रक्षाबंधन पर बहन को भाई ने दिया ऐसा तोहफा, ताना मारने वाले भी करने लगे तारीफ, बनी मिसाल
सिपाही भर्ती में असफल होने के बाद उरई की संध्या ने अपने छोटे भाई प्रिंस के समर्थन से दारोगा बनकर मिसाल कायम की।

बाएं से संध्या अपने पिता संतोष, मां विनीता व भाई प्रिंस के साथ। स्वयं
HighLights
सिपाही भर्ती में फेल होने पर भाई ने संभाला।
छोटे भाई प्रिंस ने ट्यूशन पढ़ाकर आर्थिक मदद की।
संध्या अब दारोगा बनकर सिविल सेवा की तैयारी कर रही।
अजय दीक्षित, जालौन। संघर्ष के साथ संकल्प और रूढ़िवादी सोच को तोड़ते हुए छोटे से गांव भभुआ में एक भाई ने दो साल पहले सिपाही की भर्ती में फेल होने के बाद टूट चुकी बहन के सपनों को उड़ान दी और उसे दारोगा बना दिया। खेती करने वाले पिता का हाथ बंटाते ट्यूशन से आय का नया स्रोत खोलकर परिवार व बहन की मदद की।
किसान पिता संतोष कुमार कुशवाहा व आशा कार्यकर्ता मां विनीता के सपनों को पूरा करने वाली बिटिया संध्या के लिए उससे तीन साल छोटे भाई की ओर से दिया गया यह बड़ा उपहार अब रक्षाबंधन के मौके पर चर्चा में है।
छोटे भाई के दृढ़ संकल्प से सीमित संसाधनों, आर्थिक कठिनाइयों व रूढ़िवादी समाज के अंगुली उठाने के बावजूद बहन अपने लक्ष्य से अधिक सफलता हासिल कर पाई।
गांव के लोग करते थे तरह-तरह की टिप्पणी
उरई जिला मुख्यालय से लगभग 20 किमी दूर ग्राम पंचायत अकौढ़ी के गांव भभुआ निवासी संतोष कुमार पांच बीघा के एक छोटे काश्तकार हैं। उनकी पत्नी विनीता क्षेत्र में ही आशा कार्यकर्ता हैं। इनकी दो संतानों में 19 वर्षीय प्रिंस बीएससी करने के बाद प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं।
22 वर्षीय बेटी संध्या बीएससी के बाद बीएड करने के बाद उत्तर प्रदेश पुलिस में सिपाही के पद पर भर्ती के लिए तैयारी कर रही थी। गांव में पुलिस में भर्ती की तैयारी के दौरान लोगों ने कहा कि बिटिया को बाहर भेजते हैं, इससे रोकना चाहिए और भी तरह-तरह की अभद्र टिप्पणी कीं। इससे उसका हौसला टूटने लगा।
दो साल पहले सिपाही की भर्ती के लिए प्रयास किया पर दौड़ में ही बाहर हो गई। बहन का सपना टूटा तो छोटा भाई उसके साथ खड़ा हुआ। गांव में लोगों की अनर्गल बातों से बचने के लिए उरई में किराये का कमरा लेकर भाई ने स्वयं छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर आय का नया स्रोत तैयार किया और प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी की।
बहन को भी साथ में रखकर उसका हौसला बढ़ाया। इसका परिणाम भी आया। बहन ने देर रात तक पढ़ने के साथ शारीरिक कौशल में दक्षता के लिए पसीना बहाया।
इस कठिन तपस्या और प्रयास से वर्ष 2026 में दारोगा के रूप में कंधे पर दो स्टार सजने की दिशा में कदम बढ़े। जिस गांव के लोग ताने मारने से नहीं चूक रहे थे, वही अब खाकी वर्दी पहनने वाली बिटिया की सराहना कर रहे हैं। संध्या दूसरी बेटियों के लिए प्रेरणा बन गई हैं।
संध्या बताती हैं कि हर कदम पर भाई का साथ मिला। गांव के परिषदीय स्कूल से शिक्षा ग्रहण करने के बाद छोटे भाई प्रिंस ने ही दारोगा बनाने में मदद की।
बताया कि गांव स्थित परिषदीय स्कूल में कक्षा पांच तक की पढ़ाई की। इसके बाद छह से 12 तक आटा में स्कूल में पढ़ीं। बीएससी और बीएड उरई से किया। इस दौरान भाई हमेशा साथ रहा।
मोबाइल फोन से बनाई दूरी, पुस्तकें बनीं साथी
संध्या बताती हैं कि रात में 12 बजे तक पढ़ने के साथ प्रतिदिन सुबह पांच बजे उठकर सामान्य व्यायाम, दौड़ लगाने के साथ उचित आहार लिया। दिन में समय मिलने पर दैनिक जागरण समाचार पत्र पढ़ा, प्रतियोगी परीक्षा की पुस्तकों को अपना साथी बनाया। मोबाइल फोन से केवल काम की चीजें लीं और बाकी दूरी बनाई।
प्रशासनिक सेवा में जाने का मन
सिपाही भर्ती में फेल होने के बाद नए जोश के साथ दारोगा बनने वाली संध्या इसे अपना अंतिम पड़ाव नहीं मानती हैं। अब भाई-बहन नोएडा में रहकर सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रही हैं। उनका भाई भी इस तैयारी में लगा है। बताया कि दारोगा पद पर चयन के बाद मानसिक तौर पर स्वयं को तैयार कर रही हैं।
पिता संतोष बताते हैं कि जब से उनकी बेटी दोरागा के पद पर चयनित हुई है, तब से क्षेत्र के माता-पिता अपनी बेटियों को भी प्रेरित कर रहे हैं। बहुत लोग मिलकर व तमाम फोन से तैयारी की जानकारी ले रहे हैं।
