हाथरस की काली नदी पर छाया संकट, अतिक्रमण और अनदेखी से अस्तित्व पर खतरा, सिंचाई और भूजल स्तर प्रभावित
हाथरस में काली नदी अतिक्रमण और अनदेखी के कारण संकट में है, जिससे सिंचाई और भूजल स्तर प्रभावित हो रहा है। ...और पढ़ें

सिकंदराराऊ में गांव मूड़ा नौजरपुर होकर बहती काली नदी। जागरण
HighLights
काली नदी अतिक्रमण और अनदेखी से गंभीर संकट में है।
कभी 20 हजार एकड़ सिंचाई, अब प्रदूषित नाले में बदली।
75 साल से नदी पर पुल नहीं, लोगों को परेशानी।
आकाश राज सिंह, हाथरस। प्रकृति और पर्यावरण की अनदेखी अब जनजीवन पर भारी पड़ रही है। नदियों का आकार सिकुड़ रहा है तो वनीकरण का आकार लगातार घट रहा है। इससे वन्य प्राणियों और जलीय जीवों पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।
नदियों के चलते भूजल स्तर ठीक रहता था मगर अब अत्यधिक भूजल दोहन के साथ सूख रही नदियों के कारण भूजल लगातार नीचे जा रहा है। इसी से खारे पानी की समस्या पैदा हुई है।
हाथरस जिले की सीमा से होकर बह रही काली नदी भी इसी तरह की समस्या पीड़ित है। कभी काली नदी सीमा से सटे गांवों के किसानों के लिए सिंचाई का महत्वपूर्ण जरिया हुआ करती थी।
सिकंदराराऊ तहसील मुख्यालय से करीब 30 किमी दूर अलीगढ़ से लेकर कासगंज जिले की सीमा तक फैले नीजरा गोकुलपुर, नरहरपुर, गुरैठा आदि गांव काली नदी के सहारे फलते-फूलते थे। जिले में करीब 20 हजार एकड़ में फसलों की सिंचाई हुआ करती थी, मगर अब काली नदी का अस्तित्व संकट में है।
लोग बताते हैं कि कुछ वर्ष पहले तक नदी का स्वरूप काफी खतरनाक हो जाया करता था। बाढ़ के चलते पानी की लहरों को देखकर लोग सहम जाते थे। धीरे-धीरे नदी का स्वरूप सिकुड़ता चला गया और काली नदी नाले में तब्दील होकर रह गई।
इसका दूषित जल जलीय जीवों के लिए ही नहीं, फसलों को भी नुकसान पहुंचा रहा है। इससे खिजरपुर, भुड़िया, नगला भानचंद, भीकनपुर, भूड़ा नौजरपुर, नरहरपुर, दोस्तपुर, गुरेठा सुल्तानपुर, लक्षिमपुर गड़िया, आरिफपुर, भोगपुर, नीजरा सहित जिले के करीब बीस गांवों के लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
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पुल की जगह बना दी पुलिया
हाथरस जिले की सीमा में काली नदी पर नदी पार करने के लिए पुल तक नहीं है। दूसरी ओर जाने के लिए कई किमी का चक्कर लगा कर अलीगढ़ जिले के तिहरा होकर जाना पड़ता है।
नदी के किनारे बसे खिजरपुर सहित कई गांव हैं। यह गांव काली नदी के किनारे बसे हैं। यहां के लोगों को नदी पार करने के लिए नाव का सहारा लेना पड़ता है। पुल की जगह पुलिया बन जाने से लोगों को दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।
20 हजार एकड़ फसलों की सिंचाई
काली नदी का उद्गम उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के 'कालापानी' में लिपुलेख दर्रे के पास स्थित कालीमाता मंदिर से बताया जाता है। यह नदी अलीगढ़ के रास्ते हाथरस में प्रवेश करती है। यह कन्नौज के पास गंगा में समाहित हो जाती है।
नदी पर अतिक्रमण के कारण अब बारिश के दिनों में नदी के तट टूट जाने से बाढ़ का पानी आसपास के खेतों की फसलों को बर्बाद करता है। इससे बचाव की कोई व्यवस्था नहीं हो रही है।
प्रमुख तथ्य
- करीब 20 हजार एकड़ जमीन में होती थी फसलों की सिंचाई।
- इसके पानी से लहलहाती थी गेहूं, बाजरा, मक्का सहित अन्य फसल।
- 20 से अधिक गांव के लोगों को मिलता था इस नदी के पानी का लाभ।
- जिले में करीब 20 किलोमीटर क्षेत्र से होकर गुजर रही है यह नदी।
- 20 साल से दुर्दशा की शिकार बनी हुई है काली नदी।
पहले इस नदी में स्वच्छ जल आने से फसलों की सिंचाई होती थी। अब इसमें दूषित पानी आने से यह किसी काम का नहीं है।
-सौदान सिंह वर्मा, किसान
काली नदी दुर्दशा का शिकार है। इस पर पुल तक नहीं बन सका। इससे सबसे अधिक परेशानी आसपास के लोगों को होती है।
-ज्ञान सिंह, ग्रामीण
कई जगह नदी पर तटबंध नहीं है। इससे बाढ़ का पानी खेतों की फसलों को बर्बाद करता है। इसका समाधन तलाशना होगा।
-मान सिंह आचार्य
नदी पर कई जगह किसानों ने अतिक्रमण कर रखा है। उसके तटों को काटकर खेतों में मिला लिया है। इससे बाढ़ के समय दिक्कते होती हैं।
-मानपाल सिंह, प्रधान मूढ़ा नौजरपुर
नदियों में तटबंधों पर पूरा ध्यान दिया जाता है। अतिक्रमण की शिकायत मिलने पर नियमानुसार कदम संबंधित के विरुद्ध उठाया जाता है। बारिश में बाढ़ से पहले नदियों, नहरों व रजबहों की निगरानी रखी जाती है। जलकुंभी आदि हटाकर पानी की निकासी बनाए रखी जाती है।
-प्रशांत चौधरी, एसडीओ सिंचाई विभाग हाथरस।