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बिजनौर में बासुकीनाथ की धरती पर हैं सांपों का राज, सपेरे भी नहीं छेड़ पाते बीन की तान

By Virendra Rana Edited By: Praveen Vashishtha
Published: Sun, 16 Aug 2026 04:56 PM (IST)

बिजनौर के अफजलगढ़ स्थित फतेहउल्लानगर गांव में भगवान बासुकीनाथ की भूमि पर सांपों का राज है, जहां सपेरे भी बीन ...और पढ़ें

बिजनौर का बासुकीनाथ मंदिर। जागरण

बिजनौर का बासुकीनाथ मंदिर। जागरण

HighLights

  1. बिजनौर के फतेहउल्लानगर गांव में बासुकीनाथ की भूमि पर सांपों का राज।

  2. सपेरे बीन बजाने में असफल, सांप ग्रामीणों को नहीं पहुंचाते नुकसान।

  3. कालसर्प दोष निवारण और नागदेव की पूजा का प्रमुख आस्था केंद्र है।

संवाद सूत्र, भूतपुरी (बिजनौर)। अफजलगढ़ के गांव फतेहउल्लानगर उर्फ चाऊवाला गांव आज भी अपने भीतर आस्था और रहस्य की अनोखी कहानी समेटे हुए है। यहां भगवान बासुकीनाथ की शापित भूमि आज भी है। यहां सपेरे आज तक बीन नहीं बजा सके। बुजुर्गों के अनुसार यहां वर्षों से सांपों का बसेरा रहा है। खास बात यह है कि सांपों की मौजूदगी के बावजूद ग्रामीण इन्हें नुकसानदेह नहीं मानते।

मान्यता है कि इस भूमि पर भगवान बासुकीनाथ का आशीर्वाद है और यहां सपेरे भी सांप पकड़ने में सफल नहीं हो पाते। बुजुर्गों के अनुसार करीब दो सौ वर्ष पहले यह इलाका घने जंगल से घिरा हुआ था। उस समय यहां दिहोर नाम का गांव बसा था। जंगल और आसपास के क्षेत्र में बड़ी संख्या में सांप दिखाई देते थे। बुजुर्गों की मान्यता है कि इसी स्थान पर भगवान बासुकीनाथ ने निवास किया था। नागदेव की आराधना के कारण यह स्थान धीरे-धीरे आस्था का केंद्र बन गया।

बीन बजाने पहुंचे सपेरे, नहीं पकड़ सके सांप
ग्रामीण बताते हैं कि पुराने समय में कई बार सपेरे सांप पकड़ने के लिए यहां पहुंचे। उन्होंने बीन बजाकर सांपों को बाहर निकालने का प्रयास किया, लेकिन सफलता नहीं मिली। ग्रामीणों का दावा है कि बीन बजाने के बावजूद बीन के सुर बदल जाते थे। इसके बाद यह मान्यता और मजबूत हो गई कि बासुकीनाथ की इस धरती पर सांपों को पकड़ना संभव नहीं है।

2013 में कराया नाग देवता मंदिर का निर्माण
मंदिर के संस्थापक स्व. ठाकुर नरेशकांत के स्वजन ने बताया कि वर्ष 2013 में स्व. नरेश कांत को नागदेव के दर्शन हुए थे। नागदेव कुछ समय तक मंदिर स्थल पर रहे। इसके बाद उन्होंने ब्राह्मणों से चर्चा कर भगवान बासुकीनाथ के मंदिर की स्थापना कराई। विधि-विधान से शिवलिंग स्थापित कर मंदिर का निर्माण कराया गया। तभी से यह स्थान श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बन गया।

कालसर्प दोष निवारण की भी मान्यता
मान्यता है कि जन्मकुंडली में कालसर्प दोष होने पर भगवान बासुकीनाथ की पूजा-अर्चना करने और प्रसाद चढ़ाने से दोष का निवारण होता है। नागपंचमी, सावन, शिवरात्रि और अन्य धार्मिक अवसरों पर यहां श्रद्धालु पहुंचकर जलाभिषेक करते हैं।

सांप दिखते हैं, लेकिन नुकसान की घटना नहीं
ग्रामीणों का कहना है कि मंदिर और आसपास के क्षेत्र में आज भी समय-समय पर विभिन्न प्रजातियों के सांप दिखाई देते हैं। इसके बावजूद सांपों द्वारा किसी ग्रामीण को नुकसान पहुंचाए जाने की घटना सामने नहीं आई है। यही वजह है कि ग्रामीण इसे भगवान बासुकीनाथ की कृपा मानते हैं। मंदिर के स्थापना दिवस पर प्रत्येक वर्ष 15 दिसंबर को भंडारा और कीर्तन किया जाता है।

ग्रामीणों की आस्था, रहस्य आज भी बरकरार
करीब दो सदियों पुरानी मान्यताओं, मंदिर में होने वाली पूजा और यहां सांपों की मौजूदगी ने बासुकीनाथ मंदिर को क्षेत्र में अलग पहचान दी है। आस्था से जुड़ी इन कथाओं की सच्चाई भले ही लोगों के विश्वास का विषय हो, लेकिन सांपों और मंदिर से जुड़ी यह कहानी आज भी ग्रामीणों और श्रद्धालुओं के बीच कौतूहल का विषय बनी हुई है। गांव आलमपुर गांवड़ी निवासी खुशीराम शर्मा बताते हैं कि किसी भी व्यक्ति की जन्मकुंडली में काल सर्प दोष होता है तो मंदिर में प्रसाद चढ़ाने से निवारण हो जाता है। गांव शाहपुर जमाल निवासी पूरन सिंह का कहना है कि नागपंचमी के पर्व पर वर्ष में एक बार नाग देवता के मंदिर के पास अवश्य दर्शन देने आते हैं। श्रद्धालु प्रत्येक सोमवार को यहां पर प्रसाद भी चढ़ाते हैं।

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