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    एआई और तकनीक पर बढ़ती निर्भरता का याद रखने और सोचने की क्षमता पर पड़ रहा है असर

    Updated: Wed, 01 Jul 2026 04:28 PM (IST)

    स्मार्टफोन और एआई ने हमारे याद रखने और सोचने का तरीका जरूर आसान कर दिया है। लेकिन इससे हमारी अपनी वैचारिक क्षमता और याददाश्त कमजोर पड़ने लगी है। ...और पढ़ें

    एआई और टेक्नोलॉजी का सोचने और याददाश्त पर पड़ रहा है प्रभाव

    एआई और टेक्नोलॉजी का सोचने और याददाश्त पर पड़ रहा है प्रभाव

    HighLights

    1. एआई पर अत्यधिक निर्भरता से याददाश्त कमजोर हो सकती है।

    2. तकनीक का संतुलित उपयोग मानसिक स्वास्थ्य के लिए जरूरी है।

    3. आलोचनात्मक सोच और सक्रिय याददाश्त का अभ्यास करें।

    ब्रह्मानंद मिश्र, नई दिल्ली। दिमाग को सक्रिय रखने और अपनी समझ बढ़ाने के लिए इंसान याददाश्त बढ़ाने का अभ्यास करता रहा है। इसके लिए रटकर सीखने, दोहराने, तुकांत जैसी विधियां प्रचलन में आईं। फिर नोटबुक, गणना के लिए कैल्कुलेटर और नेविगेशन के लिए मानचित्रों का प्रयोग शुरू हुआ। तकनीकी विकास ने यात्रियों को नेविगेशन एप, गणना के लिए कैल्कुलेटर एप और भाषाई बाधाओं को दूर करने के लिए ट्रांसलेशन टूल्स तक उपलब्ध करा दिए। इससे कठिन और असंभव लगने वाले कार्य भी आसान हो गए। एआई ने तो इन सभी चुनौतियों के निपटारे के लिए हर यूजर के हाथ में अलादीन का चिराग ही थमा दिया है। एआई टूल्स सामान्य जानकारियां ही नहीं, पेशेवर जानकारियां भी उपलब्ध करा रहे हैं, जिसके लिए कभी डॉक्टर, इंजीनियर, वित्त सलाहकार जैसे पेशेवरों की तलाश करनी पड़ती थी। ये सूचनाओं का प्वाइंटर, विश्लेषण देने के लिए नए विचार और निर्णय लेने के लिए नए सुझाव भी दे सकते हैं। कुल मिलाकर, कहें तो आप सोचने, याद रखने, नया सीखने का जिम्मा आसानी से एआई टूल्स के भरोसे छोड़ सकते हैं।

    सोचने और याददाश्त पर प्रभाव

    कॉग्निशन (हमारे सोचने की योग्यता) के तहत हमारा मस्तिष्क तीन मूल कार्य करता है- जानकारी को एनकोड करना (ग्रहण करना ताकि दिमाग इसे समझ सके), जानकारी को स्टोर करना और आवश्यकता होने पर जानकारी को वापस उपलब्ध कराना। कॉग्निशन इस बात पर निर्भर करता है कि ये तीनों ही सही ढंग से काम करें। रिसर्च से पता चलता है कि जब हमारा ध्यान तनाव में होता है, तो हमारा दिमाग जानकारी को एनकोड करने पर अधिक ध्यान देता है और स्टोरेज व रिट्रीवल (जानकारी को स्टोर करने और वापस पाने) को नजरअंदाज कर देता है, क्योंकि ये अधिक मेहनत वाले काम हैं।

    हमारी सोचने-समझने की सारी प्रक्रियाएं सिर्फ दिमाग में ही नहीं होतीं, कभी-कभी इन पर हमारे आस-पास की चीजों का भी प्रभाव होता है, जैसे- अगर आप अपनी लिखी हुई यादों को दोबारा देखने के लिए डायरी का इस्तेमाल करते हैं, तो वह आपके दिमाग का ही एक विस्तार है। जब हम एआई के आउटपुट को स्वयं के स्तर पर जांचे-परखे बिना स्वीकार कर लेते हैं, तो वह एक तरह से कॉग्निटिव सरेंडर ही होता है। अगर यह आदत विकसित हो जाए, तो आगे चलकर यह मानसिक सेहत को मुसीबत में डाल सकती है।

    गैजेट्स के प्रयोग में संतुलन जरूरी

    हर चीज में एक संतुलन बनाकर चलना आवश्यक है। कॉग्निटिव ऑफलोडिंग के मामले में भी हमें ऐसा ही करने की जरूरत है। हमें एक साथ कई सारी बातों का ध्यान रखना होता है, बहुत कुछ याद रखना होता है, जिससे कभी-कभी लगता है कि हम चीजें भूल रहे हैं। आजकल मल्टी टास्किंग अधिक हो गई है। इससे एक ही समय में बहुत सारे काम करने होते हैं, इसलिए जरूरी है कि इसे कम किया जाए और एक समय में एक ही काम करें, तो वह ज्यादा बेहतर ढंग से कर पाएंगे। अगर लग रहा है कि आप चीजें भूल रहे हैं, तो इसका एक अच्छा तरीका यह भी है कि आप डायरी रख लें और जरूरी बातें लिखते रहें। इससे भूलने की समस्या कम होने लगेगी। हर चीज की एक सीमा होती है, आप एक ही बार में बहुत कुछ याद रखने का प्रयास करेंगे, तो वह संभव नहीं है। आप गैजेट्स को पूरी तरह नजरअंदाज तो नहीं कर सकते हैं, पर संतुलन जरूर बनाकर चल सकते हैं। कोशिश करें कि इसका प्रयोग कम करें और जरूरत की चीजों के लिए ही करें, तो ज्यादा बेहतर होगा।
    डॉ. राजेश सागर, प्रोफेसर, साइकियाट्री, एम्स, नई दिल्ली

    सहजता है पर सतर्कता जरूरी

    डिजिटल डॉक्यूमेंट, क्लाउड स्टोरेज और प्रोजेक्ट मैनेजमेंट प्लेटफॉर्म पेशेवर कार्यों के प्रबंधन, प्रोडक्टिविटी को बेहतर बनाने के साथ साथ अनावश्यक दोहराव से भी बचाते हैं। इससे अलग और रचनात्मक सोचने के लिए हमारी ऊर्जा बच जाती है। अगर एआई पावर्ड टूल्स का समझदारी के साथ प्रयोग हो, तो प्रोडक्टिविटी में कई गुणा तक वृद्धि हो सकती है, लेकिन इस पर पूरी तरह निर्भरता और आंख बंद कर भरोसा करना, उतना ही जोखिम भरा हो सकता है। एआई टूल्स बनाने वाले भी इसे 'थॉट पार्टनर' या 'कोलेबरेटर' ही कहते हैं, न कि इंसानी दिमाग का विकल्प। सीखने के लिए एआई का प्रयोग सही है, पर निर्भर हो जाना और सोचना बंद कर देना, पूरी तरह गलत है। कानून, फाइनेंस, गवर्नेंस और हेल्थकेयर जैसे अहम क्षेत्रों में काम करने वाले अपने फैसले के लिए अगर एआई पर निर्भर होने लगें, तो खामियाजा बहुत बड़ा हो सकता है। देश की शीर्षस्थ अदालतों में अब एआई के ऐसे दुरुपयोग के मामले भी पहुंचने लगे हैं।

    इंसानी दिमाग का विकल्प नहीं है तकनीक

    जानकारी हासिल करने और उसे याद रखने का काम बाहरी माध्यमों पर छोड़ देना, जैसे कि मन में आने वाले सवाल को चैटजीपीटी से पूछ लेने की आदत आलोचनात्मक सोच (क्रिटिकल थिंकिंग) की क्षमता पर असर डाल सकती है। इसके उलट जब नई जानकारी हमारे दिमाग से जुड़ती है, तो उसे हम अपने समझने लायक तरीके से बदलते हैं। हमारे पास जितनी अधिक जानकारी होती है, नई जानकारी को समझने और उसका आलोचनात्मक विश्लेषण करने की हमारी क्षमता उतनी ही बेहतर होती है। उदाहरण के तौर पर, संविधान की जानकारी हमें नागरिक अधिकारों और दायित्वों को समझने में मदद करती है।

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    समझें तकनीक पर निर्भरता का जोखिम

    • सबसे आम चिंता याददाश्त का कमजोर होना है। जब लोग फोन नंबर, जन्मदिन या रास्ते याद रखने के लिए डिवाइस पर निर्भर रहते हैं, तो वे अपनी याददाश्त का इस्तेमाल कम कर देते हैं।
    • इससे गहराई से सोचने की क्षमता (क्रिटिकल थिंकिंग) में कमी आने लगती है। ऑनलाइन जवाब तुरंत मिल जाने से सोच-विचार करने और खुद से समस्या सुलझाने की आदत कम हो सकती है।
    • इंटरनेट नहीं होने, बैटरी खत्म होने या तकनीकी खराबी की स्थिति में कुछ लोग अपना छोटा- मोटा काम भी नहीं कर पाते, जिन्हें वे पहले खुद कर लेते थे।
    • पर्सनल शेड्यूल, फाइनेंशियल रिकार्ड और संवेदनशील जानकारी डिजिटल प्लेटफार्म पर रखने से डाटा लीक और साइबर अटैक का खतरा बढ़ जाता है।
    • लोग अपनी याददाश्त या फैसले लेने की क्षमता पर शक करने लग सकते हैं, भले ही वे बिना किसी तकनीकी मदद के काम करने में पूरी तरह सक्षम हों।

    तकनीक के साथ व्यावहारिक संतुलन

    सक्रिय याददाश्त का अभ्यास : हर चीज को तुरंत रिकार्ड करने के बजाय, डिवाइस देखने से पहले शॉपिंग लिस्ट, फोन नंबर या जरूरी तारीखें याद करने की कोशिश करनी चाहिए। याददाश्त की छोटी-छोटी एक्सरसाइज याद रखने की क्षमता को मजबूत करती है।

    टेक्नोलॉजी का समझदारी भरा प्रयोग : डिजिटल टूल्स का इस्तेमाल सिर्फ बहुत मुश्किल या बार-बार किए जाने वाले कामों के लिए करना बेहतर है। इससे दिमाग एक्टिव रहता है।

    क्रिटिकल थिंकिंग की आदत : ऑनलाइन सर्च करते समय, जानकारी को बिना सोचे-समझे मानने के बजाय अनेक सोर्स की तुलना करनी चाहिए। इससे सही समझ बनती है।

    तय करें टेक्नोलॉजी-फ्री समय: हर दिन डिजिटल डिवाइस के बिना कुछ समय बिताने से एकाग्रता, चिंतन और स्वतंत्र सोच को बढ़ावा मिलता है।

    नई स्किल्स सीखना : पढ़ने, पहेलियां सुलझाने, भाषाएं सीखने और म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट बजाने से दिमागी लचीलापन बढ़ता है।

    ऑफलाइन एक्टिविटी : इमरजेंसी कांटैक्ट नंबर, जरूरी पते और बेसिक रास्ते खुद से याद रखने चाहिए, ताकि टेक्नोलॉजी नहीं होने पर भी आप काम कर सकें।

    समझें सीमाएं :तकनीक की सीमाओं को समझने से सही फैसला लेने की आदत बनती है।

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