इंटरनेट और सोशल मीडिया की लत बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए खतरा, कैसे रखें सुरक्षित?
स्क्रीन के साथ लगाव बच्चों के मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक विकास में किस हद तक अवरोध बनने लगा है, इसे लेकर तमाम सर्वे चिंताजनक तस्वीरें पेश कर रहे हैं ...और पढ़ें


समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
ब्रह्मानंद मिश्र, नई दिल्ली। इंटरनेट मीडिया के ब्यूटी फिल्टर, ऑटो प्ले और हर वक्त लाइक्स गिनने की बेसब्री एक पूरी पीढ़ी को मानसिक तौर पर कमजोर बना चुकी है। बीते दिनों एक ऐसा ही मामला अमेरिका के कैलीफोर्निया कोर्ट में पहुंचा, जहां अदालत ने मेटा और यूट्यूब पर ऐसे एडिक्टिव फीचर्स के बढ़ते दुरुपयोग के चलते साठ लाख डॉलर का हर्जाना लगाया है। इंटरनेट मीडिया की लत बच्चों और किशोरों के लिए कैसे मानसिक महामारी बन रही है, इसे लेकर पूरी दुनिया में कवायद हो रही है।
इंटरनेट मीडिया पर किशोरों की मौजूदगी को सीमित करने के लिए ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के कई देशों में कानूनी प्रविधान लागू किए जा रहे हैं। हाल ही में दूरसंचार और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय से जुड़ी संसदीय स्थायी समिति ने कम उम्र के बच्चों के इंटरनेट मीडिया उपयोग पर कड़ा रुख अपनाने की सिफारिश की है। स्टैंडिंग कमेटी के मुताबिक, इससे बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य, गोपनीयता और व्यवहार पर नकारात्मक असर पड़ रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत को भी अंतरराष्ट्रीय अनुभवों से सीख लेनी चाहिए। कर्नाटक, आंध्र प्रदेश जैसे कुछ राज्यों में ऐसी पहल भी होने लगी है।
कैसे गिरफ्त में लेता है एल्गोरिदम
याद कीजिए, साल 2006 में फेसबुक ने पहली बार न्यूजफीड की शुरुआत की थी, ताकि लोग दोस्तों की पोस्ट को एक ही जगह पर देख पाएं। लेकिन इन बीते 20 वर्षों में एल्गोरिदमिक फीड का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। यहां तक कि आज यूजर का अपने फीड्स पर नियंत्रण लगभग न के बराबर है। इंटरनेट मीडिया कंपनियां यूजर्स को एंगेज रखने के लिए ऐसे कंटेंट को फीड में उड़ेल रही हैं, जो शॉकिंग और अश्लील हैं।
यह अघोषित नियम है कि जो कंटेंट लोगों को आकर्षित करेगा, उसे ही कंपनियां तवज्जो देंगी। मुनाफा कमाने की होड़ में इंटरनेट मीडिया कंपनियां यह नहीं चाहेंगी कि आप फोन रखकर टहलने जाएं या स्वजन के साथ बैठ कर बगीचे में बातचीत करें। इसकी लत इस हद तक है कि जब भी निराशा का जरा सा भी खयाल आए, तो आप फेसबुक, यूट्यूब, एक्स, इंस्टाग्राम पर जाकर स्क्रॉलिंग शुरू कर दें।
खबरें और भी
बच्चों के लिए अधिक गंभीर है यह मामला
बिना नियंत्रण और संतुलन के इंटरनेट मीडिया नई पीढ़ी को किस हद तक प्रभावित कर रहा है, इसे बीते दिनों गाजियाबाद में हुई एक घटना से समझ सकते हैं, जहां स्कूल ड्रॉपआउट तीन नाबालिग बहनों ने कोरियन गेम्स के एडिक्शन के चलते सुसाइड कर लिया था। कारण बस इतना था कि पिता ने बच्चों को ऐसा करने से रोका था और उनके यूट्यूब चैनल को डिलीट कर दिया था। तकनीकों का तीर्थ अमेरिका तक आज अपने बच्चों को इससे बचाने का हरसंभव प्रयास कर रहा है।
कुछ दिनों पहले ब्रिटिश टेक्नोलाजी सेक्रेटरी ने विषाक्त आनलाइन कंटेंट से बच्चों को सुरक्षित नहीं रख पाने के लिए माफी तक मांगी है। हमें भी यह समझना होगा कि बच्चे पर आप भरोसा कर सकते हैं, लेकिन इंटरनेट मीडिया में क्या हो रहा है और क्या हो सकता है, इस पर आपका कोई अख्तियार नहीं है। फिर भी, कानूनी प्रविधान से लेकर डिजिटल साक्षरता और पैरेंटिंग कंट्रोल सिस्टम से लेकर प्राइवेसी के प्रति जागरूकता तक अनेक उपाय कर सकते हैं।
भारत के सामने है बड़ी चुनौती
बच्चों को स्क्रीन और स्क्रॉलिंग के ट्रैप से बचाने के लिए कहीं न कहीं फुल स्टॉप तो लगाना ही होगा। भारत में 25 करोड़ से अधिक बच्चों की उम्र 10 से 19 वर्ष के बीच है। इनके पास स्मार्टफोन और इंटरनेट है, पर सही और संतुलित प्रयोग कैसे होगा, शायद इसकी समझ नहीं है। नीति आयोग की एक रिपोर्ट बताती है कि पांच वर्ष तक के बच्चे भी डेढ़ घंटे और 6-10 वर्ष तक के बच्चे दो से ढाई घंटे का ऑनलाइन समय बिताते हैं। 16 वर्ष की उम्र तक बड़ी संख्या में बच्चों को इंटरनेट मीडिया के साथ-साथ ऑनलाइन चैटिंग और गेमिंग जैसी लत लग चुकी होती है। ये आंकड़े डिजिटल महामारी की चेतावनी देते हैं, जिसके लिए अभी से बहुआयामी स्तर पर प्रयास करना होगा।
क्यों जरूरी है रोक
रील्स और शार्ट्स पर एडल्ट कंटेंट और फिल्मों से जुड़े विज्ञापनों की भरमार होती है। चूंकि, किशोर उम्र के बच्चों का मस्तिष्क पूरी तरह विकसित नहीं होता, इसलिए जरूरी है इस तरह के कंटेंट के प्रति एक्सपोज होने से बच्चों को बचाया जाए। इंटरनेट मीडिया पर सही दिखने, बेहतर रीच पाने और बुलिंग जैसे दबाव को संभालने के लिए वे पूरी तरह तैयार नहीं होते। उम्र का यह पड़ाव भावनात्मक रूप से अधिक संवेदनशील है। ऑनलाइन कंटेंट, तुलना या ट्रोलिंग का उन पर गहरा असर पड़ सकता है। ऐसे में गुस्सा, चिड़चिड़ापन और व्यवहार संबंधी समस्याएं विकसित हो रही हैं या उन्होंने खुद को परिवार से अलग कर बातचीत कम कर दी है, तो इसका एक कारण इंटरनेट मीडिया भी हो सकता है।
एआई का है नया जोखिम
छोटे बच्चों को अक्षर और जानवरों के बारे में सिखाने वाले वीडियो में अक्सर बेतुके और एआई जेनरेटेड कंटेंट की भरमार होती है। यह इतना अधिक काल्पनिक और ध्यान खींचने वाला होता है कि बच्चे घंटों स्क्रीन घूरते रहते हैं। यहां तक कि बच्चों को नियंत्रित डिजिटल माहौल देने के लिए तैयार किया गया 'यूट्यूब किड्स' भी एआई वीडियो के प्रभाव से नहीं बचा है। पांच वर्ष की उम्र में बच्चे को एकाग्र रखने वाला तंत्र विकसित हो रहा होता है, ऐसे में फीड्स में पलक झपकने से पहले आते बेशुमार वीडियो किस तरह उनके दिमाग पर असर डालते होंगे, इसकी कल्पना आसानी से की जा सकती है।

पहले कारणों को समझना होगा
बच्चों को कड़े नियमों के दायरे में बांधने से पहले उनसे यह पूछना चाहिए कि उन्हें ऑनलाइन क्या पसंद है। वे किस तरह के इन्फ्लुएंसर्स को फालो कर रहे हैं। उनसे पसंदीदा एप्स के बारे में पूछा जा सकता है। इससे बच्चे के आनलाइन अनुभव के बारे में पता चल जाएगा। उदाहरण के तौर पर शुरुआत में बच्चे से पूछ सकते हैं कि ऐसी चीजें जो उन्होंने देखी है, वे मजेदार, मनोरंजक, डरावनी, बढ़िया या परेशान करने वाली या कैसे लगी।
इसी आधार पर फीड्स को रीसेट करने, सिर्फ दोस्तों का कंटेंट देखने या प्लेटफार्म से कुछ समय के लिए ब्रेक लेने जैसे उपायों के लिए उन्हें प्रेरित किया जा सकता है। इसी तरह, अगर वे एक बार में घंटों तक स्क्रॉल करते रहते हैं तो 20 मिनट का टाइमर सेट कर फोन नीचे रखने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। अगर वे बोरियत दूर करने के लिए इंटरनेट मीडिया का सहारा लेते हैं तो हफ्ते में कम से कम एक दिन कोई ऐसी एक्टिविटी करें, जिसमें पूरा परिवार शामिल हो। इंटरनेट मीडिया से चंगुल से छुड़ाना है, तो माता-पिता को ही इसका विकल्प बनना होगा।
बच्चों के लिए बढ़ानी होगी सजगता
इंटरनेट मीडिया बच्चों को लगातार तुलना करने, वैलिडेशन और बिना फिल्टर कंटेंट के संपर्क में लाता है। भावनात्मक परिपक्वता नहीं होने से इसका नकारात्मक असर होता है। दूसरों के जैसा बनने का दबाव, लाइक्स और कमेंट्स की चाह, परफेक्ट जिंदगी की कल्पना उनके मन में एक गलत समझ पैदा कर देती है। ऐसे में बच्चों को डिजिटल दुनिया में सुरक्षित तरीके से आगे बढ़ने के लिए एक मजबूत सपोर्ट सिस्टम होना जरूरी है। इसके लिए सजग पैरेंटिंग, उम्र के अनुसार नियम और प्लेटफॉर्म की अधिक जिम्मेदारी जैसे उपायों की जरूरत है। बच्चों को माता-पिता और शिक्षकों को खुलकर बातचीत करनी चाहिए, उन्हें डिजिटल साक्षरता के बारे में बताना चाहिए।
लक्ष्मण देवराजन, संस्थापक और सीईओ, मैड मंकी एआई
बच्चों के लिए इन बातों का रखें ध्यान
- स्क्रीन टाइम को सीमित करने से शुरुआत करें और बच्चों को उन गतिविधियों में शामिल करें, जहां तकनीक की बिल्कुल भी आवश्यकता नहीं होती।
- बच्चा कौन सा एप डाउनलोड और प्रयोग कर रहा है, इसका ध्यान रखना जरूरी है।
- बच्चों को इंटरनेट मीडिया के दुष्प्रभावों के बारे में समझना चाहिए और उन्हें किसी भी समस्या होने पर तुरंत इसकी जानकारी देने के लिए प्रेरित करना चाहिए।
- पढ़ाई करते समय, भोजन करते समय, खेलते समय बच्चों को स्क्रीन से दूर रखने का प्रयास करना चाहिए।
- सबसे जरूरी है, अगर आप स्वयं भी स्क्रीन से दूरी रखने या इसे कम प्रयोग करेंगे, तो बच्चा भी आपसे प्रेरित होगा।
- ऑनलाइन प्राइवेसी के बारे में जरूर बताएं जैसे, फोटो की सहमति देने और फोटो साझा करने में कैसे सतर्कता होनी चाहिए।
यह भी पढ़ें- Instagram Reels और YouTube Shorts के एल्गोरिद्म में ऐसा क्या है, जो सबको लग जाती है लत