दूरस्थ सत्ता का नाम नहीं, बल्कि वह चेतना है जो समस्त प्राणियों में विद्यमान है। इसीलिए वे मनुष्य को अपने भीतर देखने, अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने और समस्त सृष्टि में एक ही परम सत्ता का दर्शन करने की प्रेरणा देते हैं। यही कृष्ण के वेदांत का मूल भाव है. आत्मबोध, समत्व और परमात्मा से एकत्व की अनुभूति। कर्म करते हुए भी भीतर से आसक्त न होना और संसार में रहते हुए भी अपने शाश्वत स्वरूप को न भूलना कृष्ण के दर्शन की सबसे बड़ी विशेषताओं में है।
यह उनके दिव्य व्यक्तित्व का चमत्कार है कि कृष्ण पर जितना साहित्य लिखा गया है, वैसा उदाहरण नहीं मिलता। जिसने कृष्ण पर रचा, वह अमर हो गया। महाभारत और भगवद्गीता रचने वाले महर्षि वेदव्यास जी से लेकर यह श्रृंखला सूरदास, मीराबाई, रसखान, नंददास, विद्यापति तक चलती है। वल्लभाचार्य द्वारा स्थापित पुष्टिमार्ग और अष्टछाप के कवियों ने कृष्ण की लीलाओं पर अद्भुत भक्ति साहित्य रचा। श्रीकृष्ण के सम्पूर्ण व्यक्तित्व का ऐसा आभामंडल है कि प्रत्येक भक्त अत्यंत सहजता से उनसे अपने आपको जुड़ा हुआ अनुभव करता है।
वो पूर्णावतार हैं। सोलह कलाओं से युक्त हैं- ज्ञान, प्रेम, न्याय, धैर्य, क्षमा,सौंदर्य, कला, संगीत, नृत्य, नेतृत्व- सब कुछ एक ही अवतार में। इसलिए वे एक ही समय में नटखट माखनचोर हैं, बांसुरी बजैया हैं, सुदर्शन चक्रधारी योद्धा हैं और गीता का ज्ञान देने वाले जगद्गुरु भी हैं।
कृष्ण के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता शायद यही है कि वे जीवन के किसी एक पक्ष में सीमित नहीं होते। बालक हैं तो आनंद हैं. मित्र हैं तो विश्वास हैं. प्रेमी हैं तो समर्पण हैं. सारथी हैं तो मार्गदर्शन हैं. योद्धा हैं तो धर्म की रक्षा हैं. क्षमाशील हैं तो करुणा हैं और योगेश्वर हैं तो समूचे जीवन-दर्शन के आलोक हैं। उनके विराट रूप में जीवन के सभी रंग दिखाई देते हैं। यही उनकी उदारता भी है। उन्होंने मनुष्य को जीवन के हर रूप को स्वीकार करते हुए धर्म, प्रेम और कर्म के साथ जीने का मार्ग दिखाया। जन्माष्टमी हमें याद दिलाती है कि धर्म के साथ रहो, प्रेम से रहो और हर परिस्थिति में मुस्कुराते हुए अपना कर्म करते रहो।
