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    गोरखपुर में नए सर्किल रेट का निर्धारण अटका, राजस्व हानि के डर से टली व्यवस्था

    Updated: Tue, 31 Mar 2026 10:22 AM (GMT+05:30)

    गोरखपुर में भूमि और मकान के नए सर्किल रेट का निर्धारण फिलहाल अधर में लटक गया है। एक अप्रैल से लागू होने वाली मानकीकृत दरें राजस्व में संभावित 50-70% क ...और पढ़ें

    राजस्व पर पड़ सकता है 50 से 70 प्रतिशत तक असर

    राजस्व पर पड़ सकता है 50 से 70 प्रतिशत तक असर

    HighLights

    1. गोरखपुर में नए सर्किल रेट का निर्धारण फिलहाल रुका हुआ है।

    2. राजस्व में 50-70% कमी की आशंका मुख्य कारण।

    3. पारदर्शिता लाने वाली नई व्यवस्था अप्रैल से लागू नहीं होगी।

    जागरण संवाददाता, गोरखपुर। भूमि और मकान के सर्किल रेट तय करने के लिए प्रस्तावित नया मानकीकृत प्रारूप फिलहाल अधर में लटक गया है। महानिरीक्षक निबंधन की ओर से 24 फरवरी को जारी निर्देशों के अनुसार 1 अप्रैल 2026 से पूरे प्रदेश के साथ गोरखपुर में भी एक समान प्रारूप पर सर्किल दर लागू की जानी थी, लेकिन तय समय नजदीक आने के बावजूद इस दिशा में कोई ठोस प्रगति नहीं हो सकी है।

    शासन स्तर से जिलाधिकारी को आवश्यक तैयारियां शुरू करने के निर्देश दिए गए थे और एक निर्धारित प्रारूप भी भेजा गया था। इसके तहत जिलों को नए सिरे से सर्किल रेट तय कर उनका प्रकाशन करना था, फिर आपत्तियां आमंत्रित कर उनके निस्तारण के बाद नई दरें लागू की जानी थीं। हालांकि गोरखपुर समेत प्रदेश के ज्यादातर जिलों में अभी तक इस प्रारूप के अनुसार दरों का निर्धारण नहीं हो सका है।

    विभागीय सूत्रों के मुताबिक अब तक किसी भी जिले से नई दरें तय कर शासन को रिपोर्ट नहीं भेजी जा सकी है। माना जा रहा है कि इस देरी के पीछे राजस्व पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव भी एक बड़ा कारण है। बताया जा रहा है कि यदि नया प्रारूप लागू होता, तो स्टाम्प शुल्क से होने वाली आय में 50 से 70 प्रतिशत तक कमी आ सकती थी। यही वजह है कि अधिकारी इस पर फिलहाल चुप्पी साधे हुए हैं।

    दरअसल, इस नई व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य संपत्ति पंजीकरण के दौरान स्टाम्प शुल्क निर्धारण में एकरूपता और पारदर्शिता लाना था। वर्तमान में अलग-अलग जिलों में मूल्यांकन के तरीके अलग-अलग हैं, जिससे भ्रम और असमानता की स्थिति बनती है। प्रस्तावित प्रारूप के जरिए इस अंतर को खत्म करने की योजना थी।

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    नई प्रविधानों के अनुसार भूखंड के मूल्यांकन में कई नए मानक जोड़े गए थे। उदाहरण के तौर पर यदि किसी प्लाट की चौहद्दी में एक से अधिक पक्की सड़कें होतीं, तो सबसे अधिक दर वाली सड़क के आधार पर मूल्यांकन किया जाता और कुल कीमत में 15 प्रतिशत की अतिरिक्त वृद्धि जोड़ी जाती।

    इसी तरह यदि किसी भूखंड के सामने पार्क होता, तो 10 प्रतिशत अतिरिक्त मूल्य जोड़ा जाता। यदि दोनों स्थितियां एक साथ होतीं, तो 25 प्रतिशत तक मूल्य वृद्धि का प्रविधान था।

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    सड़क की परिभाषा को भी स्पष्ट किया गया था। केवल डामरीकृत, सीसी, इंटरलाकिंग या खड़ंजा मार्ग को ही सड़क माना जाता, जबकि कच्चे रास्तों को इसमें शामिल नहीं किया जाता। सड़क की चौड़ाई नालियों सहित मापी जानी थी।

    कृषि भूमि के लिए भी नया फार्मूला तय किया गया था, जिसमें ‘के’, ‘एल’, ‘एम’ और ‘एन’ श्रेणियों के आधार पर दरें निर्धारित की जातीं। मुख्य मार्ग या शहरी क्षेत्र के पास स्थित भूमि ‘के’ श्रेणी में आती, जिसकी दर सबसे अधिक होती। इसके बाद क्रमशः ‘एल’, ‘एम’ और ‘एन’ श्रेणियों में दरें घटती जातीं। इसके अलावा सेगमेंट रोड और अन्य सड़कों के आधार पर अलग-अलग गुणांक भी तय किए जाने थे।

    यदि यह नई व्यवस्था लागू होती, तो आमजन पर कई संपत्तियों की खरीद पर स्टाम्प शुल्क का बोझ कम पड़ता। वहीं विभाग के लिए यह व्यवस्था पारदर्शिता बढ़ाने के साथ ही प्रक्रिया को अधिक वैज्ञानिक बनाती, लेकिन राजस्व में संभावित कमी बड़ी चुनौती के तौर पर सामने आ रही है। गोरखपुर में वर्ष 2016 के बाद से नया सर्किल रेट प्रभावी रूप से लागू नहीं हो सका है।