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    कारगिल विजय दिवस 2026: बलिदान पर गर्व है, देश के काम आए पति

    Updated: Sun, 26 Jul 2026 08:20 AM (GMT+05:30)

    बस्ती के लांस नायक दयाशंकर शुक्ल 2000 में बारामूला में देश के लिए बलिदान हो गए थे। उनकी पत्नी निर्मला शुक्ला को पति के बलिदान पर गर्व है, लेकिन सरकार ...और पढ़ें

    गांव में स्थापित बलिदानी दयाशंकर शुक्ला की प्रतिमा व परिवार।- जागरण

    गांव में स्थापित बलिदानी दयाशंकर शुक्ला की प्रतिमा व परिवार।- जागरण

    HighLights

    1. लांस नायक दयाशंकर शुक्ल 2000 में बलिदान हुए।

    2. पत्नी निर्मला को पति के देश सेवा पर गर्व।

    3. बालिका इंटर कॉलेज सहित कई सरकारी वादे अधूरे।

    अरुण सिंह , बभनान (बस्ती)। बस्ती जनपद के गौर ब्लाक के पिपरा गोसाईं गांव निवासी ध्रुव कुमार शुक्ला की दूसरी संतान दयाशंकर शुक्ल कश्मीर के बारामूला में तैनात थे। 31 जुलाई 2000 को लड़ते- लड़ते बलिदान हो गए। बलिदानी की स्मृति में समाधि स्थल व गांव में उनकी प्रतिमा स्थापित होने के साथ गांव को पक्की सड़क से जोड़ दिया गया है। उनके नाम पर स्मृति द्वारा का भी निर्माण कराया गया है।

    तत्कालीन जिलाधिकारी एके सिंह ने बलिदानी के नाम से गांव में बालिका इंटर कालेज, गांव का सौन्दर्यीकरण , बलिदानी के पत्नी के नाम आवास व तीन एकड़ भूमि पट्टे के लिए कहा था। जो वायदा आज भी अधूरा है।बलिदानी के दोनों बेटियों की शादी हो चुकी है। गांव वाले नागपंचमी का वह दिन नहीं भूलते। इसी दिन उनका शव गांव में आया था।

    पत्नी निर्मला शुक्ला ने बताया कि जब सैनिक कल्याण बोर्ड के लोग गांव में आकर उनके बलिदान होने की जानकारी दी तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गया। वह दु;खद के पल सोच कर वह आज भी भावुक हो गई। उन्होंने बताया कि उनके पति वर्ष 1990 में लांस नायक के पद पर भर्ती हुए थे। 31 जुलाई 2000 को जम्मू कश्मीर के बारामूला जिले के बढी पुरा में ड्यूटी के दौरान दुश्मन की गोली से बलिदान हो गए थे।

    घटना के समय उनकी बड़ी पुत्री संगीता 18 वर्ष की जबकि रंजीता महज 13 वर्ष की थी। कहा कि उनसे उसे समय वादा किया गया था कि तीन एकड़ भूमि पट्टे पर दी जाएगी लेकिन महज लगभग आधा एकड भूमि ही कई जगहो पर टुकड़ो-टुकड़ो मिला है जिस पर आज तक उन्हें कब्जा नहीं मिल पाया, गांव का सौंदरीकरण व उन्हें आवास मिलना आज तक वादा ही रह गया।गांव में दयाशंकर के बड़े भाई कृपाशंकर शुक्ला व छोटे भाई उमाशंकर शुक्ल अपने परिवार के साथ रहते हैं।

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    तीन अन्य भाई अलग-अलग महानगरों में सपरिवार रहकर रोजी-रोटी कमाते हैं। निर्मला देवी कृपाशंकर शुक्ला के बड़े बेटे आनंद शुक्ला को अपना बेटा मानती हैं और वह उनके साथ बस्ती में आवास बनाकर रहती हैं। उन्होंने कहा कि पति के बलिदान होने के बाद उन्हें तमाम चुनौतियों का सामना करना पड़ा पर उन्हें इस बात का भी गर्व है कि उनके पति देश के काम आए।

    बताया कि उनके पुण्यतिथि पर हर वर्ष कार्यक्रम का आयोजन कर रक्तदान शिविर लगाया जाता है और ग्रामीणों को मुफ्त में पौध का वितरण किया जाता है। बलिदानी की पत्नी की इच्छा है कि वह गांव में एक विद्यालय खोले जिससे यहां के बच्चों को गांव में ही अच्छी शिक्षा की व्यवस्था हो जाए।