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    सावधान! बिना जांच के ली गई एंटीबायोटिक बन रही है 'जहर', शरीर में पनप रहे हैं कभी न मरने वाले सुपरबग्स

    Updated: Fri, 06 Feb 2026 06:30 AM (IST)

    एंटीबायोटिक दवाओं के अत्यधिक और गलत उपयोग से शरीर में प्रतिरोधक क्षमता बढ़ रही है, जिससे साधारण संक्रमण भी असाध्य होते जा रहे हैं। बरेली में कई मरीजों ...और पढ़ें

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    HighLights

    1. एंटीबायोटिक्स हो रहीं बेअसर, साधारण संक्रमण में भी लेना पड़ी रहीं ताकतवर दवाएं

    2. यह सिलसिला ऐसी ही चला तो कुछ ही सालों में चरम पर होगा एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस

    अनूप गुप्ता, जागरण, बरेली। जरूरत से ज्यादा और गलत तरीके से ली जा रही एंटीबायोटिक दवाएं कई मरीजों में अपना असर खो चुकी हैं। हालात यह हैं कि साधारण संक्रमण में भी अब ताकतवर दवाओं का सहारा लेना पड़ रहा है। चिकित्सकों का कहना है कि किसी भी बीमारी में मरीज को उसकी स्थिति के अनुरूप सटीक एंटीबायोटिक दी जानी चाहिए, लेकिन व्यवहार में ऐसा कम ही हो रहा है। कई बार जांच न होने या मरीज को जल्दी ठीक करने के दबाव में लार्ज स्पेक्ट्रम एंटीबायोटिक्स दे दी जाती हैं, जबकि उनकी आवश्यकता नहीं होती।

    वहीं, कई मरीज भी डाक्टर पर एंटीबायोटिक लिखने का दबाव बनाते हैं। इसका नतीजा यह हो रहा है कि बैक्टीरिया खुद को दवाओं के खिलाफ मजबूत बना रहे हैं, जिसे चिकित्सा भाषा में एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस कहा जाता है। दैनिक जागरण की पड़ताल में यह समस्या शहर के कई अस्पतालों तक काफी देखने को मिली। चौपुला के पास स्थित रुचि अतुल अस्पताल में ऐसे कई मरीज सामने आए, जिनके शरीर पर सामान्य एंटीबायोटिक दवाएं असर करना बंद कर चुकी थीं।

    जांच रिपोर्ट में यह स्पष्ट हुआ कि पहले से अधिक दवाएं लेने के कारण बैक्टीरिया ने प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर ली है। सिविल लाइंस निवासी रेनू पांडेय को यूरिन इंफेक्शन की शिकायत हुई। जब डाक्टर ने एंटीबायोटिक सेंसिटिविटी टेस्ट कराया तो 12 में से चार दवाएं पूरी तरह बेअसर पाई गईं। इसी तरह आरती कश्यप ने बताया कि पहले पास के एक चिकित्सक से बिना जांच एंटीबायोटिक ली, लेकिन आराम नहीं मिला।

    बाद में जांच में तीन दवाएं निष्प्रभावी निकलीं। बड़ा बाजार की जेबा फातिमा को भी यही दिक्कत सामने आई। वह गले में संक्रमण की दिक्कत से काफी समय से जूझ रहीं थी। काफी दिनों तक कफ सीरप पीने के साथ एंटीबायोटिक भी लेतीं रहीं। जिससे उनके शरीर में काफी दुष्प्रभाव पड़ा नजर आया। अस्पताल के चिकित्सक डा. अतुल सक्सेना का कहना है कि बिना जांच एंटीबायोटिक लेने से दवाओं का असर धीरे-धीरे खत्म हो जाता है, जिससे आगे इलाज और जटिल हो जाता है।

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    जंक्शन के पास स्थित एक अन्य अस्पताल में भी ऐसे कई मरीज भर्ती मिले, जिन्हें अत्यधिक एंटीबायोटिक सेवन के कारण ज्यादा पावरफुल दवाएं देनी पड़ीं। करैली निवासी तरन्नुम ने बताया कि पेट दर्द होने पर पहले मेडिकल स्टोर से दवा ली, फिर एक अन्य जगह बिना जांच इलाज कराया, लेकिन आराम नहीं मिला।

    बाद में बड़े चिकित्सक से जांच कराई गई तो गंभीर इंफेक्शन सामने आया और कई एंटीबायोटिक दवाएं बेअसर पाई गईं। इसके अलावा जिला चिकित्सालय में भी ऐसे बड़ी संख्या में मरीज भर्ती होते हैं, जिन्होंने झोलाछाप से इलाज कराने के दौरान लंबे समय तक एंटीबायोटिक्स दवाओं का सेवन कर लिया था। जिससे बाद उनमें एंटीबायोटिक्स रेजिस्टेंट पैदा हो जाता है। सीनियर फिजीशियन डा. एएम अग्रवाल ने बताया कि अस्पताल में 10 से 15 ऐसे मरीज भर्ती होने आते हैं।

    खतरा बीमारी नहीं, एंटीबायोटिक्स दवाओं का बढ़ता इस्तेमाल है

    एंटीबायोटिक दवाएं बैक्टीरिया से होने वाली बीमारियों के इलाज में वरदान हैं। हर बीमारी के लिए अलग एंटीबायोटिक, उसकी तय खुराक और अवधि होती है, लेकिन आज सबसे बड़ा खतरा बीमारी नहीं, बल्कि एंटीबायोटिक का बढ़ता दुरुपयोग बन गया है। बिना डाक्टर की सलाह के दवा लेना, हर बुखार-जुकाम में एंटीबायोटिक शुरू कर देना, मेडिकल स्टोर्स पर बिना पर्चे के दवाओं की आसान उपलब्धता और दूरदराज क्षेत्रों में अनावश्यक एंटीबायोटिक का प्रयोग ये सब मिलकर एक गंभीर समस्या को जन्म दे रहे हैं।

    जब एंटीबायोटिक बिना जरूरत या गलत खुराक में ली जाती है, तो बैक्टीरिया उस दवा के खिलाफ रेजिस्टेंस विकसित कर लेता है। नतीजा यह होता है कि वही दवा भविष्य में असर करना बंद कर देती है। धीरे-धीरे एंटीबायोटिक निष्प्रभावी हो जाती हैं और साधारण संक्रमण भी जानलेवा बन सकता है।

    आज पूरी दुनिया एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस की चुनौती से जूझ रही है। सवाल यह है कि क्या आने वाले समय में हमारे पास इलाज के लिए कोई असरदार एंटीबायोटिक बचेगी? इसी गंभीर खतरे को देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) सहित वैश्विक संस्थाएं जन-जागरूकता अभियान चला रही हैं। इस लड़ाई में सबसे बड़ी भूमिका हमारी जिम्मेदारी की है।  -डा. सुदीप सरन, सीनियर फिजीशियन

    उच्च एंटीबायोटिक दवाओं का उपयोग सिर्फ विशेषज्ञ चिकित्सक तक सीमित हो

    एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस को लेकर समस्या आज केवल भारत की नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक गंभीर और उभरता हुआ स्वास्थ्य संकट बन चुकी है। यदि समय रहते इस पर प्रभावी नियंत्रण नहीं किया गया, तो साधारण संक्रमण का इलाज भी भविष्य में असंभव हो सकता है। एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस के बढ़ने के प्रमुख कारणों में बिना चिकित्सकीय परामर्श के मेडिकल स्टोर्स पर एंटीबायोटिक दवाओं की खुली बिक्री, वायरल संक्रमणों में भी एंटीबायोटिक का अनावश्यक प्रयोग तथा मरीजों द्वारा दवा का पूरा कोर्स न करना शामिल हैं।

    ये सभी कारक मिलकर ‘सुपरबग्स’ के निर्माण को बढ़ावा दे रहे हैं, जिन पर सामान्य दवाएं बेअसर हो जाती हैं। इस समस्या को और गंभीर बनाने वाला एक अहम कारण विडाल टेस्ट का अंधाधुंध और अवैज्ञानिक प्रयोग है। बिना उचित चिकित्सकीय संकेत के यह टेस्ट कराया जाता है और मामूली पाजिटिव रिपोर्ट के आधार पर तुरंत एंटीबायोटिक शुरू कर दी जाती है।

    इससे न केवल टाइफाइड का गलत या अधूरा इलाज होता है, बल्कि अन्य रोगों में भी एंटीबायोटिक के प्रति रेजिस्टेंस बढ़ता है। इसके अलावा बिना डाक्टर के पर्चे के एंटीबायोटिक दवाओं की बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध लगना चाहिए। साथ ही उच्च श्रेणी की एंटीबायोटिक दवाओं का उपयोग केवल विशेषज्ञ चिकित्सकों तक सीमित किया जाए।      - डा. शरद अग्रवाल, एमडी

    अधूरे कोर्स से खतरनाक बैक्टीरिया मरते नहीं, फिर पैदा करते रजिस्ट्रेंट

    एंटीबायोटिक रेज़िस्टेंस आज केवल एक चिकित्सा शब्द नहीं, बल्कि पूरी मानवता के लिए खामोश आपदा बन चुका है। यह वह स्थिति है जब बैक्टीरिया इतनी चालाकी से खुद को बदल लेते हैं कि उन पर एंटीबायोटिक दवाओं का असर होना बंद हो जाता है। नतीजा यह होता है कि जो दवाएं कभी जान बचाती थीं, वही आज बेअसर साबित होने लगती हैं। इस गंभीर समस्या की जड़ें कहीं और नहीं, बल्कि हमारी अपनी लापरवाही में छिपी हैं।

    जरा-सी खांसी, बुखार या गले में दर्द हुआ नहीं कि बिना डाक्टर की सलाह के एंटीबायोटिक लेना शुरू कर दिया जाता है। कई बार मेडिकल स्टोर से सीधे दवाएं खरीद ली जाती हैं, तो कई बार अधूरा कोर्स छोड़ दिया जाता है। यही गलतियां बैक्टीरिया को मजबूत बनाती हैं और वे दवाओं के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेते हैं। एंटीबायोटिक रेज़िस्टेंस का असर केवल मरीज तक सीमित नहीं रहता।

    इससे साधारण संक्रमण भी जानलेवा हो सकते हैं। पहले जो बीमारी दो-तीन दिन की दवा से ठीक हो जाती थी, अब वही हफ्तों तक परेशान करती है। सर्जरी, कीमोथेरेपी, अंग प्रत्यारोपण और आईसीयू जैसे गंभीर इलाज भी जोखिम भरे हो जाते हैं, क्योंकि संक्रमण पर काबू पाना मुश्किल हो जाता है। इस संकट से निपटने के लिए हर नागरिक की भूमिका भी अहम है। - डा. अतुल कुमार सक्सेना, अध्यक्ष, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन बरेली


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