हेल्थ में एआई चैटबॉट: फायदे, खतरे और इस्तेमाल में कौन-सी सावधानियां हैं जरूरी?
मेडिकल सवालों का जवाब देने से लेकर लक्षणों पर नजर रखने और वियरेबल डिवाइसेज के हेल्थ डेटा का विश्लेषण करने तक, अनेक कार्यों में अब एआई का प्रयोग हो रहा ...और पढ़ें


समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
ब्रह्मानंद मिश्र, नई दिल्ली। आप एआई चैटबॉट से सिरदर्द और तनाव के बारे में बात करें, तो संभव है कि शुरुआत में कई उपयोगी परामर्श मिल जाएं, बिल्कुल किसी प्रशिक्षित डॉक्टर की तरह। लेकिन यह चर्चा ऐसी दिशा में भी जा सकती है जहां ब्रेन कैंसर की एक नई टेंशन मिल सकती है। सलाह कब शामत बन जाएगी, यहां इसके महीन फर्क को समझना होगा, खासकर जब आप मेडिकल जैसे बेहद संवेदनशील विषय पर चर्चा कर रहे हैं। दरअसल, जेनरेटिव एआई आपकी अवचेतन इच्छाओं के साथ अलाइन होने के लिए ही तैयार किया गया है, यानी वह ऐसी जानकारियों को पेश करेगा, जो आपको बांधकर रखे, बिल्कुल इंटरनेट मीडिया की तरह, जहां एल्गोरिदम आपसे अंतहीन डूमस्क्रालिंग (लगातार स्क्रीन से जुड़े रहना) कराते हैं। इसमें कोई शक नहीं कि एआई चैटबॉट मौजूदा दौर का एक बेहद शक्तिशाली टूल है, पर वह पेशेवर चिकित्सक नहीं है। वह आपको बेशुमार जानकारियों दे सकता है, पर निर्णय नहीं कर सकता। अगला कदम क्या हो सकता है, यह बता तो सकता है, पर आपके हानि-लाभ से उसे बिल्कुल भी फर्क नहीं पड़ता। हालांकि, आज ऐसे हेल्थ फोकस्ड चैटबॉट भी हैं, जो उपयोगी साबित हो रहे हैं, पर उससे पहले हमें यह समझना होगा कि इनका बेहतर ढंग से प्रयोग कैसे करना है।
हेल्थकेयर में बड़ी उम्मीद है एआई
एआई के प्रयोग के चलते मेडिकल की दुनिया बदल रही है। बुजुर्गों की बढ़ती आबादी से लेकर उपचार की बढ़ती लागत तक का समाधान ढूंढने में यह तकनीक सहयोगी बन रही है। इससे मरीजों की प्रभावी देखभाल से लेकर मेडिकल शोध का तरीका बदल रहा है। बीमारियों का अनुमान लगाने, इलाज की कार्ययोजना तैयार करने, हॉस्पिटल मैनेजमेंट और हेल्थकेयर रिसर्च में इन टूल्स का प्रयोग होने लगा है। हाल में ही स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने देश के हेल्थकेयर सिस्टम में एआई को इंटीग्रेट करने के उद्देश्य से नेशनल फ्रेमवर्क 'स्ट्रेटजी फॉर एआई इन हेल्थकेयर (साही)' जारी किया है। इससे हेल्थकेयर सेक्टर में
एआई के सही और प्रभावी इस्तेमाल की एक व्यवस्था तैयार होगी। एआई हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स की जगह नहीं लेता है, बल्कि एक पावरफुल सप्लीमेंट्री टूल के तौर पर काम करता है। सबसे जरूरी बात यह है कि एआई पर्सनलाइज्ड केयर की ऐसी सुविधा दे रहा है जो पहले नामुमकिन थी। जेनेटिक जानकारी और लाइफस्टाइल फैक्टर्स जैसे डेटा को एनालाइज करके, यह हर व्यक्ति के हेल्थ रिस्क का अंदाजा लगा सकता है और बचाव के उपाय बता सकता है।
हेल्थ जानकारियों के लिए विशेष चैटबॉट
आम प्रयोग में आने वाले चैटबॉट से हेल्थ को लेकर सवाल पूछना अंधेरे घर में ढेला मारने जैसा है। ऐसे अनेक मामले सामने आ चुके हैं, जहां लोग एआई की सलाह लेकर हॉस्पिटल के बेड पर पहुंच चुके हैं। हालांकि, अच्छी बात है कि कंज्यूमर और हेल्थकेयर पेशेवरों के लिए अब कंपनियां विशेष रूप से ट्रेंड हेल्थ चैटबॉट पेश कर रही हैं। ओपनएआई का 'चैटपीजीटी हेल्थ' और एंथ्रोपिक का 'क्लाउडी फॉर हेल्थकेयर' ऐसे ही चैटबॉट हैं जो हेल्थ डेटा का विश्लेषण करने में कहीं बेहतर हैं। ऐसे चैटबॉट इंटरनेट मीडिया जैसे अविश्वसनीय स्रोत से डेटा नहीं उठाते। दूसरा, यूजर के प्राइवेट डेटा की बिक्री या एआई मॉडल की ट्रेनिंग के लिए इनका प्रयोग नहीं करते। ऐसे चैटबॉट की हेल्थकेयर में बहुत उपयोगिता है, पर इस्तेमाल में हर स्तर पर सतर्कता भी जरूरी है।
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कैसे और किस तरह हो सावधानी
एआई चैटबॉट के पास उपलब्ध जानकारियां मरीज और मेडिकल पेशेवर दोनों के लिए ही उपयोगी हैं। लेकिन चैटबॉट कब हैलुसिनेट करेंगे और कब नियमों-निर्देशों का उल्लंघन, यह किसी को पता नहीं है। ऐसे में चैटबॉट की प्रतिक्रिया में कितनी स्थिरता है और इसकी जानकारियों का स्रोत कितना विश्वसनीय है, इस पर हमेशा ध्यान रखना चाहिए। जब मन में यह सवाल आ जाए कि चैटबॉट की आमुक बात पर विश्वास करना है या नहीं, वहीं तुरंत रुक जाना चाहिए और मेडिकल पेशेवर की मदद लेनी चाहिए।
मेडिकल में एआई उपयोगी, पर सतर्कता भी जरूरी
एआई में हेल्थकेयर सिस्टम को काफी मजबूत करने की क्षमता है। इससे डॉक्टरों को तेजी से फैसले लेने में मदद मिलती है। एआई बड़ी मात्रा में मेडिकल लिटरेचर का एनालिसिस करने, क्लिनिकल डेटा में पैटर्न पहचानने और शुरुआती डायग्नोसिस में मदद कर सकता है। यह एडमिनिस्ट्रेटिव बोझ कम कर सकता है। एआई को क्लिनिकल फैसले के रिप्लेसमेंट के बजाय एक मददगार टूल के तौर पर देखा जाना चाहिए। हेल्थकेयर फैसलों में मरीज की स्थिति, नैतिक विचार और इंसानी हमदर्दी शामिल होती है, जिसे टेक्नोलॉजी कॉपी नहीं कर सकती। डेटा क्वालिटी, एल्गोरिदमिक बायस और ऑटोमेटेड आउटपुट पर बहुत ज्यादा निर्भरता के भी रिस्क हैं। जरूरी यह है कि ऐसे AI सिस्टम बनाए जाएं जो पारदर्शी हों, क्लिनिकली सत्यापित हों और मेडिकल वर्कफ्लो में सोच-समझकर इंटीग्रेट किए गए हों, ताकि यह पक्का हो सके कि टेक्नोलॉजी आखिर में मरीज की सुरक्षा और भरोसे को बढ़ाए, न कि उससे समझौता करे।
सौरव कसेरा, संस्थापक और सीईओ, क्लिरनेट
5 जरूरी टिप्स एआई के प्रयोग में
सवाल पूछने का तरीका सीखें : गूगल से मेडिकल सलाह लेने और एआई से जानकारी प्राप्त करने में फर्क है। बेहतर परिणाम के लिए सवाल तैयार करना और एआई की प्रतिक्रिया को जांचना आवश्यक है। साइकोफेंसी से बचने के लिए हमेशा ओपन एंडेड सवाल पूछने चाहिए।
अपनी निजता का रखें ध्यान : एआई चैटबॉट आपके बारे में कुछ नहीं जानता, जब तक कि आप उसे निजी जानकारियां नहीं कर दे देते। उम्र, मेडिकल हिस्ट्री, स्वास्थ्य समस्याओं के आधार पर यह व्यक्तिगत सुझाव दे सकता है। हालांकि, यहां प्राइवेसी की चिंताएं भी हैं। आपको यह पता नहीं है कि आपके संवाद पर किसी अनजान व्यक्ति की नजर भी हो सकती है। ऐसे में बेहतर होगा कि पूरा मेडिकल रिकार्ड, पता, आइडी जैसे संवेदनशील जानकारियों को साझा करने से बचना चाहिए। आप काग्निटो मोड का प्रयोग कर सकते हैं या फिर चैट के बाद कन्वर्सेशन को डिलीट कर सकते हैं।
गंभीर स्थिति में न लें एआई की मदद: सांस लेने में तकलीफ होने, सीने में दर्द या अन्य तरह की मेडिकल इमरजेंसी में एआई का प्रयोग करने से बचना चाहिए। इसके लिए तुरंत मेडिकल इमरजेंसी का रुख करना ही बेहतर है।
एक ही टूल पर पूरी तरह भरोसा ठीक नहीं : दूसरे डॉक्टर की ओपिनियन की तरह आप दूसरे चैटबॉट से भी प्रतिक्रिया ले सकते हैं। उदाहरण के तौर पर अगर चैटजीपीटी और जेमिनी की प्रतिक्रिया में काफी समानता दिखती है, तो कुछ हद तक आश्वस्त हुआ जा सकता है।
सवालों में छिपे सवालों पर रखें नजर : चैटजीपीटी के पास डॉक्टर की तरह सैकड़ों-हजारों मरीजों को देखने का अनुभव नहीं होता। ऐसे में कई जरूरी जानकारियों को वह बाइपास कर सकता है। एआई की प्रतिक्रिया पर सवाल पूछना चाहिए। हालांकि, एडवांस मॉडल मेडिकल के ऐसे संभावित सवालों के लिए पहले से ट्रेंड होते हैं।