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IAS अफसर दिव्या मित्तल ने 13 वर्ष की सेवा के बाद दिया इस्तीफा, विशेष सचिव के पद पर थीं तैनात

Updated: Sun, 30 Aug 2026 09:31 AM (IST)

आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल ने 13 साल की सेवा के बाद अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने सोशल ...और पढ़ें

आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल। जागरण

आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल। जागरण

HighLights

  1. आईएएस दिव्या मित्तल ने 13 साल बाद दिया इस्तीफा।

  2. आईआईटी दिल्ली, आईआईएम बैंगलोर से पढ़ाई की थी।

  3. देवरिया और मीरजापुर में सेवा के अनुभव साझा किए।

डिजिटल डेस्क, जागरण, गोरखपुर।  देवरिया में जिलाधिकारी के रूप में तैनात रहीं आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने सोशल मीडिया (एक्स/फेसबुक) पोस्ट के जरिए 13 वर्षों की सेवा के बाद स्वेच्छा से त्यागपत्र देने की जानकारी साझा की। IIT दिल्ली और IIM बैंगलोर से पढ़ाई कर चुकीं दिव्या मित्तल ने लिखा कि उन्होंने अपनी इच्छा से इस यात्रा को विराम दिया है।

उन्होंने अपने सोशल मीडिया एक्स पर पोस्ट करते हुए लिखा कि आज मैंने 13 वर्षों की अविस्मरणीय यात्रा को अपनी इच्छा से विराम देते हुए IAS से त्यागपत्र दे दिया है। साधारण परिवेश में पलते हुए मैंने एक अच्छे, सफल जीवन का सपना देखा था। दिन-रात एक कर IIT दिल्ली और IIM बैंगलोर से पढ़ने के बाद, लंदन में नौकरी लग गयी। पर 'सब कुछ' पा लेने पर भी कुछ अधूरा था।

उन्होंने आगे लिखा कि अपने देश में न होना खलता था। मेरी पढ़ाई, आत्मविश्वास, दुनिया में कहीं भी सिर उठाकर चलने की ताक़त, सब इस मिट्टी का कर्ज़ था मुझ पर। वो कर्ज़ चुकाना था। चाहती थी जिस भारत का सपना देखा था, उसे बनाने वाली ईंटों पर मेरे भी हाथों के निशान हों। सो लौट आई, और IAS अधिकारी बनने का सौभाग्य मिला। बहुत कुछ करने का मौका मिला और बहुत सीखा।

उन्होंने देवरिया का जिक्र करते हुए कहा कि देवरिया ने सिखाया कि सही के साथ खड़ा होना विकल्प नहीं, कर्तव्य है। मीरजापुर ने सिखाया कि 'असंभव' कोई तथ्य नहीं, बस एक राय है। और माँ विंध्यवासिनी के चरणों में बैठकर सीखा कि शक्ति किसी पद से नहीं, उनकी कृपा और लोगों के विश्वास से आती है। सबसे बड़ी सीख यह थी कि अपने लिए देखे सपने तो पूरे हो चुके थे, अब अपने लोगों के लिए देखे सपनों को जीना था।

आगे कहा कि इस जीवन का असली सुकून उन आंखों में दिखा, जिस परिवार को पहली बार ज़मीन का हक़ मिला, जिस दिव्यांग को सम्मान से जीने का अवसर मिला, और जिस किसान के खेत को पानी मिला। उनके संघर्षों में साथ चलते हुए मैंने सीखा कि हर सरकारी फाइल के पीछे एक व्यक्ति है, और उसकी गरिमा बनाये रखना ही न्याय है। मूर्ख थी जो सोचा था कि कुछ देने आयी हूं। सच यह है कि सबसे ज्यादा मैंने ही पाया, और वो कर्ज और भी बढ़ता गया।

लोग मेरी खुशी में मुझसे ज्यादा खु हुए। उन्होंने मुझे तब भी उसी विश्वास से देखा, जब मैं खुद ही थकी या टूटी थी। और इसी ने आगे बढ़ते रहने की हिम्मत दी। इतना प्यार, इतना सम्मान, इतना अपनापन मिला, कि मेरी झोली पूरी भर गयी। और इसमें उन साथियों, अधिकारियों और कर्मचारियों का भी बहुत बड़ा श्रेय है जिन्होंने मेरे कंधे से कंधा मिलाकर काम किया और साथ डटे रहे।

आज आभार से आंखें नम हैं। बस एक दृश्य इनमें बसा है। लहुरिया दह की पहाड़ी की वो वृद्ध मां, जो अपने गांव में पहली बार पानी पहुंचता देख कुछ नहीं बोली, बस कांपते हाथों से मेरा सिर छूकर आशीर्वाद दे गई। पद तो आज छूट गया, पर वह स्पर्श जीवन भर नहीं छूटेगा। और वह सपना भी नहीं छूटेगा, जो देश की इस मिट्टी ने मुझे दिया है। आपकी अपनी, दिव्या मित्तल

यह पोस्ट तेजी से वायरल हो रहा है। 

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