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दीपावली पर घरौंदा बनाने की सदियों पुरानी परंपरा विलुप्त होने की कगार पर, आधुनिकता की दौर में लोगों ने भुलाया

Published: Sun, 08 Nov 2026 10:18 PM (IST)

दीपावली पर बच्चों द्वारा बनाए जाने वाले घरौंदे की प्राचीन परंपरा आधुनिकता के कारण विलुप्त हो रही है। यह श्रीराम ...और पढ़ें

सेमरौता कस्बे में घरौंदा बनाती संध्या और प्रियांशी: जागरण

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HighLights

  1. दीपावली पर घरौंदा बनाने की परंपरा अब विलुप्त हो रही है।

  2. यह परंपरा भगवान श्रीराम के अयोध्या लौटने से जुड़ी हुई है।

  3. घरौंदा सुख-समृद्धि और देवी लक्ष्मी के वास का प्रतीक था।

शैलेंद्र वर्मा, अमेठी। कभी समय था जब गांवों में दीपावली के अवसर पर घरौंदा बनाने की परंपरा थी। लेकिन, आधुनिकता की दौड़ में यह परंपरा विलुप्त होती जा रही है। दीपावली पर गांवों में छोटे बच्चे मिट्टी का घरौंदा बनाते थे और घर के बड़े लोग उनकी मदद करते थे। बच्चे उसे खूब सजाते थे। यही नहीं दीपावली के दिन घरौंदे में दीप जलाकर सजाते भी थे।

बताते हैं कि दीपावली पर मिट्टी का घरौंदा बनाने की परंपरा भगवान श्रीराम के अयोध्या लौटने की खुशी में शुरू हुई थी, जब लोगों ने मिट्टी के घरौंदे और दीपक जलाकर उनका स्वागत किया था। यह परंपरा धन और समृद्धि का प्रतीक मानी जाती रही है।

ऐसा माना जाता है कि इससे घर में देवी लक्ष्मी का वास होता है। खास कर अयोध्या के निकट के जनपदों में यह परंपरा आज से पंद्रह वर्ष पूर्व बड़े उत्साह से निभाई जाती थी।

राम के वनवास के बाद अयोध्या लौटने से जुड़ी परंपरा

वयोवृद्ध डाॅ. बाल कृष्ण त्रिपाठी व श्रीकांत पांडेय ने बताया कि यह परंपरा कार्तिक मास की अमावस्या के दिन भगवान श्रीराम के 14 साल के वनवास के बाद अयोध्या लौटने से जुड़ी हुई है। इस अवसर पर, अयोध्यावासियों ने भगवान श्रीराम के स्वागत में घरों को मिट्टी के दीयों से सजाया और मिट्टी के छोटे घरौंदे भी बनाए, जो नए नगर के बसने का प्रतीक था।

घर में सुख-समृद्धि और सकारात्मकता लाने से संबंध

घरौंदा बनाना शुभ माना जाता है और इसका संबंध घर में सुख-समृद्धि और सकारात्मकता लाने से है। पुराने समय में गांव की अविवाहित युवतियां कई गांवों में घरौंदा बनाती हैं और उसे रंगोली और अन्य सजावट की चीजों से सजाती हैं। इसके यह भी मान्यता है कि उनका वैवाहिक जीवन सुख-समृद्धि से भरा रहेगा।

सुशील मिश्रा और मुन्नी देवी बताती हैं कि हम लोग बचपन में घरौंदे को पत्तियों, फूल, बताशे, रंग- बिरंगी भूसी और कागजों से सजाते थे। घरौंदे के सामने अक्सर चावल और गेहूं के आटे से रंगोली बनाई जाती है, जिसे फूल और अन्य रंगीन सामग्री से सजाया जाता था।

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