लद्दाख जैसे '0' तापमान वाले इलाकों में भी पाली जा सकेंगी 'कुर्री मुर्गी', ग्रामीणों की खूब होगी कमाई
बरेली के केंद्रीय पक्षी अनुसंधान संस्थान (CARI) ने लद्दाख के अत्यधिक ठंडे और कम ऑक्सीजन वाले वातावरण के लिए विशेष मुर्गी समूह विकसित किया है।

ये तस्वीर AI द्वारा जनरेट की गई है।
HighLights
CARI ने लद्दाख के लिए विशेष ठंडी प्रतिरोधी मुर्गियां विकसित कीं।
ये मुर्गियां कम ऑक्सीजन, अत्यधिक ठंड में जीवित रहेंगी।
स्थानीय आय, पोषण सुरक्षा, कचरा प्रबंधन में सहायक होंगी।
हिमांशु अग्निहोत्री, बरेली। शून्य के आसपास तापमान, कम ऑक्सीजन और दुर्गम पहाड़ियां, इन चुनौतियों के बीच अब लद्दाख में मुर्गीपालन की नई संभावनाएं आकार की ओर बढ़ रही हैं।
इसके लिए बरेली के केंद्रीय पक्षी अनुसंधान संस्थान (सीएआरआइ या कैरी) ने ऐसे मुर्गी समूह का चयन किया है, जिसे अत्यधिक ठंड, कम ऑक्सीजन और ऊंचाई वाले वातावरण में जीवित रहने की क्षमता के आधार पर परखा गया है। यह परियोजना स्थानीय परिवारों की आय बढ़ाने और पोषण सुरक्षा मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल मानी जा रही है।
सीएआरआइ के निदेशक और प्रिंसिपल इन्वेस्टिगेटर डॉ. जगबीर सिंह त्यागी और डॉ. संदीप सरन ने बताया कि लद्दाख में समुद्र तल से अधिक ऊंचाई के कारण आक्सीजन का स्तर सामान्य मैदानी क्षेत्रों की तुलना में काफी कम रहता है। वहीं सर्दियों में तापमान शून्य से नीचे चला जाता है।
ऐसे वातावरण में अधिकांश सामान्य नस्ल की मुर्गियां लंबे समय तक जीवित नहीं रह पातीं। इसी चुनौती को देखते हुए संस्थान ने अपने फॉर्म में कई चरणों के परीक्षण किए। चयनित पक्षियों की रक्त क्षमता, फेफड़ों की कार्यक्षमता और कम आक्सीजन सहनशीलता का वैज्ञानिक मूल्यांकन किया गया।

इसके बाद उन्हें लद्दाख की परिस्थितियों के लिए चुना गया, जहां सामान्य 21 प्रतिशत ऑक्सीजन वाले वातावरण से सीधे लगभग 16 प्रतिशत ऑक्सीजन वाले क्षेत्र में अनुकूलन कराया जाएगा। जल्द मुर्गियों को लद्दाख भेजा जाएगा।
स्थानीय परिस्थितियों का किया आकलन
यह कार्य “लद्दाख के लिए जलवायु-लचीली और टिकाऊ कृषि आधारित प्रणालियां” परियोजना के तहत किया जा रहा है। इसमें केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (कजरी) और नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टीट्यूट (एनडीआरआइ) भी सहयोगी संस्थान हैं।
सीएआरआआइ की वैज्ञानिक टीम बीते दिनों लद्दाख का दौरा कर स्थानीय परिस्थितियों का आकलन भी कर चुकी है। कजरी में आयोजित कार्यशाला में वैज्ञानिकों ने प्रतिभाग भी किया।
यदि यह प्रयोग सफल रहता है तो पहली बार ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्रों के लिए वैज्ञानिक रूप से चयनित जलवायु-अनुकूल मुर्गी पालन माडल तैयार होगा, जिसे भविष्य में अन्य दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में भी अपनाया जा सकेगा।
बेहतर होगा कचरा प्रबंधन
वैज्ञानिकों का मानना है कि परियोजना का उद्देश्य केवल मुर्गियों को जीवित रखना नहीं, बल्कि उन्हें स्थानीय रोजगार और पोषण सुरक्षा का माध्यम बनाना है। लद्दाख में पर्यटन के कारण बड़ी मात्रा में किचन वेस्ट निकलता है।
चयनित मुर्गियां इस जैविक अपशिष्ट का उपयोग कर कम लागत में पाली जा सकेंगी। इससे एक ओर कचरे का बेहतर प्रबंधन होगा, वहीं ग्रामीण परिवारों को अंडा और मांस उत्पादन से अतिरिक्त आय का स्रोत मिलेगा।
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