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400 साल पुरानी राखी की कहानी, मुगल दरबार में बादशाह की कलाई पर सजता था रिश्तों का धागा

By Digital Desk Edited By: Prateek Gupta
Published: Sat, 22 Aug 2026 11:42 AM (IST)

जहांगीर की आत्मकथा 'तुज़ुक-ए-जहांगीरी' से पता चलता है कि मुगल दरबार में रक्षाबंधन एक महत्वपूर्ण परंपरा थी, जहाँ ब्राह्मण बादशाह ...और पढ़ें

AI जेनरेटेड फोटो मुगल दरबार में राखी का त्योहार।

AI जेनरेटेड फोटो मुगल दरबार में राखी का त्योहार।

HighLights

  1. जहांगीर की आत्मकथा 'तुज़ुक-ए-जहांगीरी' में राखी का जिक्र।

  2. मुगल दरबार में ब्राह्मण बादशाह की कलाई पर बांधते थे रक्षासूत्र।

योगेश जादौन, आगरा। किले की ऊंची दीवारों के भीतर सावन का एक दिन। दरबार लगा है। बादशाह अपने आसन पर बैठा है। सामने अमीर-उमरा हैं, दरबारी हैं, शाही कर्मचारी हैं। शाही ठाठ, अनुशासन और सत्ता की गंभीरता। आज दरबार में एक अलग रस्म होने वाली है। एक ब्राह्मण आगे बढ़ता है। उसके हाथ में कोई फरमान नहीं, एक धागा है। वह धागा साधारण नहीं है।

उसमें मोती हैं, फूल हैं और बहुमूल्य रत्न जड़े हैं। कुछ क्षण बाद वह धागा बादशाह की कलाई पर बांधा जाता है। जहांगीर ने अपनी आत्मकथा में दर्ज करते हुए इस दिन को अमुर्दाद महीने की नौ तारीख (यानी 20 जुलाई) लिखा है।

करीब चार सौ साल पहले मुगल दरबार में रक्षाबंधन सिर्फ एक त्योहार नहीं था। वह एक मजबूत परंपरा थी। मुगल सत्ता के सबसे बड़े केंद्रों में से एक रहे आगरा से जुड़ी रक्षाबंधन की यह कहानी किसी लोककथा से नहीं, एक बादशाह की अपनी लिखी किताब से निकलती है

उस बादशाह का नाम है—जहांगीर और किताब—तुज़ुक-ए-जहांगीरी, यानी जहांगीर की आत्मकथा। इससे पता चलता है कि राखी की डोर कभी आगरा के शाही दरबार तक भी पहुंची थी।

बादशाह की कलाई और राखी का धागा

आज राखी का मतलब हमारे लिए बहुत सीधा है। बहन भाई की कलाई पर राखी बांधती है। भाई उसकी रक्षा का वचन देता है। मगर, सदियों पहले रक्षाबंधन का एक दूसरा रूप भी बहुत प्रचलित था। ब्राह्मण अपने यजमान की कलाई पर रक्षासूत्र बांधते थे। यह शुभता, मंगल और रक्षा की कामना का प्रतीक था। यही रक्षासूत्र मुगल दरबार तक पहुंचा

जहांगीर ने लिखा है कि उसके पिता अकबर के समय हिंदू अमीर और दूसरे लोग बादशाह की कलाई पर रत्नों, मोतियों और फूलों से सजाए गए धागे बांधा करते थे। यानी राखी किसी घर के आंगन से निकलकर सीधे शाही दरबार में पहुंच चुकी थी।

अकबर ने शुरू किया था?

क्या अकबर ने ही राखी को शाही दरबार में शुरू कराया था? कई लोकप्रिय लेखों में इस बारे में दावे मिलते हैं। कहीं यह भी कहा जाता है कि अकबर ने राखी को राजकीय त्योहार बना दिया था। मगर, इतिहास को थोड़ा संभलकर देखना जरूरी है। हमारे पास अकबर के संबंध में ऐसा कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं है कि उसने रक्षाबंधन को राजकीय त्योहार घोषित किया था

जहांगीर ने स्वयं लिखा है कि उसके पिता अकबर के समय हिंदू अमीर और अन्य लोग बादशाह को रक्षासूत्र बांधते थे। यानी अकबर के दरबार में यह परंपरा थी। मगर, इसे बाकायदा 'राजकीय त्योहार' घोषित करने का दावा उतना पुष्ट नहीं है।

फिर आए जहांगीर

अकबर के बाद जब जहांगीर बादशाह बना तो उसने अपने पिता के समय चली आ रही इस परंपरा को पूरी तरह खत्म नहीं किया। उसने उसे फिर से स्वीकार किया। वह बताता है, कि एक समय अकबर ने इस रस्म को रोक दिया था, क्योंकि इसमें बहुत ज्यादा आडंबर आने लगा था

मगर, तब भी ब्राह्मण शुभ संकेत के रूप में रक्षासूत्र बांधते रहे। जहांगीर के शासन में रक्षाबंधन का दिन आया और उसने ब्राह्मणों को रक्षासूत्र बांधने की अनुमति दे दी। यानी बादशाह की कलाई पर फिर वही धागा लौट आया।

राखी और मुगल सत्ता

मुगल बादशाह एक ऐसे देश पर शासन कर रहे थे जहां उनकी प्रजा में अनेक धर्म और परंपराएं थीं। दरबार में फारसी भाषा थी। मुगल शाही परंपराएं थीं। इस्लामी रीति-रिवाज थे, लेकिन उसी दरबार के दरवाजे भारतीय समाज की अनेक परंपराओं के लिए भी खुले थे। राजपूत दरबारों से रिश्ते थे। हिंदू अमीर मुगल प्रशासन में महत्वपूर्ण पदों पर थे

इसी सामाजिक ताने-बाने में रक्षासूत्र भी शाही दरबार तक पहुंच गया। इसलिए बादशाह की कलाई पर बंधी राखी को केवल धार्मिक रस्म समझना शायद कहानी को छोटा कर देना होगा। वह उस दौर के मिलेजुले सामाजिक संसार की एक छोटी-सी झलक भी थी।

एक धागे में कितनी दूरियां सिमट गईं

मुगल दरबार और आम हिंदू समाज के बीच कई धार्मिक और सांस्कृतिक दूरियां थीं। फिर भी सावन की पूर्णिमा के दिन एक ब्राह्मण बादशाह की कलाई पर धागा बांध सकता था। यह दृश्य अपने आप में उस समय की जटिल सामाजिक दुनिया को समझने का एक दिलचस्प रास्ता है। आज हम अक्सर इतिहास को दो अलग-अलग खांचों में देखते हैं। एक तरफ मुगल और दूसरी तरफ भारतीय समाज

लेकिन उस समय की असली जिंदगी इतनी सीधी रेखा में नहीं चलती थी। लोग एक-दूसरे की परंपराओं से प्रभावित होते थे। दरबार में अलग-अलग समुदायों के लोग आते थे। राजनीति में रिश्ते बनते थे। और त्योहार भी कभी-कभी इन रिश्तों की भाषा बन जाते थे। राखी का शाही दरबार तक पहुंचना इसी कहानी का एक छोटा लेकिन बेहद खूबसूरत उदाहरण है।

आगरा का इससे क्या रिश्ता है?

जहांगीर ने अपनी आत्मकथा में रक्षाबंधन के इस प्रसंग को दर्ज करते हुए यह स्पष्ट नहीं लिखा कि यह रस्म आगरा के लाल किले में ही हुई थी। इसलिए इसे “आगरा के किले में अमुक साल बादशाह को राखी बांधी गई” कहना प्रमाण से आगे निकल जाना होगा। लेकिन इस कहानी का आगरा से रिश्ता कमजोर भी नहीं है। अकबर और जहांगीर के दौर में आगरा मुगल सत्ता के प्रमुख केंद्रों में था

अकबर ने आगरा को राजधानी बनाया और यहां किले का विस्तार कराया। जहांगीर का भी आगरा से गहरा राजनीतिक और पारिवारिक संबंध था। इसलिए मुगल दरबार में रक्षाबंधन की यह कहानी आगरा के शाही इतिहास की पृष्ठभूमि में पढ़ी जा सकती है। बस इतना फर्क बनाए रखना जरूरी है कि हम प्रमाणित तथ्य और ऐतिहासिक संदर्भ को एक ही बात न कह दें।

जहांगीर ने इसे अपनी किताब में क्यों लिखा?

जहांगीर की आत्मकथा में युद्ध हैं। शिकार हैं। राजनीति है। विद्रोह हैं। सजा और इनाम हैं। दरबार की बातें हैं। इन्हीं सबके बीच एक दिन राखी का भी जिक्र आता है। क्यों? शायद इसलिए कि उस समय के शाही जीवन में यह सिर्फ घर की चारदीवारी का त्योहार नहीं रह गया था

यह दरबार की एक पहचानी हुई रस्म बन चुका था। जहांगीर के लिए यह इतना उल्लेखनीय था कि उसने इसे अपनी आत्मकथा में दर्ज किया। करीब चार सौ साल बाद यही छोटा-सा उल्लेख हमारे लिए एक बड़ी खिड़की बन जाता है।