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चंदौली में हर साल होता है यूपी-बिहार के ताजियों का मिलन, 100 वर्षों से कायम है अनूठी परंपरा

Published: Fri, 26 Jun 2026 03:21 PM (IST)

यूपी-बिहार सीमा पर कर्मनाशा नदी पुल पर मोहर्रम के ताजियों का सौ साल पुराना मिलन पूरे उत्साह से हुआ।

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HighLights

  1. मोहर्रम पर यूपी-बिहार सीमा पर ताजियों का मिलन।

  2. सौ साल पुरानी यह परंपरा श्रद्धा से निभाई गई।

  3. आपसी प्रेम, सद्भाव और भाईचारे का संदेश दिया।

जागरण संवाददाता, चंदौली। उत्तर प्रदेश और बिहार की साझा सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक सौ वर्षों से चली आ रही ताजियों के मिलन की परंपरा शुक्रवार को भी पूरे श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाई गई। मोहर्रम पर यूपी-बिहार सीमा स्थित कर्मनाशा नदी पुल पर नौबतपुर (उत्तर प्रदेश) व बिहार के दुर्गावती प्रखंड के खजुरा और सरैया के ताजियों का पारंपरिक मिलन हुआ। इस दौरान पूरा क्षेत्र ‘या अली’ और ‘या हुसैन’ के नारों से गूंज उठा।

वर्षों से चली आ रही इस परंपरा के तहत नौवीं मोहर्रम की रात नौबतपुर, खजुरा और सरैया के ताजिए अपने-अपने चौकों से जुलूस के रूप में रवाना हुए। निर्धारित समय पर तीनों ताजिए यूपी-बिहार की सीमा पर स्थित कर्मनाशा नदी पुल पर पहुंचे, जहां धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ उनका मिलन कराया गया। ताजियों के आमने-सामने आते ही अकीदतमंदों ने मातमी नारों के बीच एक-दूसरे का अभिवादन किया और आपसी प्रेम, सद्भाव एवं भाईचारे का संदेश दिया।

निभाई गई मुंह मीठा करने की परंपरा

मिलन समारोह के दौरान दोनों राज्यों से आए लोगों ने एक-दूसरे से गले मिलकर सामाजिक सौहार्द बनाए रखने का संकल्प लिया। इसके बाद बिहार से आए लोग नौबतपुर के ताजिए को सम्मानपूर्वक उसके चौक तक छोड़ने पहुंचे। वहां मेहमानों का स्वागत किया गया और मुंह मीठा कराने की परंपरा निभाई गई। इसके बाद खजुरा और सरैया के ताजिए अपने-अपने क्षेत्रों के लिए रवाना हो गए।

दोपहर करीब एक बजे नौबतपुर, खजुरा और सरैया के ताजिए बिहार के खजुरा पड़ाव स्थित हजरत अंजान शहीद बाबा की दरगाह के समीप पहुंचे। यहां पारंपरिक रूप से लकड़ी, गदका और अन्य युद्धक कलाओं का प्रदर्शन किया गया। खिलाड़ियों ने अपने कौशल का शानदार प्रदर्शन कर लोगों का मन मोह लिया।

कार्यक्रम को देखने के लिए दोनों राज्यों से बड़ी संख्या में लोग पहुंचे और देर तक मौजूद रहे। शाम के समय तीनों ताजिए एक बार फिर खजुरा पड़ाव से कर्मनाशा नदी के समीप पहुंचे, जहां अंतिम बार उनका पारंपरिक मिलन कराया गया। इसके बाद सभी ताजिए अपने-अपने कर्बला के लिए रवाना हो गए।

स्थानीय लोगों के अनुसार यह परंपरा करीब एक शताब्दी से लगातार चली आ रही है और आज भी दोनों राज्यों के लोगों के बीच सामाजिक समरसता, धार्मिक आस्था और आपसी भाईचारे की मजबूत मिसाल बनी हुई है।

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