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नरिंदर सिंह कपानी: भारतीय मूल के वैज्ञानिक जिन्होंने फाइबर ऑप्टिक्स की खोज से बदल दी संचार की दुनिया

Published: Sat, 31 Oct 2026 01:20 PM (GMT+05:30)

आज दुनिया भर में हाई-स्पीड इंटरनेट और मॉडर्न टेलीकम्युनिकेशन जिस तकनीक पर टिका है, उसकी नींव रखने वाले महान वैज्ञानिक नरिंदर सिंह कपानी थे।

जानिए नरिंदर सिंह कपानी की अनसुनी दास्तान। Phot0- ChatGPT.

जानिए नरिंदर सिंह कपानी की अनसुनी दास्तान। Phot0- ChatGPT. 

टेक्नोलॉजी डेस्क, नई दिल्ली। नरिंदर सिंह कपानी भारतीय मूल के एक जाने-माने वैज्ञानिक थे। उन्होंने बेहद पतले कांच के रेशों (ग्लास फाइबर्स) के जरिए लाइट को ट्रांसमिट करने की तकनीक विकसित करने में अहम भूमिका निभाई, जिसने आगे चलकर मॉडर्न कम्युनिकेशन और इंटरनेट की राह को बेहद आसान बना दिया।

नरिंदर सिंह कपानी

  • जन्म: 31 अक्टूबर 1926
  • निधन: 4 दिसंबर 2020

शुरुआती जीवन और शिक्षा

नरिंदर सिंह कपानी का जन्म पंजाब के मोगा में हुआ था। उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई देहरादून से की। इसके बाद उन्होंने आगरा यूनिवर्सिटी से साइंस में बैचलर डिग्री हासिल की। आगे की पढ़ाई के लिए वे इंपीरियल कॉलेज लंदन चले गए, जहां उन्होंने ऑप्टिक्स में गहन रिसर्च की और साल 1955 में अपनी पीएचडी पूरी की।

अहम योगदान

कपानी ने बारीक कांच के रेशों के जरिए इमेजेस भेजने पर महत्वपूर्ण रिसर्च की। उन्होंने फाइबर ऑप्टिक्स पर दुनिया की पहली किताब लिखी और अपने आविष्कारों के लिए 120 से ज्यादा पेटेंट्स अपने नाम किए। इसके अलावा उन्होंने सिख कला और संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए 'सिख फाउंडेशन' की स्थापना भी की।

बचपन के एक सवाल से शुरू हुई खोज की कहानी

देहरादून में स्कूली पढ़ाई के दौरान उनके दिमाग में एक जिज्ञासा पैदा हुई- क्या लाइट हमेशा सीधी रेखा में ही चलती है या फिर इसे मोड़ा भी जा सकता है? अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद जब वे इंपीरियल कॉलेज लंदन पहुंचे, तो उन्होंने लाइट पर ही अपनी रिसर्च शुरू कर दी। साल 1952 में उन्होंने पतले ग्लास फाइबर्स की मदद से लाइट को मोड़कर भेजने का सफल प्रयोग कर दिखाया। इस खोज ने उनके पूरे वैज्ञानिक सफर को एक नया मोड़ दे दिया।

कांच के रेशों से इमेज भेजने में मिली बड़ी कामयाबी

लाइट को मोड़ने का प्रयोग सफल होने के बाद कपानी के मन में एक और विचार आया: क्या इन रेशों के जरिए इमेजेस को भी एक जगह से दूसरी जगह भेजा जा सकता है? इस काम में उन्हें वैज्ञानिक Harold Hopkins का साथ मिला। दोनों ने मिलकर बेहद पतले कांच के रेशों के एक समूह पर कई प्रयोग किए। आखिरकार, साल 1953 में इन फाइबर्स की मदद से वे तस्वीरों को एक जगह से दूसरी जगह भेजने में कामयाब रहे।

रिसर्च को बिजनेस से जोड़ने की पहल

कपानी अपनी इस खोज को सिर्फ लैब तक सीमित नहीं रखना चाहते थे, बल्कि इसे एक प्रैक्टिकल रूप देना चाहते थे। इसी सोच के साथ उन्होंने साल 1961 में कैलिफोर्निया के पालो ऑल्टो में 'ऑप्टिक्स टेक्नोलॉजी' नाम से एक कंपनी शुरू की, जो फाइबर ऑप्टिक्स से जुड़े प्रोडक्ट्स बनाती थी। साल 1967 में ये कंपनी पब्लिक हो गई। इसके बाद 1973 में उन्होंने 'कैप्ट्रॉन' नाम से अपनी दूसरी कंपनी भी स्थापित की। इस तरह उन्होंने अपनी वैज्ञानिक रिसर्च को सीधे इंडस्ट्री और बिजनेस के साथ जोड़ दिया।

फाइबर ऑप्टिक्स को दिया नाम और पहचान

कपानी ये भली-भांति समझ चुके थे कि कांच के बारीक तारों से रोशनी भेजने की ये तकनीक भविष्य में बहुत बड़ी भूमिका निभाएगी। नवंबर 1960 में उन्होंने प्रतिष्ठित मैगजीन 'साइंटिफिक अमेरिकन' में एक आर्टिकल पब्लिश किया, जिसमें पहली बार आधिकारिक तौर पर 'Fiber Optics' शब्द का इस्तेमाल किया गया। इस आर्टिकल और बाद में लिखी गई अपनी किताब के जरिए उन्होंने इस तकनीक को पूरी दुनिया के वैज्ञानिक पटल पर एक अलग और मजबूत पहचान दिलाई।

सिख कला और संस्कृति का संरक्षण

साइंस के क्षेत्र में इतनी बड़ी पहचान बनाने के बावजूद कपानी अपनी जड़ों और सिख संस्कृति से हमेशा जुड़े रहे। साल 1967 में उन्होंने अपनी पत्नी सतिंदर कौर के साथ मिलकर सिख इतिहास, कला और संस्कृति के प्रचार-प्रसार के लिए 'सिख फाउंडेशन' की नींव रखी। उनके पास सिख आर्ट का एक बड़ा संग्रह था। अपनी मां की याद में उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, सैंटा बारबरा में सिख स्टडीज के लिए एक खास पीठ स्थापित करवाई।

उनके जीवन से जुड़ी प्रमुख उपलब्धियां:

  • 1955: यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन से ऑप्टिक्स में पीएचडी की डिग्री हासिल की।
  • 1999: नवंबर महीने में मशहूर Fortune मैगजीन ने उन्हें 20वीं सदी के सात 'अनसंग हीरोज' की लिस्ट में शामिल किया।
  • 2008: यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया ने उनकी असाधारण उपलब्धियों और सेवाओं के लिए उन्हें अपने प्रतिष्ठित 'फिएट लक्स अवॉर्ड' से सम्मानित किया।

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