1857 की क्रांति : ऐसा कब्रिस्तान, जहां अंग्रेजों ने दफनाए 52 हिंदू क्रांतिकारी; तोपों के आगे भी नहीं झुके थे बिश्नोई सरायवासी
1857 की क्रांति में नगीना (बिजनौर) के 52 बिश्नोई क्रांतिवीरों ने अंग्रेजों से लोहा लेते हुए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। अंग्रेजों ने उनके शव शाहजटा चौ ...और पढ़ें

नगीना के शाहजटा चौक स्थित मैदान, जहां दफन हैं बलिदान हुए 52 क्रांतिकारी। जागरण आर्काइव
HighLights
52 बिश्नोई क्रांतिवीर 1857 में नगीना में हो गए थे बलिदान।
अंग्रेजों ने उनके शव शाहजटा चौक मैदान में दफनाए।
बिश्नोई सराय के क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों का डटकर मुकाबला किया।
संवाद सहयोगी, जागरण. नगीना (बिजनौर)। जंग-ए-आजादी के इतिहास में भारत मां को आज़ाद कराने के लिए 52 बिश्नोई समाज के क्रांतिवीर अंग्रेजों से लोहा लेते हुए बलिदान हो गए। अंग्रेजों ने इनके शव शाहजटा चौक के पास स्थित मैदान में दफन कर मिट्टी डाल दी। नगीना की धरती को अपने खून से सींचने वाले क्रांतिवीरों को याद करके आज भी लोगों आंखें नम हो जाती हैं।
नगीना के मुहल्ला बिश्नोई सराय स्थित शाहजटा चौक अर्जुन का थला "बिश्नोई कब्रिस्तान मैदान" नाम से मशहूर है। इतिहासविद डा. राकेश कुमार थापन‚ शिक्षाविद मनीष राणा, राजकुमार राजू बिश्नोई का कहना है कि 1857 की क्रांति और नगीना में बिश्नोई समाज के क्रांतिकारियों द्वारा दिए गए बलिदान को नगीनवासी कभी नहीं भूल पाएंगे। इतिहासविद डा. राकेश कुमार थापन का कहना है कि 1857 के गदर में अंग्रेजी सेना की टुकड़ी कत्लेआम करती हुई नगीना पहुंच गई।
नगीना के बिश्नोई समाज के क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी सेना का डटकर मुकाबला किया तथा पूरी टुकड़ी को समाप्त कर दिया। कुछ समय बाद एक अन्य टुकड़ी जो आधुनिक हथियारों से लैस थी,‚ उसके पास तोपें भी थीं। इस सेना की टुकड़ी ने नगीना के मोहल्ला बिश्नोई सराय को घेर लिया और चारों ओर से तोपें लगा दी। अंग्रेजी सेना से क्रांतिवीरों का घोर संघर्ष हुआ। इस युद्ध में 52 बिश्नोई शहीद हो गए।
शाहजटा चौक मैदान में बिश्नोई समाज के 52 क्रांतिवीरों के शव दफनाया गया। यह स्थान आज भी सरकारी रिकार्ड में बिश्नोई कब्रिस्तान के नाम से दर्ज है, जबकि हिन्दुओं में अंतिम संस्कार की प्रथा है। लोगों का कहना है कि आज भी यहां खोदाई करने पर मानव कंकाल मिलते हैं। नालबंदान निवासी शिक्षक एवं इतिहास की जानकारी रखने वाले मनीष राणा बताते हैं कि 21 अगस्त को अंग्रेजों ने नगीना शहर की नाकाबंदी करके 300 क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया‚। इनमें से 52 को तो तभी मार दिया। अंग्रेजी फौज का तांडव पूरी रात चला।
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नगीना के मुख्य मोहल्ला विश्नोई सराय के क्रांतिकारियों के पास तोप बना लेते थे। 24 अगस्त 1858 को मौत का तांडव बिश्नोई सराय में हुआ। अंग्रेज़ी लश्कर ने बिश्नोई सराय के दर्जनों मकानों को जला दिया। उस वक्त नगीना तत्कालीन कलक्टर अलेक्जेंडर शेक्सपियर की आंख की किरकिरी भी बना रहा, इसलिए सबसे ज्यादा जुल्म और कत्लेआम नगीना में हुआ। सरकारी रिकार्ड के अलावा हकीकत में यह आंकड़ा बहुत ज्यादा हो सकता है क्योंकि पुस्तक सरकशी-ए-बिजनौर में घटनाओं का तो ज़िक्र किया है लेकिन शहादतों को कम से कम लिखने का प्रयास किया गया है।