Trending

    विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

    बरेली में 'मिनी उत्तराखंड': जानिए कैसे 35 साल पहले एक छोटे से विचार ने बदली शहर की फिजा

    Updated: Sun, 11 Jan 2026 08:04 PM (IST)

    बरेली का उत्तरायणी मेला, जो 1991 में 'कौथिक' के रूप में शुरू हुआ था, अब संस्कृति, स्वाद और शिल्प का अनूठा संगम बन गया है। यह मेला उत्तराखंड के प्रवासि ...और पढ़ें

    कौथ‍िक मेले का दृश्‍य

    कौथ‍िक मेले का दृश्‍य

    HighLights

    1. वर्ष 1991 'कौथिक' से हुई थी शुरुआत, मेला बन गया संस्कृति, स्वाद और शिल्प का अनूठा संगम

    2. 13, 14 और 15 जनवरी को बरेली क्लब में लगेगा मेला, उत्तराखंड से प्रस्तुति देने आएंगे कलाकार

    ह‍िमांशु अग्‍न‍िहोत्री, जागरण, बरेली। मशकबीन की सुरीली धुन और हुड़के के थाप जब शहर की फिजाओं में गूंजती है तो बरेली क्लब मैदान किसी महानगर का नहीं, बल्कि देवभूमि उत्तराखंड का कोई हिस्सा नजर आने लगता है। शहर में आयोजित होने वाला 'उत्तरायणी मेला' केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि उन हजारों प्रवासियों की अपनी जड़ों से जुड़ने की एक भावनात्मक यात्रा है, जो दशकों से इस शहर को अपना दूसरा घर बना चुके हैं। मेले में पहाड़ी संस्कृति की छटा देखते ही बनती है, जिसका सभी हर साल बेसब्री से इंतजार करते हैं। आइए पढ़ते हैं उत्तरायणी मेेले का इतिहास बताती विस्तृत रिपोर्ट।

    08brc_2_08012026_500

    शहर में इस भव्य मेले की नींव आज से लगभग साढ़े तीन दशक पहले रखी गई थी। साल 1990 का था, जब गढ़वाल सभा के तत्कालीन अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद घिल्डियाल के मन में एक विचार कौंधा। वर्ष 1962 से बरेली क्लब के सामने रामलीला का मंचन तो हो ही रहा था, लेकिन राजेंद्र चाहते थे कि यहां पहाड़ की संस्कृति को प्रदर्शित करने वाला एक 'कौथिक' (मेला) भी लगे।

    08brc_3_08012026_500

    जब यह विचार अखबारों के माध्यम से जन-जन तक पहुंचा, तो खेमानंद शर्मा और डीडी पांडे जैसे प्रतिष्ठित लोगों ने इसे एक नई दिशा दी। उन्होंने बागेश्वर में सरयू और गोमती के संगम पर लगने वाले ऐतिहासिक उत्तरायणी मेले का जिक्र किया और सुझाव दिया कि यदि बरेली में भी मकर संक्रांति पर ऐसा आयोजन हो, तो भावी पीढ़ी अपनी संस्कृति को करीब से देख सकेगी।

    1991 में संजय कम्युनिटी हाल से हुई थी शुरुआत

    विचार को धरातल पर उतारने के लिए तत्कालीन पर्वतीय समाज के अध्यक्ष पीएस बोहरा और आइवीआरआइ के प्रख्यात वैज्ञानिक पीसी सनवाल (उत्तराखंड शोध संस्थान) आगे आए। नेहरू युवा केंद्र में हुई एक ऐतिहासिक बैठक के बाद 'उत्तराखंड शोध संस्थान' की नई समिति बनी और 14 जनवरी 1991 को संजय कम्युनिटी हाल में पहली बार उत्तरायणी मेला सजा। शुरुआत बेहद सादगी भरी थी, कुल सात दुकानें और पीछे एक छोटा सा मंच। उस दौरान भी जनप्रतिनिधि से लेकर अधिकारी तक मेले की भव्यता देखने पहुंचते थे।

    खबरें और भी

    08brc_4_08012026_500

    समय के साथ बदलता रहा मेले का स्वरूप

    1. 1992: मेला एनईआर रेलवे क्लब मैदान में शिफ्ट हुआ।
    2. 1994: इसका आयोजन नेहरू युवा केंद्र में होने लगा।
    3. 2000 से अब तक: 14 जनवरी से यह मेला अपने वर्तमान स्वरूप में बरेली क्लब मैदान में लग रहा है।

    प्रतिष्ठित मेले में मुख्यमंत्री से लेकर अधिकारी तक हुए शामिल

    08brc_6_08012026_500

    उत्तरायणी मेला इतना प्रतिष्ठित है कि उत्तराखंड के दिग्गज नेता और मुख्यमंत्री भी इसमें शामिल होते हैं। अब तक भगत सिंह कोश्यारी, पूर्व मुख्यमंत्री एनडी तिवारी, पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल 'निशंक', बच्ची सिंह रावत और वर्तमान मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी जैसे व्यक्तित्व यहां शिरकत कर चुके हैं।

    08brc_9_08012026_500

    ये है मेले का मुख्य आकर्षण

    मेले का सबसे मुख्य आकर्षण 'रंगयात्रा' होती है, जिसमें पारंपरिक वेशभूषा जैसे घाघरा-पिछौड़ा और ऊनी कोट पहने पहाड़ी समाज के लोग झांकियां निकालते हैं। शहरवासियों को एक ही छत के नीचे उत्तराखंड के शुद्ध उत्पाद मिलते हैं। चाहे वह अल्मोड़ा की मशहूर बाल मिठाई हो, पहाड़ी भट्ट, गहत की दाल या फिर उच्च हिमालयी क्षेत्रों का शहद और जड़ी-बूटियां।

    08brc_8_08012026_500

    उत्तराखंड के शिल्पकारों द्वारा तैयार किए गए ऊनी वस्त्र, हाथ से बुने कालीन और काष्ठ कला के नमूने की भी प्रदर्शनी लगाई जाती है। पहाड़ के मशहूर लोक कलाकार अपनी गायकी और नृत्य से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देते हैं।

    एकता और गौरव का प्रतीक

    उत्तरायणी मेला केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह शहर में रह रहे पर्वतीय समाज की एकता का प्रतीक है। पीसी सनवाल, प्रताप सिंह बोरा, यूडी वैला, सुरेंद्र सिंह बिष्ट और उनके साथियों की ओर से बोया और सींचा गया यह बीज आज एक विशाल वटवृक्ष बन चुका है। मौजूदा समय में अध्यक्ष अमित पंत और महासचिव मनोज पांडे इस धरोहर को आगे बढ़ा रहे हैं।

    08brc_7_08012026_500

    यह मेला नई पीढ़ी को बताता है कि आधुनिकता की दौड़ में अपनी जड़ों, अपनी भाषा (कुमाऊंनी-गढ़वाली) और अपने संस्कारों को भूलना नहीं है। इस बार भी 13, 14 और 15 जनवरी को जब सूर्य उत्तरायण होंगे, तो बरेली क्लब मैदान 'जय बद्री विशाल' और 'जय बाबा केदार' के उद्घोष से गुंजायमान होगा।

     

    यह भी पढ़ें- UP Govt Action: बरेली के इस मुख्य मार्ग पर बनेगा डबल लेन ओवरब्रिज, ₹66 करोड़ का बजट पास; देखें पूरा रूट प्लान