महावीर जयंती पर विशेष: राजा चंद्रसेन ने बनवाया था, आस्था का केंद्र है फिरोजाबाद का प्राचीन चंद्रवार जैन मंदिर
चंद्रवार जैन मंदिर, फिरोजाबाद के पास यमुना किनारे स्थित एक प्राचीन आस्था केंद्र है। इसे राजा चंद्रसेन ने बनवाया था और यह एक समृद्धशाली राज्य का हिस्सा ...और पढ़ें

जैन मंदिर।

समय कम है?
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जागरण संवाददाता, फिरोजाबाद। शहर से सात किलोमीटर दूर यमुना किनारे स्थित चंद्रवार जैन अति प्राचीन है। यह आस्था का बड़ा केंद्र है। मान्यता है कि इसे राजा चंद्रसेन और उनके पूर्वजों ने बनवाया था। चंद्रवार पहले समृद्धशाली राज्य था। यहां बंदरगाह के अवशेष और राजा चंद्रसेन का किला खंडहर के रूप में अब भी हैं।
महावीर जयंती पर होता है भगवान का विशेष अभिषेक और पूजन
चंद्रवार में समय-समय पर देव प्रतिमाएं निकलती रहती हैं। प्रदेश सरकार ने इस क्षेत्र को अब संरक्षित क्षेत्र घोषित कर दिया। इसी राज्य के नाम पर जिले का नाम चंद्रवार करने की मांग चल रही है। प्रदेश के पर्यटन और संस्कृति विभाग द्वारा यहां का पर्यटन दृष्टि से विकास कराया जा रहा है। यहां हर वर्ष दो अक्टूबर को मेला और पंच कल्याणक महोत्सव का आयोजन होता है। जिसमें बड़ी संख्या में शहर से लोग शामिल होते हैं।
हर वर्ष दो अक्टूबर को लगता है मेला, बढ़ी संख्या में पहुंचते हैं श्रद्धालु
दिगंबर जैन महासमिति के राष्ट्रीय मंत्री संजय जैन पीआरओ ने बताया कि मंदिर में भगवान श्रीआदि नाथ प्रभु, चंद्रप्रभु, पार्श्वनाथ और महावीर स्वामी की प्रतिमाएं विराजमान हैं। महावीर जयंती के मौके पर यहां महावीर स्वामी का अभिषेक और पूजन किया जाता है।
अपने पुरुषार्थ के बल पर महावीर बाद में बने भगवान
जैन मुनि अमित सागर महाराज का कहना है कि महावीर स्वामी कोई अवतार नहीं थे और न हीं भगवान थे। भगवान तो वह अपने पुरुषार्थ के बल पर बाद में बने। जैन दर्शन में भगवान बनते हैं। अवतरित नहीं होते। पहले तो वे हमारे इसी भारत की वसुंधरा पर विचरते थे। धर्म चक्र का प्रवर्तन करने से वे तीर्थंकर कहलाए। वे महामानव थे, जब कोई भी महा मानव जन्म लेता है तो उसके जन्म के पहले ही दूर्भिक्ष, महामारी, अकाल हिंसा, तथा अमानवीय आसुरी शक्तियां पलायन करना शुरू कर देती हैं।
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भगवान के जन्म लेते ही हर ओर प्रकाश सा फैल गया
सृष्टि का कण-कण उस महामानव की अगुवाई के लिए हर्षोल्लास के रस में पक जाता है। ठीक यही वर्धमान के जन्म लेते ही हुआ। भगवान के जन्म लेते ही हर ओर प्रकाश सा फैल गया। उन्होंने जियो और जीने दो का संदेश दिया। बताया कि प्रत्येक आत्मा स्वयं में सर्वज्ञ और आनंदमय है। शांति और आत्मनियंत्रण ही सही मायने में अहिंसा है। घृणा करने से मनुष्य का विनाश होता है। सभी प्राणियों के प्रति सम्मान का भाव ही अहिंसा है। मनुष्य स्वयं के दोष की वजह से ही दुखी होता है। अपनी गलती सुधार कर प्रसन्न हो सकता है।