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    एआई कंटेंट ने पूरी तरह से बदला इंटरनेट, पहचान का तरीका रखेगा आपको सेफ

    By Brahmanand MishraEdited By: Subhash Gariya
    Updated: Wed, 11 Feb 2026 12:14 PM (IST)

    एआई-जनरेटेड कंटेंट, जैसे वीडियो और तस्वीरें, सोशल मीडिया पर तेजी से फैल रही है, जिससे सच और झूठ में अंतर करना मुश्किल हो रहा है। यह सामग्री अक्सर भावन ...और पढ़ें

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    HighLights

    1. AI जनरेटेड कंटेंट सोशल मीडिया पर तेजी से फैल रही है।

    2. नकली वीडियो और छवियों से सच पहचानना मुश्किल हो रहा।

    3. उपयोगकर्ताओं को AI सामग्री पहचानने की आदत बनानी होगी।

    ब्रह्मानंद मिश्रा, नई दिल्ली। फॉरेस्ट गेस्ट हाउस में कुर्सी पर बैठे एक व्यक्ति पर बाघ के हमले का एक वीडियो कुछ महीनों पहले इंटरनेट मीडिया पर तेजी से प्रचलित (वायरल) हुआ था। वीडियो पर कमेंट और शेयर करने वालों की संख्या लाखों में थी। लोग संवेदनाएं प्रकट रहे थे, पर यह एआई से तैयार किया गया था। आप फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स, थ्रेड्स आदि इंटरनेट मीडिया पर स्क्रॉल करते जाइए, ऐसे तमाम रोचक, आकर्षक, संवेदनात्मक एआई जनरेटेड वीडियो और इमेज मिलते जाएंगे, जिन्हें पहली नजर में सच मान लेने वालों की संख्या कम नहीं है।

    एआई से तैयार गरीब बच्चों के वीडियो पर हजारों लोग प्रतिक्रिया दे रहे हैं, तो कहीं किसी नेता के बयान पर गुस्सा निकाल रहे हैं, बिना यह जाने कि इस वीडियो का सच्चाई से कोई वास्ता नहीं है। अगर कुछ लोग यह जानने का प्रयास भी करें कि वीडियो असली है या नकली या फिर इसे किसने और क्यों बनाया, तब तक ऐसे क्लिप कई मिलियन व्यूज बटोर चुके होते हैं। किसी कंटेंट के सिंथेटिक साबित होने से पहले उसके बेशुमार मीम्स बन चुके होते हैं। कमेंट व शेयर के चलते ऐसे वीडियो लाखों यूजर्स के सामने गुजर चुके होते हैं।

    जैसे-जैसे जेनरेटिव एआई तेज, सस्ता और इस्तेमाल करने में सहज होता जाएगा; एआई से बने पोस्ट, वीडियो, इमेज, गाने इंटरनेट मीडिया को भरते जाएंगे। कारण यह भी है कि ऐसे कंटेंट न केवल लोगों को आकर्षित कर रहे हैं, बल्कि आभासी दुनिया की सच्चाई पर पर्देदारी और डिजिटल स्पेस में विमर्श को भी तय कर रहे हैं। खासकर, सेना, धर्मिकता, गरीबी जैसे संवेदनशील जैसे विषयों पर बनाए गए बेहतर क्वालिटी के वीडियो तेजी से प्रचलित हो जाते हैं।

    बदल रहा है इंटरनेट मीडिया का स्वरूप

    बीते कुछ वर्षों में इंटरनेट मीडिया के प्रयोग का तरीका काफी बदल गया है। एआइ कंपनी कैपविंग की रिसर्च के अनुसार, यूट्यूब पर ओपन होने वाले लगभग हर नए अकाउंट्स को दिखाए जाने वाले 20 प्रतिशत कंटेंट 'लो क्वालिटी एआई वीडियो' होते हैं। शॉर्ट वीडियो नए यूजर्स को आकर्षित करने के सबसे बड़े हॉटस्पॉट हैं, जहां एआई जनरेटेड कंटेंट की बाढ़ आ रही है।

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    एआई ने कैसे बदला इंटरनेट मीडिया

    दो दशक पहले जब इंटरनेट मीडिया की शुरुआत हुई थी, तो लोग दोस्त, स्वजन या ऐसे लोगों के कंटेंट देख सकते थे, जिन्हें वे फालो करते थे। इसके बाद क्रिएटर कंटेंट का दौर आया, जहां अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े लोग अपने कंटेंट के जरिये फॉलोअर्स का आधार बढ़ाने लगे। अब एआई के दौर में कंटेंट बनाने और रिमिक्स करने की सुविधा अभूतपूर्व रूप से बदल गई है। मेटा के सीईओ मार्क जुकरबर्ग ने इसे इंटरनेट मीडिया का तीसरा चरण कहा है, जहां इंटरनेट मीडिया का स्वरूप एआई से बदल रहा है। फेसबुक, इंस्टाग्राम, थ्रेड्स जैसे प्लेटफार्म एआई जेनरेटड पोस्ट शेयर करने के साथ-साथ इमेज और वीडियो बनाने के लिए एआई टूल्स की सुविधा भी दे रहे हैं। ये कंटेंट इमर्सिव और इंटरेक्टिव तो बन रहे हैं, लेकिन आकर्षण में सच्चाई बहुत आसानी से छिपती जा रही है।

    नई तरह की अटेंशन इकोनामी

    वायरल कंटेंट में नयापन और भावनाओं का बेशकीमती गठजोड़ होता है। एआई इन दोनों को सुपरचार्ज करता है। एआई टूल्स एक प्राम्प्ट से एक साथ कई सारे जोक्स, कुछ मिनटों की क्लिप को जेनरेट कर सकते हैं। यह एफिशिएंसी क्राफ्ट के बजाय स्केल को बढ़ावा देती है और उस ट्रेंड को तेज करती है, जिसे पनपने के लिए पहले हफ्तों का समय लगता था।

    सिंथेटिक दुनिया में विश्वास

    कुछ वर्षों पहले तक डीपफेक बहुत दुर्लभ घटना होती थी, अब यह बहुत आम बात होती जा रही है। यहां तक कि वायरल कंटेंट के गलत साबित होने के बावजूद इंटरनेट मीडिया के कई सारे यूजर्स इस बात को समझ ही नहीं पाते। क्योंकि, एआई जिस तरह ट्रिगर करता है, उसका प्रभाव लंबे समय तक रहता है। यह सही है कि इंटरनेट मीडिया प्लेटफॉर्म से लेकर नीति निर्माता तक लेबल, वाटरमार्किंग और डिटेक्शन टूल्स जैसे उपायों की वकालत तो कर रहे हैं, पर सत्यापन की गति कंटेंट जेनरेशन की गति से पिछड़ती जा रही है। कुल मिलाकर कहें तो सत्यता जांचने की अधिक जिम्मेदारी अब यूजर्स पर ही अधिक है। उन्हें हर क्लिप को संदेह के नजरिए से देखने के लिए तैयार होना होगा।

    सच्चाई स्वीकार करने की जरूरत

    तमाम खतरों के बावजूद एआई जनरेटेड वायरल कंटेंट अब खत्म नहीं होंगे। सवाल यह है कि समाज इसे अपनाता कैसे है। रेड फ्लैग और सोर्स के वेरिफिकेशन जैसे मीडिया साक्षरता को बढ़ावा देना होगा। हालांकि, इसका कोई एक मात्र पुख्ता उपाय नहीं है। फीड्स बढ़ते रहेंगे, हर स्वाइप पर कुछ आकर्षक, मनोरंजक या चिंताजनक दिखेगा। इंटरनेट की दुनिया मशीनी दिमाग के साथ बदल रही है। इंसानों के सामने चुनौती है कि इसके साथ चलना कैसे है, किस पर विश्वास करना है और किसे दरकिनार कर देना है।

    एआई कंटेंट को पहचानने की बनाएं आदत

    लो-क्वालिटी ऑटोजनरेटेड कंटेंट के जरिये 'एआई स्लोप' इंटरनेट मीडिया को भरता जा रहा है, जिससे सच और उपयोगी चीजें वायरलिटी में छिपती जा रही हैं। इसके बढ़ते चलन से इंसानी और मशीन द्वारा तैयार सामग्री के बीच भेद को समझने में यूजर्स की मुश्किलें बढ़ रही हैं। खासकर जिन यूजर्स की एआई की समझ सीमित है उनके भ्रमित होने की आशंका अधिक रहती है। इसका असर उनके निर्णय लेने की क्षमता पर भी होता है। इसे देखते हुए यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि इंटरनेट मीडिया को सार्थक और बेहतर संवाद के लिए उपयोगी बनाए रखने के लिए प्रयास बढ़ाए जाएं।

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    जसप्रीत बिंद्रा, सह-संस्थापक, सीईओ, एआइ एंड बियान्ड

    पहचानने और बचने का तरीका

    1. कंटेंट से पहले सोर्स पर जाएं: कई बार आकर्षक एआई कंटेंट अनजान या हाल में बनाए गए अकाउंट से आते हैं। ऐसे में वायरल कंटेंट वाले अकाउंट की हिस्ट्री जांचें। क्या यह कोई नया ब्रांड है। क्या उसके पास विश्वसनीय सामग्री है या यह वायरल होने के उद्देश्य से बनाई गई है। क्या अन्य विश्सवनीय सोर्स से भी ऐसी जानकारी साझा की गई है, इससे काफी स्पष्टता हो जाएगी।

    2. साझा करने से बचें: वायरल कंटेंट पर सदमा, गुस्सा, हंसी जैसे हुक होते हैं। अगर ऐसा लगता है तो कुछ सेकंड रुककर ही लाइक, रिपोस्ट या कमेंट करना चाहिए। इमोशनल इमरजेंसी में कई सारे रेड फ्लैग होते हैं।

    3. वीडियो और ऑडियो पर गौर करें: अगर चेहरे के हावभाव, ब्लिंकिंग और आवाज में असंतुलन दिखता है तो यह फेक हो सकता है। हालांकि, मामूली गलती फेक होने का प्रमाण नहीं है लेकिन कई सारे सिग्नल मिल रहे हैं, तो निश्चित ही वह फेक है।

    4. प्रासंगिकता से तालमेल: वायरल एआई कंटेंट में प्रासंगिकता का अभाव दिखता है और किसी घटना का पर्याप्त विवरण नहीं होता। इसका पूरा वीडियो देखना चाहिए। वास्तविक इंटरव्यू या पूरा आर्टिकल देखने से स्पष्टता आती है। छोटे क्लिप के साथ आसानी से छेड़छाड़ की जा सकती है।

    5. विश्वसनीय स्रोत से मिलान: हर बात को जांचना जरूरी नहीं है, पर दावा बहुत बड़ा है तो उसे जरूर सत्यापित करना चाहिए। खासकर, राजनीति, पब्लिक सेलिब्रिटी, स्वास्थ्य जांच, इमरजेंसी आदि से जुड़ी बातों पर गौर करना चाहिए। इसके लिए न्यूज संस्थान या फैक्ट चेकिंग साइट की मदद ले सकते हैं।

    6.बच्चों को सिखाएं : मीडिया साक्षरता हासिल करने से पहले ही बच्चे या टीनएजर एआई जनरेटेड कंटेंट का सामना करते हैं। बच्चों को एआई फेक और वायरल कंटेंट के बारे में जागरूक करना चाहिए।

    7. वायरल सच होने की गारंटी नहीं : मिलियन व्यूज का मतलब है कि लाखों लोगों ने इसे देखा है, पर यह सही, तार्किक, प्रासंगिक है, व्यूअरशिप इसकी गारंटी कतई नहीं है। एल्गोरिदम इस बात की परवाह नहीं करता है कि आप क्यों जुड़ते हैं, बल्कि इस बात को दर्ज करता है कि इससे लोग इंगेज हो रहे हैं। फेक और वायरल कंटेंट पर कमेंट करने और साझा करने से बचना चाहिए।

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    सोशल मीडिया पर AI-जनरेटेड कंटेंट के बढ़ते चलन से क्या वास्तविक दुनिया की समझ प्रभावित हो रही है?