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    मकर संक्रांति पर 22 साल बाद एकादशी का महासंयोग, ज्योतिषाचार्य ने बताया महत्व और शुभ मुहूर्त

    Updated: Wed, 07 Jan 2026 11:35 AM (IST)

    मकर संक्रांति पर 22 साल बाद एकादशी का दुर्लभ संयोग बन रहा है, जिसे आध्यात्मिक रूप से अत्यंत पुण्यफलदायी माना गया है। इस दिन षट्तिला एकादशी व्रत भी है। ...और पढ़ें

    मकर संक्रांति।

    मकर संक्रांति।

    HighLights

    1. 22 साल बाद मकर संक्रांति और एकादशी का शुभ संयोग।

    2. सर्वार्थ सिद्धि और अमृत सिद्धि योग में दान-पुण्य का महत्व।

    3. 14 जनवरी को दोपहर 3:07 बजे सूर्य का मकर राशि में प्रवेश।

    जागरण संवाददाता, अलीगढ़। मकर संक्रांति पर इस वर्ष 22 वर्ष बाद एकादशी का शुभ संयोग बन रहा है। इस दिन षट्तिला एकादशी व्रत भी है। संक्रांति और एकादशी का एक ही दिन पड़ना आध्यात्मिक रूप से अक्षय पुण्यफल देने वाला माना जाता है। इससे पहले यह शुभ संयोग वर्ष 2003 में बना था। इस दिन सर्वार्थ सिद्धि योग और अमृत सिद्धि योग का भी निर्माण होने जा रहा है, जिससे दान पुण्य और पूजा का महत्व कई गुना बढ़ जाता है। कृषि, अर्थव्यवस्था और खेलकूद के क्षेत्र में मजबूती मिलेगी।

    सूर्य का मकर राशि में प्रवेश करना मकर-संक्रांति

    ज्योतिषाचार्य हृदय रंजन शर्मा के अनुसार इस बार सूर्य देव धनु राशि से निकलकर मकर राशि में 14 जनवरी की दोपहर 03:07 बजे प्रवेश करेंगे, इसलिए त्योहार इसी दिन ही मनाना उचित माना जाएगा। महापुण्य काल दोपहर 03:07 बजे से सांयकाल 06:00 बजे तक माना जाएगा। त्योहार को मनाने के पीछे का तर्क एक ही रहता है और वह है सूर्य की उपासना और दान। सूर्य का मकर राशि में प्रवेश करना मकर-संक्रांति कहलाता है। संक्रांति के लगते ही सूर्य उत्तरायण हो जाता है।

    तिल, गुड़, चावल और वस्त्र के दान से कष्टों से मुक्ति

    मकर संक्रांति के दिन स्नान करने के बाद तिल, गुड़, चावल व आदि को ब्राह्मणों व पूज्य व्यक्तियों को दान दिया जाता है।इस व्रत को खिचड़ी के नाम से जाना जाता है। इस दिन खिचड़ी खाने दान देने का अत्यधिक महत्व होता है। गंगा स्नान करने से सभी कष्टों का निवारण हो जाता है। चावल, गुड़, उड़द, तिल आदि चीजों को खाने में शामिल किया जाता है, क्योंकि यह पौष्टिक होने के साथ ही शरीर को गर्म रखने वाले होते हैं।दीर्घायु व निरोगी रहने के लिए रोगी को इस दिन औषधि, तेल, आहार दान करना चाहिए।

    अंधकार से प्रकाश की ओर अग्रसर का प्रतीक है राशि परिवर्तन

    शास्त्रों के अनुसार दक्षिणायण को देवताओं की रात्रि अर्थात नकारात्मकता का प्रतीक तथा उत्तरायण को देवताओं का दिन अर्थात सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है। मकर-संक्रांति से सूर्य के उत्तरायण होने पर देवताओं का सूर्योदय होता है और दैत्यों का सूर्यास्त होने पर उनकी रात्रि प्रारंभ हो जाती है। इसीलिए इस दिन जप, तप, दान, स्नान, श्राद्ध, तर्पण आदि धार्मिक क्रियाकलापों का विशेष महत्व है।

    खबरें और भी

    मकर संक्रांति से सूर्य उत्तरी गोलार्द्ध की ओर आना शुरू हो जाता है। इस दिन से रातें छोटी व दिन बड़े होने लगते हैं। दिन बड़ा होने से प्रकाश अधिक होगा तथा रात्रि छोटी होने से अंधकार कम होगा। अत: मकर संक्रांति पर सूर्य की राशि में हुए परिवर्तन को अंधकार से प्रकाश की ओर अग्रसर होना माना जाता है।

    स्वरूप बदलकर देवी-देवता आते हैं स्नान करने

    गंगा स्नान के बारे में मान्यता है कि इस दिन गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम प्रयाग में सभी देवी-देवता अपना स्वरूप बदलकर स्नान के लिए आते हैं। प्रत्येक वर्ष एक माह तक मेला लगता है, जिसे माघ मेले के नाम से जाना जाता है। माघ मेले का पहला स्नान मकर संक्रांति से शुरू होता है।

    ये हैं शुभ विवाह के मुहूर्त

    जनवरी में 23 जनवरी वसंत पंचमी
    फरवरी में 3,4,5,10,13,15, 19 (फुलेरा दौज), 20,21 फरवरी
    मार्च में 06,09,10,11 और 12 मार्च