Independence day 2026: 15 अगस्त 1947 से 5 साल पहले ही आजाद हो गया था यूपी का ये शहर, भाग खड़े हुए थे अंग्रेज
बरहज नगर 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान 17 दिनों के लिए अंग्रेजों से आज़ाद हो गया था, जहां डाक बंगले पर तिरंगा फहराया गया था।

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HighLights
बरहज 1942 में 17 दिन के लिए हुआ था आज़ाद।
बाबा राघव दास के नेतृत्व में फहराया गया था तिरंगा।
शहीदों के नाम पर नगर में नहीं कोई स्मारक।
संवाद सूत्र, देवरिया। देश भले ही 15 अगस्त 1947 को आजाद हुआ हो, लेकिन घाघरा-राप्ती के संगम पर बसा बरहज नगर पांच साल पहले ही 17 दिन के लिए आजाद हो गया था। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान बरहज के युवाओं ने जगन्नाथ मल बरौली विश्वनाथ मिश्र कुरे विश्वनाथ त्रिपाठी बरहज बाबा राघव दास के नेतृत्व में अंग्रेजी हुकूमत को उखाड़ फेंकते हुए डाक बंगले पर तिरंगा फहराकर इसे ‘आजाद जोन’ घोषित कर दिया था।
इतिहासकार प्रोफेसर डॉ. अजय कुमार मिश्रा बताते हैं कि 9 अगस्त 1942 को महात्मा गांधी की गिरफ्तारी की खबर बरहज पहुंची तो स्वतंत्रता सेनानियों में आक्रोश फैल गया। बाबा राघव दास के नेतृत्व में सैकड़ों युवाओं का जुलूस कचहरी पर पहुंचा। यूनियन जैक उतारकर हाथ से सिले खादी के तिरंगे को शान से फहरा दिया गया। यह झंडा लगातार 17 दिन तक कचहरी पर लहराता रहा और अंग्रेज अधिकारी कचहरी छोड़कर भाग गए।
आंदोलनकारियों ने सरयू पुल के पास रेल पटरी उखाड़ दी
डॉ. हृदय नारायण राव ने बताया कि अंग्रेज हुकूमत के लिए व्यापारिक नगरी बरहज के हाथ से निकलना बड़ी चुनौती थी। विद्रोह कुचलने के लिए सलेमपुर से बरहजिया ट्रेन से गोरखा पलटन भेजी गई, लेकिन आंदोलनकारियों ने सरयू पुल के पास रेल पटरी उखाड़ दी।
बाद में फौज ने नावों से घाघरा पार कर नगर में प्रवेश किया और बर्बर लाठीचार्ज कर 32 लोगों को गिरफ्तार कर देवरिया जेल भेज दिया। सरकारी अभिलेखों में यह घटना आज भी ‘बरहज कांड 1942’ के नाम से दर्ज है।
जिन शहीदों ने दिलाई आजादी, उनके नाम पर नहीं है एक भी स्मारक
स्वतंत्रता सेनानी के नाती 55 वर्षीय अरविंद त्रिपाठी बताते हैं कि वह ऐतिहासिक तिरंगा उनकी दादी ने चरखे से सूत कातकर हाथों से बनाया था, जिसे परिवार ने आज भी धरोहर के रूप में संभाल कर रखा है। बुजुर्ग सीताराम कहते हैं, पिता बताते थे कि17 दिन तक कचहरी पर एक भी अंग्रेज नहीं आया, पूरा राज युवाओं के हाथ में था।
यह विडंबना है कि आजादी के 79 साल बाद भी जिन शहीदों ने बरहज को पहली आजादी दिलाई, उनके नाम पर नगर में एक भी स्मारक, द्वार या पार्क नहीं है। जिस डाक बंगले पर पहला तिरंगा फहरा था, वह आज उपेक्षा का शिकार होकर खंडहर बन रहा है।
