CWG 2026: पैरा पावरलिफ्टिंग में भारत का भविष्य उज्ज्वल, डॉ. जेपी सिंह ने गिनाए विश्व चैंपियन बनने के तीन मंत्र
भारतीय पैरा पावरलिफ्टिंग के चेयरमैन डॉ. जेपी सिंह ने देश को इस खेल में विश्व शक्ति बनाने का लक्ष्य रखा है। उन्होंने खिलाड़ियों के संघर्ष और सुविधाओं क ...और पढ़ें

डॉ. जे पी सिंह, चेयरमैन, इंडिया पैरा पावर लिफ्टिंग एवं भारतीय टीम कोच। जागरण
HighLights
डॉ. जेपी सिंह भारतीय पैरा पावरलिफ्टिंग के चेयरमैन, मुख्य कोच।
कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत को पहला पदक दिलाने में महत्वपूर्ण योगदान।
2032 पैरालंपिक में भारत को शीर्ष-5 देशों में लाने का लक्ष्य।
जागरण संवाददाता, गाजियाबाद। भारतीय पैरा पावरलिफ्टिंग के विकास, खिलाड़ियों के संघर्ष और उनकी ऐतिहासिक सफलताओं की बात होगी तो डा. जेपी सिंह का नाम जरूर लिया जाएगा।
पिछले करीब दो दशकों से पैरा पावर लिफ्टिंग की रीढ़ बने डा. सिंह वर्तमान में इंडिया पैरा पावरलिफ्टिंग के चेयरमैन और भारतीय टीम के मुख्य कोच हैं। देश के दिव्यांग एथलीटों ने उनके मार्गदर्शन में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तिरंगे का मान बढ़ाया है।
कामनवेल्थ गेम्स-2026 में भारत के लिए पहला पदक जीतने की उपलब्धि से लेकर, विदेशी धरती पर खिलाड़ियों के संघर्ष, आधुनिक स्पोर्ट्स साइंस की जरूरत और उत्तर प्रदेश व गाजियाबाद जैसे शहरों में खेल की संभावनाओं दैनिक जागरण के शाहनवाज अली ने पर विस्तार से बात की। प्रस्तुत हैं मुख्य अंश।
कामनवेल्थ गेम्स
| वर्ष | स्थान एवं देश |
|---|---|
| 2014 | ग्लासगो, स्काटलैंड |
| 2018 | गोल्ड कोस्ट, आस्ट्रेलिया |
| 2022 | बर्मिंघम, इंग्लैंड |
| 2026 | ग्लासगो, स्काटलैंड |
एशियन पैरा गेम्स
| वर्ष | स्थान एवं देश |
|---|---|
| 2010 | ग्वांगझू, चीन |
| 2014 | इंचियोन, दक्षिण कोरिया |
| 2018 | जकार्ता–पालेमबांग, इंडोनेशिया |
| 2022 | हांगझोऊ, चीन |
ओलंपिक एवं पैरालंपिक खेल
| वर्ष | स्थान एवं देश |
|---|---|
| 2008 | बीजिंग, चीन |
| 2012 | लंदन, यूनाइटेड किंगडम |
| 2016 | रियो डी जेनेरियो, ब्राज़ील |
| 2020 | टोक्यो, जापान *(2021 में आयोजित)* |
| 2024 | पेरिस, फ्रांस |
कामनवेल्थ गेम्स में झंडू कुमार ने भारत को पहला पदक दिलाया। इस सफलता के पीछे सबसे बड़ा टर्निंग प्वाइंट क्या रहा? तैयारी में ऐसा क्या अलग किया गया?
देखिए, झंडू कुमार का यह कांस्य पदक सिर्फ उनकी जीत नहीं है, बल्कि वर्षों की मेहनत, धैर्य और विश्वास का परिणाम है। मैंने उन्हें लंबे समय से करीब से देखा है। उन्होंने कभी सुविधाओं की कमी को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया।
इस बार हमारी तैयारी पहले से ज्यादा व्यवस्थित रही। हमने तकनीक, रिकवरी, मानसिक मजबूती और प्रतियोगिता की रणनीति पर भी बराबर काम किया। झंडू ने भारत के लिए पहला पदक जीता। इस पदक ने देश के हजारों दिव्यांग खिलाड़ियों में विश्वास जगाया।
ग्लासगो में कोच के रूप में आपका अनुभव कैसा रहा? विदेशी खिलाड़ियों और भारतीय खिलाड़ियों की तैयारी में सबसे बड़ा अंतर आपको कहां दिखाई दिया?
भारतीय टीम के साथ रहना मेरे लिए गर्व का क्षण था, जब हमारे खिलाड़ी विश्व स्तर के मंच पर आत्मविश्वास के साथ उतरे। प्रतिभा के मामले में भारतीय खिलाड़ी किसी से कम नहीं हैं। असली फर्क सुविधाओं और सिस्टम का है।
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विदेशी खिलाड़ी सालभर स्पोर्ट्स साइंस, आधुनिक उपकरण, न्यूट्रिशनिस्ट, फिजियो और विशेषज्ञों की पूरी टीम के साथ तैयारी करते हैं। वहीं हमारे कई खिलाड़ी आज भी सीमित संसाधनों में अभ्यास करते हैं, जिस दिन उन्हें भी विश्वस्तरीय सुविधाएं मिलने लगेंगी, उस दिन भारत सिर्फ मुकाबला नहीं लगातार स्वर्ण पदक जीतेगा।
विदेशों में पैरा पावरलिफ्टिंग खिलाड़ियों को किस तरह की सुविधाएं, स्पोर्ट्स साइंस, उपकरण और तकनीकी सहयोग मिलता है, जिसकी भारत में अभी कमी महसूस होती है?
विदेशों में खिलाड़ी सिर्फ जिम में ट्रेनिंग नहीं करते, बल्कि उनके साथ पूरी एक विशेषज्ञ टीम काम करती है। स्पोर्ट्स साइंटिस्ट, फिजियोथेरेपिस्ट, न्यूट्रिशनिस्ट, स्पोर्ट्स साइकोलाजिस्ट और बायोमैकेनिक्स एक्सपर्ट नियमित रूप से उनकी तैयारी का हिस्सा होते हैं। हर खिलाड़ी की वैज्ञानिक तरीके से मानिटर की जाती है। भारत में भी सकारात्मक बदलाव हुए हैं, लेकिन यह व्यवस्था अभी हर खिलाड़ी तक नहीं पहुंच पाई है।
पैरालंपिक और विश्व चैंपियनशिप के शीर्ष देशों की कतार में भारत को किन तीन बड़े बदलावों की जरूरत है?
मेरे हिसाब से सबसे पहला बदलाव ग्रासरूट स्तर पर होना चाहिए। देश के हर राज्य में प्रतिभाओं की पहचान कर उन्हें शुरुआती दौर से ही सही प्रशिक्षण और मार्गदर्शन मिले। पैरा खिलाड़ियों के लिए विश्वस्तरीय ट्रेनिंग सेंटर और स्पोर्ट्स साइंस की सुविधाएं बढ़ें।
खिलाड़ियों को नियमित अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं का अनुभव मिलना चाहिए। जितना ज्यादा वे दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों के साथ खेलेंगे, उनका आत्मविश्वास और प्रदर्शन उतना ही बेहतर होगा।
गाजियाबाद जैसे शहरों में पैरा पावरलिफ्टिंग की कितनी संभावनाएं हैं और विश्वस्तरीय खिलाड़ी तैयार करने के लिए क्या करना चाहिए?
उत्तर प्रदेश में प्रतिभा की बिल्कुल कमी नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में यहां के खिलाड़ियों ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेहतरीन प्रदर्शन किया है। गाजियाबाद की सबसे बड़ी ताकत इसकी बेहतर कनेक्टिविटी और खेल के प्रति बढ़ती जागरूकता है। अगर सही माहौल मिले, तो यह शहर पैरा पावरलिफ्टिंग का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है।
क्या भारत के पास 2032 पैरालंपिक में पैरा पावरलिफ्टिंग में शीर्ष-5 देशों में शामिल होने की क्षमता है?
बिल्कुल, मुझे भारतीय खिलाड़ियों की क्षमता पर पूरा भरोसा है। पिछले कुछ वर्षों में हमारे खिलाड़ियों ने जिस तरह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शन किया है, उससे यह विश्वास और मजबूत हुआ है।
अगर सरकार, खेल संस्थाएं, कार्पोरेट जगत और समाज मिलकर खिलाड़ियों का साथ दें, तो मुझे पूरा विश्वास है कि 2032 पैरालंपिक में भारत पैरा पावरलिफ्टिंग के शीर्ष देशों में अपनी मजबूत पहचान बनाएगा।
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