रामचरितमानस का जीवन दर्शन: हंस की तरह दूसरों के दोष छोड़ केवल गुण अपनाना ही है सच्चा विवेक
सबको राममय मानकर प्रणाम करना और फिर सत को स्वीकार करके असत का त्याग, यही है तुलसी के मानस की ...और पढ़ें
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रामचरितमानस का अनमोल दर्शन: गुणों को अपनाएं, दोषों को त्यागें
स्वामी मैथिलीशरण (संस्थापक अध्यक्ष, श्रीरामकिंकर विचार मिशन)। तुलसी की दृष्टि है कि कोई ऐसा गुण नहीं है, जो हमारे प्रभु श्रीरामचंद्र जी में न हो और कोई ऐसा दोष नहीं है, जो मुझ तुलसीदास में न हो। यह है श्रीरामचरितमानस का जीवन दर्शन। यहां तक कि वे यह कहने लगे कि यदि मैं अपने दोषों की कथा कहने लगूं तो फिर श्रीरामचरितमानस की कथा नहीं लिख पाऊंगा, क्योंकि सारा समय आत्मकथा में ही लग जाएगा। अब वे संसार में गुण और दोषों को देखने की दृष्टि देकर श्रीराम का जीवन दर्शन सुझाते हैं-
जड़ चेतन गुन दोषमय बिस्व कीन्ह करतार।
संत हंस गुन गहहिं पय परिहरि बारि बिकार।।
जड़-चेतन विश्व को विधाता ने गुण और दोषों को मिलाकर बनाया है। अब संत लोग यह करते हैं कि गुण-दोष के इस मिश्रण में से गुणों को ग्रहण कर लेते हैं और दोषों को त्याग देते हैं। इस वृत्ति को विवेक कहते हैं। विवेक के अभाव में सृष्टि का कोई कार्य समझ नहीं आएगा।
सबको राममय मानकर प्रणाम करना और फिर सत को स्वीकार करके असत का त्याग, यही है तुलसी के मानस की वह दृष्टि, जो अन्यत्र दुर्लभ है। उन्होंने श्रीरामचरितमानस को पढ़ने और स्वीकार करने में भी वही दृष्टि दी है कि यद्यपि गाय काली क्यों न हो, पर उसका जो अमृतमय दूध होता है, वह तो परमकल्याणकारी ही होता है। तो सभी बुद्धिमान लोग गाय की कालिमा को न देखकर दूध के गुण को ले लेते हैं। यही संतों का परमहंस विवेक है।
श्रीरामचरितमानस को रचने के पीछे उन्होंने एक बहुत सुंदर उक्ति बतलाई। वे कहते हैं कि भगवान के अनंत गुण फैले होने के कारण लोग उसका उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। इसलिए मैं श्रीरामचरितमानस के धागे में पिरोकर इसकी वह सुंदर माला बनाऊंगा, ताकि इसको जो अपने कंठ में धारण करेगा, वह तो सुंदरता और दिव्यता को प्राप्त होगा ही अपितु जो उसके पास से गुजरेगा, उसे भी उसकी सुगंध का लाभ मिलेगा, जिससे जीवन में दोष रूपी दुर्गंध समाप्त हो जाएगी। यह भी गुण दर्शन की उक्ति का ही पूरक स्वरूप सिद्ध करती है।
केवट ने, शबरी ने, गीधराज ने, विभीषण ने बंदरों और जांबवान ने, अयोध्यावासियों ने रामचरितमानस की इस दिव्य माला को अनुराग के साथ पहन लिया। केवट बड़े अनुराग से भरकर भगवान के श्रीयुक्तचरणारविंदों को पखारकर जल को पी गया। जो श्रीरामचरितमानस को पी जाता है, वह केवट की तरह स्वयं श्रीरामचरितमानस की तरह कथा का अंग बनकर संपूज्य आदर्श बन जाता है।
अति आनंद उमगि अनुरागा। चरन सरोज पखारन लागा।।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने धर्म और समाज हित के लिए वही कार्य किया, जो आदिशंकराचार्य ने किया। रामकथा की इस गंगा को पृथ्वी पर लाकर भक्तों के कल्याण का कार्य भगीरथ जी ने भी वही किया। युग तुलसी के रूप में स्तुत्य रामकिंकर जी महाराज ने अपनी सुगम और अगम पद्धति के द्वारा उसको शोधछात्रों और भक्तों के लिए अतुल्य सामग्री दी।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्रीरामके चरित्र का ऐसा सेतु बनाया, जिस पर चलकर बड़े समर्थ लोगों के साथ अत्यंत छोटी चींटी, जिसमें कोई सामर्थ्य है ही नहीं, वह भी उस सेतु पर चढ़कर पार जा सकती है। यह सेतु जो है, वह लोक और वेद के बीच बना है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपने आपको भगवान श्रीशरण में पहुंचाने का परमश्रेय श्रीभरत जी को दिया। व
ह मात्र इसलिए दिया कि श्रीभरत जी अयोध्या से चित्रकूट के लिए गुरु वसिष्ठ और मंत्री पुरवासियों को लेकर जाएं तो यह समझ आता है, पर जब वे महारानी कैकेयी को भी साथ लेकर गए तो गोस्वामी जी ने कहा- हे तुलसीदास, अब तेरे तारण का मार्ग मिल गया। भरत जैसे संत, जो ऐसे गुण ग्राहक हैं कि कैकेयी मां को केवल इसलिए साथ ले गए कि यदि मैं नहीं ले गया तो हमारे प्रभु इतने करुणामय हैं कि वे चित्रकूट में स्वयं को लज्जित अनुभव करेंगे, क्योंकि वे उन्हें भरत की मां मानते हैं और उन्हें लगेगा कि केवल मेरे वन आने का दंड भरत ने दिया और मेरे भावों को नहीं देखा।
गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं कि
सिय राम प्रेम पियूष पूरन होत जनमु न भरत को।
मुनि मन अगम जम नियम सम दम बिषम ब्रत आचरत को॥
दुख दाह दारिद दंभ दूषन सुजस मिस अपहरत को।
कलिकाल तुलसी से सठन्हि हठि राम सनमुख करत को॥
अर्थात श्री सीतारामजी के प्रेमरूपी अमृत से परिपूर्ण भरतजी यदि न होते, तो मुनियों के मन को भी अगम यम, नियम, शम, दम आदि कठिन व्रतों का आचरण कौन करता? दुख, संताप, दरिद्रता, दंभ आदि दोषों को अपने सुयश के बहाने कौन हरण करता? तथा कलिकाल में तुलसीदास जैसे शठों को हठपूर्वक कौन श्रीराम के सम्मुख करता? वे कहते हैं कि मैं चित्रकूट पहुंच पाया तो उसमें केवल हमारे प्रभु रामजी के भैया भरत की कृपा से पहुंच पाया। यह है गोस्वामी तुलसीदास जी की दृष्टि, जिसमें गुन तुम्हार समझहिं निज दोसा के अनुसार वे भगवान के ऐसे भक्त हैं, जो संसार को पार उतारने वाला ग्रंथ श्रीरामचरितमानस देते हैं।
